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किसान आंदोलन से धधक उठा यूरोप का ये देश, कई देशों में फैली चिंगारी, रोटी के लिए तरसेगी दुनिया!

नीदरलैंड में किसानों का बहुत बड़ा प्रदर्शन शुरू हो चुका है और हजारों की तादाद में किसान ट्रैक्टर्स के साथ सड़कों पर उतर आए हैं।

एम्सटर्डन, जुलाई 11: यूक्रेन युद्द पहले से ही वैश्विक पेट्रोलियम संकट को बढ़ाकर रखा हुआ है और ऊर्जा संकट की वजह से कई देशों की अर्थव्यवस्था चौपट होने के करीब आ चुकी है, वहीं यूक्रेन संकट ने पहले से ही वैश्विक खाद्य संकट को बढ़ाकर रखा था, लेकिन यूरोपीय देश नीदरलैंड में शुरू हुए किसानों के प्रदर्शन से पूरी दुनिया दो रोटी के लिए तरस सकती है। नीदरलैंड में किसानों का शुरू हुआ प्रदर्शन वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए दोहरी मार मानी जा रही है और तमाम वैश्विक नेता परेशानी में आ गये हैं।

बहुत बड़े खाद्यान्न संकट में फंसी दुनिया

बहुत बड़े खाद्यान्न संकट में फंसी दुनिया

नीदरलैंड में किसानों का बहुत बड़ा प्रदर्शन शुरू हो चुका है और हजारों की तादाद में किसान ट्रैक्टर्स के साथ सड़कों पर उतर आए हैं, लिहाजा अब यूरोपीय संघ को खाद्य सुरक्षा को ग्रीन इनवायरोमेंट के बीच संतुलित करना होगा, अन्यथा न केवल इस किसान आंदोलन के नतीजे वैश्विक खाद्य श्रृंखला पर असर डालेंगे, बल्कि प्रभावित देशों में मुद्रास्फीति को काफी ज्यादा बढ़ा जाएंगे। रूस और पश्चिम एशिया के तेल उत्पादकों पर प्रतिबंध के कारण तेल की कीमतें अपने उच्चतम स्तर पर है और उत्पादन में कटौती की वजह से तेल कंपनियां अप्रत्याशित लाभ कमा रही हैं, और अगर वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखला खतरे में पड़ती है, तो फिर छोटी अर्थव्यवस्थाओं वाले कई देशों की स्थिति पूरी तरह से श्रीलंका जैसी हो जाएगी और श्रीलंका जैसी तस्वीरें कई और देशों से आनी शुरू हो जाएंगी।

नीदरलैंड में सड़कों पर क्यों उतरे किसान?

नीदरलैंड में सड़कों पर क्यों उतरे किसान?

यूक्रेन युद्ध रूस और पश्चिमी ब्लॉक के लिए एक युद्ध का मैदान बन गया है और यूक्रेन में शांति स्थापित होगी, इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है। वहीं, नीदरलैंड में प्रदूषकों के उत्सर्जन पर रोक लगाने के प्रस्ताव का विरोध करते हुए हजारों किसान अपने पशुओं और ट्रैक्टर्स के साथ सड़कों पर सरकार के इस फैसले को चुनौती देने उतर आए हैं। दरअसल, नीदरलैंड की सरकार ने साल 2030 तक देश में नाइट्रोजन और अमोनिया गैस के उत्पादन को करीब 50 से 70 प्रतिशत तक कम करने का लक्ष्य रखा है और इसके लिए सरकार ने 22 अरब पाउंड की योजना भी बनाई है, लेकिन किसानों के सड़क पर उतरने के बाद नीदरलैंड सरकार के इस फैसले का क्या होगा, कहा नहीं जा सकता है। अगर किसान नहीं मानते हैं, तो यूरोपीय संघ को भी खाद्य सुरक्षा और के बीच एक कठिन विकल्प का सामना करना पड़ेगा। अन्य देशों की तरह हरित पर्यावरण को देखते हुए सरकार के इस फैसले के विरोध में किसानों में काफी एकजुटता दिख रही है।

कई और देशों से डच किसानों का समर्थन

नीदरलैंड में किसानों के प्रदर्शन को जर्मनी, इचली, स्पेन और पोलैंड के किसानों का समर्थन मिल रहा है और इन देशों के किसानों ने एकजुटता दिखाने के लिए प्रदर्शन करना शुरू कर दिया है। इन देशों के किसानों को भी डर है, कि उनके देश की सरकारें भी यूरोपीय संघ के नियमों का पालन करने के लिए इसी तरह की योजना को लागू कर सकती है। 6 जून को, जर्मन किसानों ने डच-जर्मन सीमा पर सड़कों को जाम कर दिया था और हेरेनबर्ग शहर के पास विरोध करने के लिए बड़ी संख्या में एकत्र हुए थे। वहीं, इटली के किसान भी अपने ट्रैक्टर्स के साथ सड़कों पर उतर आए और ग्रामीण इलाकों में ट्रैक्टर विरोध प्रदर्शन किया गया। वहीं, इस विरोध प्रदर्शन की आग रोम में भी फैलने की आशंका है। जबकि, पोलैंड के किसानों ने उच्च ब्याज दरों के खिलाफ राष्ट्रीय राजधानी की सड़कों पर कब्जा कर लिया, जिसने उत्पादन को अस्थिर कर दिया है और उनकी आजीविका को खतरे में डाल दिया है। उन्होंने सस्ते खाद्य आयात की अनुमति देने के लिए भी सरकार को दोषी ठहराया है। बढ़ती मुद्रास्फीति की गर्मी स्पेन में भी पहुंच गई है जहां किसानों ने उच्च ईंधन की कीमतों और आवश्यक उत्पादों की बढ़ती लागत के खिलाफ अंडालूसिया के दक्षिणी क्षेत्र में राजमार्गों को जाम कर दिया है।

किसानों को शांत करने के लिए कदम

किसानों को शांत करने के लिए कदम

यूरोप के कई देशों के किसानों के इस विरोध प्रदर्शन ने यूरोपीय संघ को परेशान कर दिया है और किसानों को शांत करने के लिए यूरोपीय संघ की संसद ने एक प्रस्ताव जारी किया है, जिसमें भारत की "विकृत" चीनी सब्सिडी की निंदा करते हुए, इसे विश्व व्यापार संगठन के कृषि समझौते के खिलाफ और यूरोपीय संघ के चीनी उत्पादक के लिए हानिकारक बताया है। हालांकि प्रस्ताव ने यूरोपीय चीनी उद्योग को कुछ राहत की पेशकश की, लेकिन विरोध में कोई ढील नहीं दी गई। आपको बता दें कि, नीदरलैंड में कृषि क्षेत्र में सभी नाइट्रोजन उत्सर्जन का 45% हिस्सा है और डच सरकार की योजना के तहत, किसान को अपने पशुओं द्वारा उत्पादित नाइट्रस ऑक्साइड और अमोनिया उत्सर्जन की मात्रा को काफी कम करना होगा। इसका मतलब है कि कई खेतों को छोटा करने के लिए मजबूर किया जाएगा और कुछ को स्थायी रूप से बंद कर दिया जाएगा। जबकि सरकार ने कृषि आवास और प्रौद्योगिकी में बड़े निवेश की घोषणा की है, उनके पास किसानों को अपनी जमीन बेचने के लिए मजबूर करने का विकल्प भी होगा, अगर सरकार को नई टेक्नोलॉजी के लिए किसान नहीं मिलते हैं।

नीदरलैंड सरकार की कोशिश क्या है?

दरअसल, डच सरकार की योजना साल 2030 तक 30 प्रतिशत खेतों को व्यापार से बाहर करना हो सकता है। यूरोपीय संघ के "ग्रीन डील" का पालन करने का प्रयास, जो देश के आकर्षक कृषि क्षेत्र को मौलिक रूप से सचेत कर सकता है, उसने डच किसानों को बीच मंछधार में छोड़ दिया है और किसान अपनी आजीविका और कृषि उद्योग को लेकर अनिश्चित हो गये हैं, लिहाजा डच किसानों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। हजारों नाराज किसानों ने अपने ट्रैक्टरों के साथ बंदरगाहों, हवाई अड्डों, सड़कों के साथ-साथ सुपरमार्केट वितरण केंद्रों को जाम कर दिया है और नीदरलैंड की सड़कों पर किसान पुआल जला रहे हैं। विरोध तेज होने के कारण सुपरमार्केट में खाना खत्म हो चुके हैं और अन्य क्षेत्रों ने भी विरोध प्रदर्शन में शामिल होना शुरू कर दिया है। किसानों का साथ मछुआरों ने दिया है और उन्होंने बंदरगाहों को जाम कर दिया है। हालांकि, अभी के लिए, डच प्रधानमंत्री मार्क रूट ने अपनी इस योजना का बचाव करते हुए कहा है कि, बढ़ती मुद्रास्फीति के बीच लोगों की मदद करने के लिए "एक सरकार क्या कर सकती है" की एक सीमा है। हालांकि, प्रधानमंत्री का ये जवाब वो नहीं है, जो एक आम आदमी अपनी सरकार से सुनना चाहता है।

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