Oi Explainer: भारत के लिए मुश्किलें बढ़ा रहा चीन, हिंद महासागर में तनाव! इन तीन हरकतों से उकसा रहा ड्रैगन
Oi Explainer: वैश्विक मंच पर अपनी शक्ति दिखाने की चीन की नीति का एक अहम हिस्सा हिंद-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pecific Region) में उसका तेजी से बढ़ता प्रभाव है। हालांकि बीजिंग ने हिंद-प्रशांत की कोई औपचारिक या स्पष्ट परिभाषा नहीं दी है, लेकिन इस क्षेत्र में उसकी बढ़ती गतिविधियां रणनीतिक संतुलन को बदलने और बिगाड़ने में लगी हैं।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र का महत्व और चीन की भूमिका
हिंद-प्रशांत, जो हिंद और प्रशांत महासागरों से मिलकर बना एक विशाल क्षेत्र है, आज चीन की रणनीति का प्रमुख केंद्र बन चुका है। प्रशांत क्षेत्र में चीन फिलीपींस और जापान जैसे देशों के साथ संप्रभुता और क्षेत्रीय संघर्षों में लगातार उलझा है।

दक्षिण चीन सागर में बढ़ते समुद्री तनाव
दक्षिण चीन सागर (SCS) में चीन की आक्रामक गतिविधियों के कारण चीनी तटरक्षक और समुद्री मिलिशिया तथा फिलीपींस के तटरक्षक के बीच कई शारीरिक टकराव हो चुके हैं। जिस पर भारत से लेकर अमेरिका तक ने ऐतराज जताया है।
हिंद महासागर में चीन की अलग रणनीति
हिंद-प्रशांत के दूसरे हिस्से-हिंद महासागर-में चीन की रणनीति प्रशांत क्षेत्र से अलग है। यहां चीन भले ही रणनीतिक उथल-पुथल का सामना करता हो, लेकिन उसके दीर्घकालिक लक्ष्य लगातार विस्तृत होते जा रहे हैं।
हिंद महासागर में चीन की 3 रणनीतियां
चीन हिंद महासागर में तीन चरणों पर आधारित रणनीति चला रहा है:
1. तटीय देशों में राजनीतिक प्रभाव बढ़ाना
2. दोहरे-उपयोग वाले शोध पोत भेजकर नौसैनिक उपस्थिति बढ़ाना
3. चीन-हिंद महासागर फोरम के माध्यम से क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाना
चीन की 'रणनीतिक प्रयोगशाला'
हिंद महासागर में चीन की बढ़ती सक्रियता अक्सर अनदेखी रह जाती है, जबकि यह क्षेत्र अब उसके लिए रणनीतिक प्रयोगशाला बन चुका है, जहां वह नए तरीकों से प्रभाव जमाने की कोशिश कर रहा है।
हिंद महासागर और चीन
हिंद महासागर में चीन का इतिहास दो दौर में देखा जाता है-पहले दौर में समुद्री व्यापार और प्रवासन थे, जबकि आधुनिक दौर में सुरक्षा कारणों से उपस्थिति बढ़ी। 21वीं सदी में सोमालिया के पास बढ़ती समुद्री डकैती के बाद चीन ने दो युद्धपोत भेजकर अपनी सुरक्षा उपस्थिति शुरू की।
चीन की बढ़ती समुद्री दखल के कारण
चीन की हिंद महासागर में उपस्थिति लगातार बढ़ रही है। घरेलू और बाहरी दोनों कारक इसके पीछे हैं। मध्य पूर्व से आने वाली ऊर्जा आपूर्ति चीन के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, और इसका लगभग 80% तेल आयात हिंद महासागर से होकर गुजरता है। हिंद महासागर चीन के लिए वैश्विक शक्ति बनने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मंच बन गया है, जहां से वह अपनी शक्ति प्रदर्शित कर सकता है।
कूटनीति का बुनियादी ढांचा
चीन ने हिंद महासागर में अपने रणनीतिक footprint को बढ़ाने के लिए विभिन्न देशों में बड़े पैमाने पर बंदरगाह, हाईवे और एयरपोर्ट बनाए हैं। जिनमें प्रमुख हैं-
• पाकिस्तान में ग्वादर
• श्रीलंका में हंबनटोटा
• बांग्लादेश में सोनादिया
• म्यांमार में क्याउकप्यू
कर्ज-जाल कूटनीति का खतरा
ये परियोजनाएं अक्सर उन देशों को भारी कर्ज में डाल देती हैं। यदि वे चूक जाते हैं, तो चीन इन परिसंपत्तियों का परिचालन नियंत्रण मांग सकता है। श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
चीनी शोध पोत: दोहरे उद्देश्य की रणनीति
हिंद महासागर में हाइड्रोग्राफिक अध्ययन के नाम पर चीन कई शोध पोत भेज रहा है-जिनमें उसका सबसे बड़ा महासागरीय पोत Zhong Shan Da Zu भी शामिल है। ये पोत श्रीलंका और मालदीव के तट पर भी रुकते हैं, जिससे भारत चिंतित है। उनकी दोहरी-उपयोग तकनीक खुफिया संग्रहण में मदद करती है।
हिंद महासागर में 'फोरम डिप्लोमेसी'
चीन-हिंद महासागर फोरम, जिसे CIDCA द्वारा संचालित किया जाता है, बीजिंग का एक नया प्रयास है जिसे क्षेत्रीय विकास, ब्लू इकॉनमी, समुद्री कनेक्टिविटी और पर्यावरण मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने के रूप में पेश किया गया है।
हिंद महासागर में चीन का मकसद
इस फोरम के जरिए चीन हिंद महासागर के देशों की प्राथमिकताओं-विशेषकर विकास और सुरक्षा-को ध्यान में रखते हुए खुद को एक अनिवार्य साझेदार के रूप में स्थापित करना चाहता है। हिंद महासागर चीन के लिए एक प्रमुख रणनीतिक मंच बन चुका है। उसकी त्रि-स्तरीय रणनीति-राजनीतिक प्रभाव, नौसैनिक उपस्थिति और क्षेत्रीय सहयोग-पूरे क्षेत्र की सुरक्षा संरचना को बदल रही है।
चीनी रणनीति का सार
चीन हिंद महासागर के तटीय देशों की जरूरतों और विवशताओं को समझकर अपने कदम बढ़ा रहा है। यही वजह है कि उसका "लंबा खेल" धीरे-धीरे मजबूत होता जा रहा है, और वह इस क्षेत्र में अपना प्रभाव स्थिरता से बढ़ा रहा है।
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