अब काग़ज़ की बोतल में मिलेगी जॉनी वॉकर व्हिस्की

करीब दो सौ साल पुरानी व्हिस्की जॉनी वॉकर अब काग़ज़ की बोतल में बाज़ार में आएगी.
दुनिया की सबसे बड़ी शराब कंपनियों में शामिल डियाजियो इस व्हिस्की ब्रांड की मालिक है.
कंपनी का कहना है कि वह पर्यावरण को ध्यान में रखकर बनाए गई पैकेजिंग का ट्रायल अगले साल से शुरू करेगी.
जॉनी वॉकर व्हिस्की आमतौर पर शीशे की बोतल में ही बिकती है.
लेकिन कंपनी का कहना है कि वो अपने सभी ब्रांड में प्लास्टिक का इस्तेमाल कम से कम करने पर ज़ोर दे रही है.
शीशे से बोतल बनाने में भी ऊर्जा ख़र्च होती है और इससे कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है.
पेपर की बोतलें बनाने के लिए कंपनी पल्पेक्स नाम की एक और फ़र्म बनाने जा रही है.
ये कंपनी पेप्सिको और यूनीलीवर जैसे ब्रांड के लिए भी काग़ज़ की बोतले तैयार करेगी.
कंपनी का कहना है कि उसकी पेपर की बोतल वुड पल्प (लकड़ी की लुगदी) से बनेगी और इसका परीक्षण 2021 में किया जाएगा. इन बोतलों को पूरी तरह से रिसायकल किया जा सकेगा
कंपनी को उम्मीद है कि ग्राहक इन्हें सीधे रिसायकल करने के लिए भेज सकेंगे.
पेय कंपनियां प्रदूषण कम करने के लिए पेपर की बोतले बनाने पर ज़ोर दे रही हैं.
बीयर कंपनी कार्ल्सबर्ग भी पेपर की बोतलें बनाने की प्रक्रिया में है.
हालांकि दुनिया की बड़ी पेय उत्पाद कंपनी कोका कोला का कहना है कि वो प्लास्टिक बोतलों का इस्तेमाल बंद नहीं करेगी क्योंकि ग्राहक अभी भी इन्हें पसंद करते हैं.
प्लास्टिक मुक्त बोतलें
डियाजियो का कहना है कि उसकी बोतले पल्प को खांचे में दबाव डालकर और फिर माइक्रोवेव में सेककर बनाई जाएंगी.
इन बोतलों में अदर से परत चढ़ाई जाएगी जो ये सुनिश्चित करेगी कि पेय पदार्थ काग़ज़ से ना मिले.
कई कार्टन जो काग़ज़ से बनते हैं उनमें अंदर से प्लास्टिक की परत होती है ताकि पेय पदार्थ बाहर न निकले.
लेकिन डियाजियो का कहना है कि उसकी बोतलों में किसी भी तरह से प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा.
पर्यावरण को हो रहे नुकसान की वजह से कंपनियों पर उत्पादों की पैकिंग में प्लास्टिक का इस्तेमाल न करने का दबाव है.
एक अनुमान के मुताबिक सिर्फ़ यूरोप में ही साल 2018 में खाद्य और पेय पदार्थों की पैकिंग में 82 लाख टन प्लास्टिक इस्तेमाल की गई थी.
डियाजियो का कहना है कि वो अपनी पैकिंग में पांच प्रतिशत से भी कम प्लास्टिक का इस्तेमाल करती है.
हालांकि शीशे की बोतलों के निर्माता उत्पादन में ऊर्जा के कम ख़र्च पर ज़ोर दे रहे हैं लेकिन अभी भी वे बड़ी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन करते हैं.
शीशा पिघलाने वाली भट्टियों के संचालन में भारी मात्रा में ऊर्जा ख़र्च होती है. अधिकतर भट्टियां प्राकृतिक गैस से चलती हैं. इनमें रेत और चूने को पिघलाया जाता है.
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