तेल और गैस ही नहीं, परमाणु ऊर्जा में भी ‘बादशाह’ है रूस, फंसेगा US, भारत को उठाना चाहिए फायदा?
कई देशों में अब परमाणु ऊर्जा कई राष्ट्रीय बिजली ग्रिड का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यूरोपीय देश विशेष रूप से परमाणु ऊर्जा पर निर्भर हैं, जिसमें फ्रांस भी शामिल है और कई यूरोपीय देश परमाणु ऊर्जा का उत्पादन भी करते हैं।
नई दिल्ली/मॉस्को, मार्च 21: रूस को भले ही अमेरिका समेत तमाम पश्चिमी देशों ने प्रतिबंधों के जाल में बुरी तरह से फंसाने की कोशिश की हो, लेकिन तेल और गैस के क्षेत्र में रूस को फंसाने में पश्चिमी देश बुरी तरह से नाकाम रहे हैं। हालांकि, अब पश्चिमी देशों ने रूसी ऊर्जा का विकल्प तलाशना शुरू कर दिया है, लेकिन यूरोपीय देशों के लिए रूस पर अपनी निर्भरता कम करना आसान नहीं है, क्योंकि दुनिया के कम से कम 32 से ज्यादा देश भी परमाणु ईंधन आपूर्ति श्रृंखला के लिए रूस पर निर्भर हैं। लेकिन, क्या अमेरिका रूसी परमाणु ईंधन पर भी प्रतिबंध लगाने की हिम्मत करेगा? और क्या भविष्य में भारत को भी अपने दोस्त से मदद लेनी चाहिए।

परमाणु ऊर्जा पर निर्भर होती दुनिया
कई देशों में अब परमाणु ऊर्जा कई राष्ट्रीय बिजली ग्रिड का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यूरोपीय देश विशेष रूप से परमाणु ऊर्जा पर निर्भर हैं, जिसमें फ्रांस भी शामिल है और कई यूरोपीय देश परमाणु ऊर्जा का उत्पादन भी करते हैं। फ्रांस अपनी जरूरत का 69 प्रतिशत बिजली आपूर्ति परामणु ऊर्जा से करता है, तो यूक्रेन (51 प्रतिशत), हंगरी (46 प्रतिशत), फिनलैंड (34 प्रतिशत) और स्वीडन (31 प्रतिशत) का बिजली उत्पादन परमाणु ऊर्जा से ही करता है। अमेरिका भी अपनी जरूरत की 20 प्रतिशत बिजली का उत्पादन परमाणु रिएक्टर से ही ऊर्जा पैदाकर करता है। इनमें से कई देशों ने मूल रूप से आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम करने के लिए परमाणु ऊर्जा को अपनाया और हाल ही में कार्बन डायऑक्साइड को कम करने के लिए जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल और घटाने के लिए संकल्प लिया है।

परमाणु ऊर्जा हो सकती है बाधित
यूक्रेन में युद्ध जारी है और आने वाले वक्त में यूक्रेन में परमाणु ऊर्जा उत्पादन पर गंभीर असर पड़ सकता है, जिससे यूरोपीय देशों को परमाणु ईंधन की आपूर्ति को बाधित कर सकता है। ऐसे में रूस के प्रभाव का मुकाबला करने के लिए ठोस प्रयासों की आवश्यकता होगी, ताकि ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु शमन और अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रति प्रतिबद्धता को लेकर बने संतुलन पर असर ना पड़ सके। यूक्रेन युद्ध में अभी तक कई परमाणु संयंत्रों पर रूस का कब्जा हो चुका है और रूस का सबसे बड़ा मकसद भी परमाणु संयंत्रों को कंट्रोल करना था।

परमाणु ऊर्जा...एक वैश्विक उद्योग
दुनिया भर में अभी 32 ऐसे देश हैं, जो 440 वाणिज्यिक परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों का संचालन करते हैं, जिनसे वैश्विक बिजली आपूर्ति का 10 प्रतिशत उत्पन्न किया जाता है। अमेरिका में सबसे अधिक ऑपरेटिंग रिएक्टर (93) हैं, इसके बाद फ्रांस (56) और चीन (53) हैं। कई देश परमाणु ईंधन, परमाणु मैटेरियल्स और न्यूक्लियर सर्विस का निर्यात करते हैं। प्रमुख अंतरराष्ट्रीय आपूर्तिकर्ताओं में अमेरिका के बाद रूस का ही स्थान है और फिर यूरोप और चीन हैं। कनाडा और दक्षिण कोरिया सहित कई अन्य देश भी परमाणु ऊर्जा उत्पादन और सर्विस में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

पांच तरहों से होता है परमाणु ऊर्जा का उत्पादन
- 1. कच्चा यूरेनियम अयस्क, जिसमें आमतौर पर 2 प्रतिशत से भी कम यूरेनियम होता है, जमीन से निकाला जाता है।
- 2. यूरेनियम को अन्य सामग्रियों से अलग करने के लिए अयस्क की पिसाई की जाती है, जिससे येलोकेक नामक पाउडर निकलता है।
- 3. येलोकेक रासायनिक रूप से गैसीय यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड में परिवर्तित हो जाता है।
- 4. यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड को यूरेनियम -235 की सांद्रता बढ़ाने के लिए संसाधित किया जाता है, जिसे बड़ी मात्रा में ऊर्जा का उत्पादन करने के लिए रिएक्टरों में विभाजित किया जा सकता है। U-235 केवल प्राकृतिक यू का 0.7 प्रतिशत बनाता है।
- 5. समृद्ध यूरेनियम रिएक्टरों के लिए ईंधन की छड़ों में निर्मित होता है।

बड़ा न्यूक्लियर सप्लायर है रूस
न्यूक्लियर ऊर्जा के ऊत्पादन में कोबाल्ट का बहुत बड़ा योगदान है। वहीं, कोबाल्ट की तुलना में पूरी दुनिया में यूरेनियम संसाधन काफी व्यापक रूप से फैले हुए हैं। कजाकिस्तान वैश्विक आपूर्ति का 40 प्रतिशत से अधिक उत्पादन करता है, इसके बाद कनाडा (12.6 प्रतिशत), ऑस्ट्रेलिया (12.1 प्रतिशत) और नामीबिया (10 प्रतिशत) का स्थान आता है। हालांकि, रूस इसमें एक छोटा खिलाड़ी है, जो लगभग 5 प्रतिशत उत्पादन करता है, जबकि यू.एस. और यूरोप 1 प्रतिशत से कम उत्पादन करते हैं, लेकिन कजाकिस्तान में जितना उत्पादन होता है, उसे वैश्विक बाजार तक पहुंचने के लिए रूस के रास्ते ही गुजरना पड़ता है। वहीं, आपूर्ति श्रृंखला के अन्य हिस्से भी रूस से होकर गुजरते हैं। दुनिया में केवल कुछ ही परमाणु सुविधाएं मिल्ड यूरेनियम को यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड में परिवर्तित करती हैं। रूस ने साल 2020 की आपूर्ति का लगभग एक-तिहाई उत्पादन किया था, इसका अधिकांश हिस्सा कजाकिस्तान से आयात किए गये यूरेनियम से बनाया गया था।

रूस क्यों बन जाता है बड़ा खिलाड़ी
असल में, रूस के पास वैश्विक संवर्धन क्षमता का 43 प्रतिशत है, इसके बाद यूरोप (लगभग 33 प्रतिशत), चीन (16 प्रतिशत) और यू.एस. (7 प्रतिशत) का स्थान है। अमेरिका और यूरोप में कुछ अतिरिक्त क्षमता है, और फिलहाल चीन इसका विस्तार ही कर रहा है। यूक्रेन पर आक्रमण करने से पहले, रूस के पास अपने परमाणु ऊर्जा निर्यात को बढ़ाने के लिए एक राष्ट्रीय रणनीति थी। यह परमाणु रिएक्टरों का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता है और विदेशों में संयंत्रों का निर्माण भी करता है और फिर अपना ईंधन उन संयंत्रों को प्रदान करता है। इसके ग्राहकों में पूर्व सोवियत राज्य और वारसॉ संधि के सदस्य देश, जैसे हंगरी और इजिप्ट जैसे देश शामिल हैं।

अमेरिका भी है रूस पर निर्भर
सबसे दिलचस्प बात ये है, कि यू.एस. की वार्षिक आपूर्ति का लगभग 16 प्रतिशत -20 समृद्ध यूरेनियम न्यूक्लियर ईंधन की आपूर्ति रूस करता है।ष कई यूरोपीय देश परिवर्तित या समृद्ध रूसी यूरेनियम खरीदते हैं, जबकि, चीन रूसी परमाणु निर्यात के लिए एक बढ़ता हुआ बाजार है। यदि रूस के साथ अमेरिकी परमाणु व्यापार यूक्रेन संघर्ष से प्रभावित होता है, तो सबसे गंभीर प्रभाव दो प्लान्ड एडवांस रिएक्टर डिमांसट्रेशन परियोजनाओं पर होगा, जो अमेरिका के वॉशिंगटन राज्य में हैं। क्योंकि, इन रिएक्टरों को ईंधन की आवश्यकता होती है जो लगभग 20 प्रतिशत यूरेनियम -235 तक समृद्ध होता है, और रूस वर्तमान में दुनिया का एकमात्र आपूर्तिकर्ता है।

यूक्रेन संकट से परमाणु बाजार पर असर
जापान में फुकुशिमा परमाणु आपदा के बाद भी वैश्विक बाजार में यूरेनियम की कीमतें पिछले एक दशक में कम ही थीं और इसकी कीमत 20 डॉलर प्रति पाउंड से 30 डॉलर प्रति पाउंड के बीच ही थी। लेकिन, साल 2021 और 2022 की शुरुआत में कजाकिस्तान में घरेलू विरोध की वजह से बाजार पर असर पड़ा और यूरेनियन की कीमत में इजाफा हो गया। वहीं अब यूक्रेन युद्ध के बाद अब यूरेनियम की कीमत बढ़कर 60 डॉलर प्रति पाउंड हो गया है। चूंकी, बाजारों में यूरेनियम का खुले तौर पर कारोबार नहीं होता है, इसलिए सभी कीमतें सार्वजनिक नहीं होती हैं।

अमेरिका लगा सकता है प्रतिबंध
वहीं, बाइडेन प्रशासन कथित तौर पर रूस पर परमाणु प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है। यू.एस. यूटिलिटीज इस डर से इस कदम का विरोध करती हैं, कि इससे यूरेनियम ईंधन दुर्लभ और अत्यधित महंगा हो जाएगा। कई अमेरिकी परमाणु संयंत्र पहले से ही आर्थिक रूप से संघर्ष कर रहे हैं और अगर रूसी यूरेनियम पर प्रतिबंध लगाया जाता है, तो स्थिति काफी बिगड़ जाएगा। वहीं, यदि रूस परिवर्तित या समृद्ध यूरेनियम को रोककर पश्चिमी दबाव के खिलाफ जवाबी कार्रवाई करता है, तो अनुमान ये है, कि अगले 18 महीने से 2 साल में अमेरिका और यूरोपीय परमाणु संयंत्र बुरी तरह से प्रभावित हो जाएंगे। कुछ अमेरिकी उपयोगिताओं ने कहा है कि यूरेनियम रूपांतरण या संवर्धन सेवाओं के लिए अगर वे यूरोप, जापान या चीन की ओर रुख करते हैं तो काफी ज्यादा कीमतों का सामना करना पड़ेगा।
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