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नोबेल विजेता हरगोबिंद खुराना का पाकिस्तान कनेक्शन

हरगोबिंद खुराना को 1968 में चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार मिला और सुब्रमण्यम चंद्रशेखर को 1983 में भौतिकी में नोबेल पुरस्कार मिला था. इन दोनों का पाकिस्तान कनेक्शन जानिए.

गवर्नमेंट कॉलेज यूनिवर्सिटी, लाहौर
Getty Images
गवर्नमेंट कॉलेज यूनिवर्सिटी, लाहौर

यह तब की बात है जब मलाला यूसुफ़ज़ई को नोबेल पुरस्कार नहीं मिला था और पाकिस्तान के हिस्से में केवल एक ही नोबेल पुरस्कार था. गवर्नमेंट कॉलेज यूनिवर्सिटी, लाहौर के आख़िरी प्रिंसिपल और गवर्नमेंट कॉलेज (जीसी) यूनिवर्सिटी लाहौर के पहले वाइस चांसलर डॉक्टर ख़ालिद आफ़ताब ने एक समारोह को संबोधित करते हुए कहा था कि ''पाकिस्तान के पास केवल एक नोबेल पुरस्कार है और जीसी यूनिवर्सिटी के पास दो.'' दूसरे नोबेल पुरस्कार से उनका मतलब 1968 में चिकित्सा के क्षेत्र में डॉक्टर हरगोबिंद खुराना को मिले नोबेल पुरस्कार से था. इस आलेख में हम लाहौर के पाँच नोबेल पुरस्कार विजेताओं की कहानी बता रहे हैं, जिनमें से दो गवर्नमेंट कॉलेज यूनिवर्सिटी, लाहौर के ही थे. शनिवार को इस यूनिवर्सिटी की स्थापना के 158 साल पूरे हो गए.

डॉक्टर हरगोबिंद खुराना

डॉक्टर हरगोबिंद खुराना का जन्म 9 जनवरी, 1922 को मुल्तान के पास रायपुर के एक ग़रीब परिवार में हुआ था. उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज यूनिवर्सिटी लाहौर से ग्रेजुएशन की और उसके बाद एक सरकारी छात्रवृत्ति पर इंग्लैंड चले गए. वहां उन्होंने 1948 में लिवरपूल यूनिवर्सिटी से पीएचडी पूरी की. उन्होंने 1960 के दशक में डीएनए पर शोध किया, जिसके लिए उन्हें 1968 में चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. साल 2011 में डॉक्टर हरगोबिंद खुराना का निधन हुआ. 9 जनवरी, 2020 को डॉक्टर हरगोबिंद खुराना के 98वें जन्मदिन के अवसर पर, जीसी यूनिवर्सिटी, लाहौर ने उनके नाम पर एक शोध पीठ की स्थापना का एलान किया. इस अवसर पर आयोजित एक समारोह में डॉक्टर हरगोबिंद खुराना के जन्मदिन का केक भी काटा गया.

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सुब्रमण्यम चंद्रशेखर

लाहौर के ही एक और नोबेल पुरस्कार विजेता सुब्रमण्यम चंद्रशेखर थे, जिनका जन्म 19 अक्टूबर, 1910 को लाहौर में हुआ था. उन्होंने प्रेज़िडेंसी कॉलेज, मद्रास से उच्च शिक्षा हासिल की और आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए. वहां उन्होंने 1933 में कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएचडी की. उन्होंने खगोल विज्ञान के क्षेत्र में शोध किया और किसी तारे के जन्म, विकास और मृत्यु के क्षणों पर विस्तार से चर्चा की. उनका ये शोध 1939 में उनकी किताब 'एन इंट्रोडक्शन टू दि स्टडी ऑफ़ स्टेलर स्ट्रक्चर' में प्रकाशित हुआ था. उसी समय, उनका नाम नोबेल पुरस्कार के लिए चर्चा में आया, लेकिन प्रसिद्ध खगोलशास्त्री सर आर्थर एडिंगटन ने उनके शोध के बारे में आपत्ति जताई. एडिंगटन की आपत्ति के कारण, चंद्रशेखर को सही समय पर तो नोबेल पुरस्कार नहीं मिला, लेकिन 1983 में, जब उनका ये शोध सही साबित हुआ, तो उन्हें भौतिकी में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. सुब्रमण्यम चंद्रशेखर, 1930 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित सर सीवी रमन के भतीजे थे. वे भौतिकी में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले उपमहाद्वीप के तीसरे वैज्ञानिक थे. सुब्रमण्यम चंद्रशेखर का निधन 21 अगस्त, 1995 को शिकागो, अमेरिका में हुआ था.

डॉक्टर अब्दु सलाम

डॉक्टर हरगोबिंद खुराना के बाद जीसी यूनिवर्सिटी, लाहौर के जिस वैज्ञानिक को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया, वे थे डॉक्टर अब्दुस सलाम. डॉक्टर अब्दुस सलाम का जन्म 29 जनवरी, 1926 को साहिवाल ज़िले के संतोक दास गाँव में हुआ था. झंग में अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज यूनिवर्सिटी, लाहौर से एमएससी किया. एमएससी में प्रथम श्रेणी से पास होने पर उन्हें उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति मिली. उसके बाद वे 1946 में ब्रिटेन की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी चले गए, जहाँ उन्होंने ऑप्टिकल फ़िज़िक्स में पीएचडी की. 1951 में, डॉक्टर अब्दुस सलाम अपने देश वापस आए और पहले गवर्नमेंट कॉलेज यूनिवर्सिटी, लाहौर और फिर पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ाने लगे. 1954 में वे फिर से इंग्लैंड चले गए. वहां भी वे अध्यापन के क्षेत्र से जुड़े रहे.

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1964 में, डॉक्टर अब्दुस सलाम ने, इटली के ट्राइस्टे शहर में इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर ऑप्टिकल फ़िज़िक्स की स्थापना की. 1979 में उन्हें भौतिकी में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. यह पुरस्कार पाने वाले वह पहले पाकिस्तानी थे. उन्हें पाकिस्तान सरकार ने शानदार प्रदर्शन के लिए मिलने वाले राष्ट्रपति पुरस्कार, 'सितारा-ए-इम्तियाज़' और 'निशान-ए-इम्तियाज़' से नवाज़ा. उन्हें दुनिया भर की 36 विश्वविद्यालयों ने डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया था. इसके अलावा उन्हें 22 देशों ने बड़े-बड़े पुरस्कारों से सम्मानित किया था, जिनमे जॉर्डन का निशान-ए-इस्तिक़लाल, वेनेजुएला का आंद्रे बेलो, इटली का मेरिट, हॉपकिंस प्राइज़, एडम्स प्राइज़, मैक्सवेल मेडल, शांति के लिए एटम प्राइज़, गुथेरी मेडल जैसे पुरस्कार शामिल हैं. डॉक्टर अब्दुस सलाम ने ऑप्टिकल भौतिकी और तीसरी दुनिया के शैक्षिक और वैज्ञानिक विषयों पर 300 से अधिक शोधपत्र लिखे, जिनमें से कुछ किताबी संकलन के रूप में प्रकाशित हो चुके हैं. डॉक्टर अब्दुस सलाम का नवंबर 1996 में लंदन में निधन हो गया था. उन्हें रबवाह में दफ़न किया गया. इन दोनों के अलावा लाहौर से तीन और नोबेल पुरस्कार विजेताओं का संबंध रहा है. इनमें भौतिकी के दो विद्वानों सुब्रमण्यम चंद्रशेखर और आर्थर होली कॉम्पटन के अलावा साहित्य के दिग्गज रुडयार्ड किपलिंग शामिल हैं.

रुडयार्ड किपलिंग
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रुडयार्ड किपलिंग

रुडयार्ड किपलिंग

इनमें सबसे पहले रुडयार्ड किपलिंग को 1907 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था. दूसरे आर्थर होली कॉम्पटन थे, जिन्हें 1927 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. रुडयार्ड किपलिंग का जन्म 1865 में बॉम्बे में हुआ था. उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा इंग्लैंड में प्राप्त की, लेकिन 16 साल की उम्र में वो भारत आ गए. उन्होंने अपना करियर एक पत्रकार के रूप में शुरू किया और सिविल और मिलिट्री गज़ट लाहौर के उप-संपादक के रूप में काम करना शुरू कर किया. उनके समय में अख़बार के प्रकाशन और लोकप्रियता में काफ़ी वृद्धि हुई. उन्होंने लाहौर के बारे में भी बहुत कुछ लिखा. 1889 में वे इंग्लैंड चले गए, जहां उन्होंने कई लघु कथाएं और उपन्यास लिखे. रुडयार्ड किपलिंग के लेखन के पात्र अंग्रेज़ हैं, लेकिन वातावरण भारतीय है और यही उनके लेखन की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण माना जाता है. रुडयार्ड किपलिंग को महज 42 साल की उम्र में 1907 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था. वह अभी भी साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाले दुनिया के सबसे कम उम्र के व्यक्ति हैं. रुडयार्ड किपलिंग का धन 18 जनवरी, 1936 को हुआ था.

आर्थर होली कॉम्पटन
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आर्थर होली कॉम्पटन

आर्थर होली कॉम्पटन

लाहौर के ही एक और व्यक्ति आर्थर होली कॉम्पटन थे. उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी की कैमिस्ट्री विभाग की प्रयोगशाला में किया. उन्हें 1927 में इलेक्ट्रॉन और फ़ोटॉन के आपस में टकराने से उत्पन्न होने वाले प्रभाव पर किये गए शोध के लिए, भौतिकी में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. इस प्रभाव को उनके नाम की वजह से कॉम्पटन प्रभाव या कॉम्पटन इफ़ेक्ट कहा जाता है. आर्थर होली कॉम्पटन का निधन 1962 में हुआ था.

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