नेपाल में कई ‘केजरीवाल’ ठोक रहे ताल, पीएम शेर बहादुर देउबा को खुद की सीट बचाना हुआ मुश्किल

नेपाल के नए युवा नेताओं को जनता से खूब डिजिटल समर्थन तो मिल रहा है लेकिन यह वोट के रूप में बदलता है या नहीं इसका पता 8 दिसंबर को होने वाले चुनाव परिणाम में ही चलेगा।

नेपाल में अगले रविवार यानी कि 20 नवंबर को आम चुनाव होने वाले हैं। भले ही इस बार चुनाव दो बड़े गठबंधनों के बीच हो रहा है मगर इस बार चर्चा स्वतंत्र उम्मीदवारों की हो रही है। ऐसा दावा किया जा रहा है कि ये नए युवा राजनेता कुछ बड़ा उलटफेर कर सकते हैं। इसकी वजह राजतंत्र को छोड़ लोकतंत्र अपनाने वाले नेपाल में लंबे समय से जारी राजनीतिक अस्थिरता है। पिछले 32 साल में नेपाल में 28 सरकारें बदल चुकी हैं और कोई भी सरकार पांच साल का अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई है।

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बालेन शाह के चुनाव जीतने के बाद आया बदलाव

बालेन शाह के चुनाव जीतने के बाद आया बदलाव

लोकशाही कायम होने के बाद भी कोई भी पार्टी 5 सालों तक सरकार नहीं चला पाई है। पिछली बार केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में वामपंथी गठबंधन को दो तिहाई बहुमत मिला था मगर उन्होंने खुद ही वादाखिलाफी कर संसद भंग कर डाला। नेपाल की जनता में इससे भारी गुस्सा है। ऐसे में लोग ऐसे नेता को चुनना चाह रहे हैं तो स्थापित राजनीतिक तंत्र को चुनौती दे सके। नेपाल में स्वंतत्र उम्मीदवार बालेन शाह के काठमांडो के मेयर चुने जाने के बाद स्थिति में जबरदस्त बदलाव आया है। बालेन शाह ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की पार्टी के वामपंथी उम्मीदवार को हराया। इसके बाद तो जैसे पूरे देश में स्वतंत्र उम्मीदवारों की उम्मीदों को पंख लग गए हैं। हर कोई पुराने नेताओं के खिलाफ पनपे निराशा के भाव को भुना लेना चाहता है।

पूरे नेपाल में रबि लामिछाने की चर्चा

पूरे नेपाल में रबि लामिछाने की चर्चा

ऐसे माहौल में सबसे अधिक चर्चा रबि लामिछाने की हो रही है। रबि लामिछाने ने खोजी पत्रकारिता के दम पर पूरे नेपाल में अपना एक अलग फैनबेस बना लिया है। उनके नाम सबसे लंबे समय तक टॉक शो करने का रिकॉर्ड भी है। हाल ही में पूर्व पत्रकार रबि लामिछाने ने राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का गठन किया है। उनकी ताकत का अंदाजा इस बार से लगाया जा सकता है कि उनसे डरकर पूर्व पीएम पुष्प दहल प्रचंड तक अपनी पसंदीदा सीट छोड़ चुके हैं। रबि चार साल पहले ही अपनी अमेरिकी नागरिकता छोड़ चुके हैं मगर विपक्षी उनके बारे में अभी भी विदेशी होने का भ्रम फैला रहे हैं।

शेर बहादुर देउबा के खिलाफ लड़ रहे सागर ढकाल

शेर बहादुर देउबा के खिलाफ लड़ रहे सागर ढकाल

रबि लामिछाने के बाद सबसे अधिक चर्चा जिस उम्मीदवार की हो रही है वह हैं सागर ढकाल। इस नौजवान की चर्चा इसलिए इतनी अधिक हो रही है क्योंकि वह मौजूदा प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के खिलाफ डडेलधुरा से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। ढकाल मात्र 31 साल के हैं और हाइड्रो मैकेनिकल इंजीनियरिंग से स्नातक हैं। इसके साथ वे ऑक्सफोर्ड से पॉलिसी और मैनेजमेंट की डिग्री भी हासिल कर चुके हैं। ढकाल ने कहा कि अगले 50 सालों में नेपाल का विकास कैसे हो सकता है... ये सोचकर वे राजनीति में आए हैं।

पेशे से डॉक्टर तोशिमा कार्की भी हो रही चर्चा

पेशे से डॉक्टर तोशिमा कार्की भी हो रही चर्चा

तोशिमा कार्की ललितपुर से रबि लामिछाने की पार्टी से चुनाव लड़ रही हैं। तोशिमा कार्की ग्रेटर काठमांडो के ललितपुर में जनरल सर्जन हैं और नेपाल मेडिकल काउंसिल की सदस्य हैं। इससे पहले चुनाव आयोग ने यह कहते हुए उनकी उम्मीदवारी रद्द कर दी थी कि वे 'लाभ के पद' पर हैं। तोशिमा कार्की ने सागर ढकाल को अपना सर्मथन देते हुए मौजूदा पीएम शेर बहादुर देउबा को आराम करने की सलाह दी थी। इसकी खूब चर्चा हुई थी। तोशिमा कार्की और सागर ढकाल ने पांच साल पहले पीएम से एक कार्यक्रम में सवाल पूछा था जिस पर वे काफी नाराज हो गए थे। नेपाली पीएम ने कहा था 'आप बहुत ज्यादा बोलती हैं'। इसके बाद ही ये दोनों युवा नेता चर्चा में आए थे।

#NoNotAgain के जरिए युवाओं जता रहे नाराजगी

#NoNotAgain के जरिए युवाओं जता रहे नाराजगी

नेपाल के युवा अब मौजूदा और 'पारंपरिक' नेताओं पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। नेपाल के युवाओं के बीच हैशटैग '#NoNotAgain' सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह फैल चुका है। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि खुद सुप्रीम कोर्ट ने इसे वैद्यता दे दी है। दरअसल 'नो, नॉट अगेन' मतलब 'नहीं, इस बार नहीं' नाम के फेसबुक पेज पर रोक लगाने की नेपाली चुनाव आयोग ने मांग की थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ बताते हुए इसे खारिज कर दिया।

पुराने नेताओं के खिलाफ नारजगी को भुना पाएंगे युवानेता?

पुराने नेताओं के खिलाफ नारजगी को भुना पाएंगे युवानेता?

'#NoNotAgain' के फेसबुक पेज के नीचे यह नारा लिखा है कि सोच बदलो, वोट बदलो। बीते हफ्ते में इस नारे ने काफी लहर पैदा की है। 'मुझे एक बार मूर्ख बनाया तो तुम शर्म करो, मुझे दो बार मूर्ख बनाया तो यह मेरे लिए शर्मनाक'। नये युग के ये नेता कहते हैं कि नेपाल उन उम्रदराज लोगों के लिए कुर्सी का खेल है जिन्हें सत्ता के लिए पार्टियां बदलने में कोई शर्म नहीं महसूस होती। नेपाल के नए युवा नेताओं को जनता से खूब डिजिटल समर्थन तो मिल रहा है लेकिन यह वोट के रूप में बदलता है या नहीं इसका पता 8 दिसंबर को होने वाले चुनाव परिणाम में ही चलेगा।

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