आखिर क्यों एक नहीं हो सकते हैं उत्तर- दक्षिण कोरिया?

किम जोंग-उन के साथ मून जे-इन
KOREA SUMMIT PRESS POOL/AFP/Getty Images
किम जोंग-उन के साथ मून जे-इन

'अब एक नया इतिहास शुरू हो रहा है. शांति का युग'

उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन ने दक्षिण कोरिया में दाखिल होने के बाद गेस्ट बुक में ये शब्द लिखे.

दुनिया के सबसे 'ख़तरनाक बॉर्डर' पर शुक्रवार सुबह अलग रंगत लिए हुए थी. दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे इन ने किम जोंग का अनुरोध माना और उत्तर कोरिया की सीमा में दाखिल हुए और फिर जोंग का हाथ पकड़े वापस दक्षिण कोरिया की तरफ आए.

मुस्कुराते किम जोंग का गर्मजोशी से स्वागत करने वाले मून जे इन ने भविष्य की ओर बढ़ने का इरादा जताया तो दोनों देशों के लाखों लोगों की उत्सुकता और उम्मीद बढ़ गईं.

इसकी वजह भी है. उत्तर कोरिया के किसी नेता को 'बॉर्डर लाइन' पार करने में 65 साल लगे और ऐसी शिखर वार्ता के लिए दोनों देशों ने 11 साल लंबा इंतज़ार किया.

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किम जोंग उन और मून जे इन
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किम जोंग उन और मून जे इन

इतिहास की टीस

किम जोंग उन ने भी कहा, "अगर हम सोच के स्तर पर करीब आ सकें तो 11 साल में हुए नुकसान की भरपाई हो सकती है."

उम्मीद के स्तर पर संभावित भरपाई का दायरा काफी बड़ा है. जिस इतिहास की बार-बार बात की जाती है, उसका एक सिरा दोनों देशों को साथ लाकर खड़ा कर देता है.

लेकिन ये सवाल भी बना रहता है कि क्या उत्तर और दक्षिण कोरिया कभी एक हो सकते हैं ?

ठीक उसी तरह जैसे 1990 में पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी ने बर्लिन की दीवार तोड़ दी थी. दूसरे विश्व युद्ध के बाद दो देशों में बंटा जर्मनी एक हो गया था.

जर्मनी की ही तरह कभी कोरियाई प्रायद्वीप एक था. साल 1910 से 1945 तक कोरियाई प्रायद्वीप पर जापान का शासन था.

दूसरे विश्व युद्ध में जापान के हथियार डालने के बाद सोवियत सेना ने उत्तरी हिस्से और अमरीका ने दक्षिणी हिस्सा को अधिकार में ले लिया.

कोरियाई सैनिक
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कोरियाई सैनिक

क्या एक होंगे दो देश?

1948 में दोनों हिस्सों ने रिपब्लिक होने का एलान किया. लेकिन दोनों के बीच विरोधाभास बना रहा और साल 1950 में इनके बीच संघर्ष शुरू हो गया.

साल 1953 में ये संघर्ष ख़त्म हुआ लेकिन टीस बनी रही.

इनके बीच कभी कोई संधि नहीं हुई.

और ये सवाल भी बना रहा कि क्या कभी ये दोनों देश पास आएंगे और फिर एक होंगे?

कुछ महीने पहले दक्षिण कोरिया का दौरा करने वाले बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव कहते हैं, " दक्षिण कोरिया में कई ऐसे उम्रदराज़ लोग हैं जिनमें एकीकरण की भावना बहुत ज़्यादा है. वो इतिहास के साथ जुड़े हैं और उनमें फिर से एक होने की उम्मीद है."

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एजेंडे पर नहीं एकीकरण

बदलते घटनाक्रम पर नज़र रख रहे विश्लेषकों का दावा है कि फिलहाल दोनों देश एक होने के बारे में नहीं सोच रहे हैं.

दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉक्टर स्वर्ण सिंह कहते हैं, "दोनों मुल्कों के एक होने की उम्मीद करना कोई ग़लत बात नहीं होगी. लेकिन इस वक़्त जो शिखर वार्ता हो रही है उसका उद्देश्य ये है कि किस तरह से उत्तर कोरिया के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को रोका जाए. मुझे नहीं लगता है कि इस मुलाक़ात में दोनों देशों के एक होने की कोई बात होगी."

डॉ. सिंह की राय है कि उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच बातचीत 'एकीकरण' की संभावना को धूमिल ही करती है.

वो कहते हैं, "अगर दक्षिण कोरिया और अमरीका उत्तर कोरिया और उसके नेता किम जोंग उन से बात करते हैं तो इससे उत्तर कोरिया को एक राष्ट्र के तौर पर मान्यता मिलती है. ऐसी वार्ताओं से एकीकरण की बात थोड़ी धीमी हो सकती है या टल सकती है क्योंकि उत्तर कोरिया अपने आपको पूरी तरह संप्रभु देश के तौर पर स्थापित करने में सक्षम हो जाएगा."

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राह में कई अड़चन

भाषा, संस्कृति और इतिहास में साझेदारी करने के बाद भी दोनों देशों के लिए 'बॉर्डर लाइन' को मिटाना आसान नहीं है.

नितिन श्रीवास्तव एकीकरण की संभावना के रास्ते में व्यावहारिक दिक्कतों का जिक्र करते हैं.

वो कहते हैं, "बीते 25 सालों में दक्षिण और उत्तर कोरिया में आर्थिक खाई बहुत चौड़ी हो गई है. दक्षिण कोरिया आर्थिक और तकनीक तौर पर बहुत उन्नत देश हो गया है. उत्तर कोरिया आज भी पुराने फैक्ट्री वाले मॉडल पर काम करता है. दक्षिण कोरिया की नई पीढ़ी उत्तर कोरिया के स्टाइल से खुद को जोड़ नहीं पाती. मेरी कई लोगों से बात हुई उन्हें लगता है कि अगर कभी एकीकरण हो गया तो ये एक ऐसा बोझ होगा जो उन्हें दस से बीस साल पीछे धकेल देगा."

वहीं, डॉ. सिंह याद करते हैं कि जर्मनी के एक होने के पहले वहां भी इस तरह के कई सवाल थे.

वो कहते हैं, "पश्चिमी जर्मनी में काफी शंकाएं थीं कि एकीकरण से फ़ायदा नहीं होगा बल्कि घाटा होगा क्योंकि पूर्वी जर्मनी विकसित नहीं था. इस तरह की सोच दक्षिण कोरिया में भी हो सकती है कि उन्हें फ़ायदा नहीं होगा. वजह ये है कि उत्तर कोरिया बहुत पिछड़ा देश है."

मून जे इन
Reuters
मून जे इन

सीमा बदलना आसान नहीं

अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर नज़र रखने वाले विश्लेषकों की राय है कि मौजूदा विश्व में देशों की सीमाएं बदलना आसान नहीं है.

डॉ. सिंह भी ऐसी ही राय रखते हैं. वो कहते हैं, "1990 में सोवियत संघ का विघटन बहुत बड़ी घटना थी. इसकी वजह से बहुत से देशों में बदलाव आया. जर्मनी का एकीकरण भी ऐसे ही बदलावों में शामिल था. आज विश्व में स्थिरता है और कोरियाई प्रायद्वीप में बदलाव होना आसान नहीं है."

दक्षिण कोरिया में तमाम लोग भले ही दोनों मुल्कों के एक होने के विचार को परे धकेल देते हों लेकिन उनमें उत्तर कोरिया को लेकर बहुत उत्सुकता है.

नितिन श्रीवास्तव बताते हैं, "दक्षिण कोरिया के लोगों में ये जानने की बहुत ज़्यादा उत्सुकता है कि उत्तर कोरिया में क्या हो रहा है. एक तबका है जिन्हें ये पता है कि वहां क्या हो रहा है. उनके रिश्तेदार आज भी वहां रहते हैं. वो बताते हैं कि वहां हालात चुनौती भरे हैं."

कूटनीति के जानकारों की राय है कि बदलाव की राह पर चाहत की बात करने से ज़्यादा जरूरी ये देखना है कि वास्तविकता के धरातल पर संभव क्या है?

डॉ. सिंह कहते हैं, "दोनों देशों में दोस्ती और हिस्सेदारी बनी रहे. ये यथार्थवादी सोच होगी. भविष्य में अगर दोस्ती बनी रहती है तो दोनों देश एक होने के बारे में भी सोच सकते हैं. लेकिन उसके अच्छे बुरे परिणाम सबको सोचने होंगे "

वो ये भी कहते हैं, "दक्षिण कोरिया के पास आर्थिक ताकत है. उत्तर कोरिया के पास परमाणु शक्ति है. मजबूत, संपन्न और एकजुट कोरिया दूसरे देशों के लिए भी चुनौती बन सकते हैं. लेकिन इस दिशा में बहुत जल्दी कुछ बदलने वाला नहीं है. कोशिशें धीमे-धीमे ही हो सकती हैं."

उत्तर और दक्षिण कोरिया के नेता भी जानते हैं कि 'दिल जोड़ने' से पहले दूरियां पाटना जरूरी है.

दोनों मुल्कों को बांटने वाली सैन्य रेखा को पार करने करने वाले किम जोंग उन ने इसे शांति का 'शुरुआती बिंदू' बताया है लेकिन ये वक़्त ही तय करेगा कि आगे का रास्ता क्या होगा.

एकजुटता की हिमायत करने वालों का हौसला किम के ये शब्द बढ़ा सकते हैं, " जब हम मिले तो हमने महसूस किया कि हम अलग नहीं हो सकते. हम एक देश हैं. मैं ऐसा ही महसूस करता हूं."

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