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Nepal Election: हिन्दू राष्ट्र बनेगा या होगा चीन का 'गुलाम', कल नेपाल करेगा भविष्य का फैसला

नेपाल में कल होने जा रहे चुनाव में 275 संसदीय सीट और 7 प्रांतों की 550 विधानसभा सीटों पर एक साथ वोट डाले जाएंगे। नेपाल में केन्द्र और राज्य सरकारों के चुनाव एक साथ होते हैं।

Nepal Eletion 2022: नेपाल के करीब एक करोड़ 80 लाख मतदाता कल देश की अगली सरकार के साथ साथ नेपाल के भविष्य का भी फैसला करेंगे और कल वोट डालने के साथ ही तय हो जाएगा, कि नेपाल भविष्य में फिर से हिन्दू राष्ट्र बनेगा या फिर हमेशा के लिए चीन का 'गुलाम' बन जाएगा। नेपाल में कल एक साथ केन्द्र सरकार के साथ साथ विधानसभाओं के लिए भी वोट डाले जाएंगे और साल 2015 में नेपाली संविधान में किए गये विवादास्पद बदलाव के बाद देश में दूसरी बार आम चुनाव होने जा रहे हैं। लिहाजा, आइये जानते हैं नेपाल चुनाव पर हर वो जानकारी, जो आप जानना चाहते हैं।

नेपाल चुनाव को समझिए

नेपाल चुनाव को समझिए

नेपाल में कल होने जा रहे चुनाव में 275 संसदीय सीट और 7 प्रांतों की 550 विधानसभा सीटों पर एक साथ वोट डाले जाएंगे। नेपाल में केन्द्र और राज्य सरकारों के चुनाव एक साथ होते हैं। नेपाल की संविधान के मुताबिक, देश की 275 संसदीय सीटों में से 165 सीटों पर 'फर्स्ट पास्ट द पोस्ट' (FPTP) सिस्टम से चुने जाएंगे और बाकी बचे 110 सीटों को प्रोपर्सनल रिप्रजेंटेशन (PR) यानि, आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के जरिए भरे जाएंगे। वहीं, सात प्रांतीय विधानसभाओं की कुल 330 सीटों पर सीधे वोटिंग के जरिए फैसला होगा, जबकि बाकी बचे 220 सीटों को आनुपातिक प्रतिनिधित्व से भरा जाएगा।

नेपाल में कैसे होता है मतदान?

नेपाल में कैसे होता है मतदान?

नेपाल चुनाव में प्रत्येक मतदाता चार मतपत्रों पर मुहर लगाएगा और उन्हें अलग-अलग बक्सों में डालेगा। संघीय संसद और प्रांतीय विधायिका के लिए प्रत्येक एफपीटीपी उम्मीदवारों के लिए एक और केंद्र और प्रांतों में पार्टियों के लिए एक-एक वोट डालेगा। प्रत्येक पार्टी द्वारा मतदान की संख्या पीआर प्रणाली के तहत केंद्रीय और प्रांतीय विधानसभाओं में प्राप्त होने वाली सीटों की संख्या निर्धारित करेगी। नेपाल चुनाव कुछ कुछ इजरायल में होने वाले चुनाव की तरह है, जहां एक पार्टी को एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में मान्यता प्राप्त करने और पीआर के तहत सुरक्षित सीटों के लिए, उसे संघीय संसद में एफपीटीपी के तहत कम से कम एक सीट और कम से कम 3 प्रतिशत वोट से जीतना होगा। नेपाल चुनाव आयोग ने चुनाव में होने वाली हिंसा और धांधली की आशंकाओं के बावजूद एक ही दिन में चुनाव कराने का फैसला किया है, क्योंकि "यह अधिक व्यावहारिक और पैसे बचाने वाला होगा"।

नेपाल की अस्थिर राजनीति

नेपाल की अस्थिर राजनीति

नेपाल की राजनीति हमेशा से अस्थिर रही है और साल 1990 के बाद से अभी तक नेपाल में 32 बार सरकारें बदल चुकी हैं, खासतौर पर पिछले 14 सालों में नेपाल 10 सरकारें बदल चुकी है, जब साल 2008 में राजशाही को खत्म कर दिया गया था। देश के नेताओं ने तब "स्थिर सरकार, लोकतंत्र की रक्षा और आर्थिक समृद्धि और भ्रष्टाचार मुक्त शासन के सामूहिक वादे किए थे"। लेकिन, ये वादे पूरी तरह से फेल साबित हुए हैं और नेपाल के नेता भ्रष्टाचार के लिए बुरी तरह से बदनाम हुए हैं। लिहाजा, इस बार होने वाली चुनाव को लेकर भी ज्यादातर एक्सपर्ट्स के मन में राजनीतिक अस्थिरत को लेकर गहरी शंका है।

नेपाल चुनाव: पार्टियां, गठबंधन, नेता

नेपाल चुनाव: पार्टियां, गठबंधन, नेता

नेपाल में होने वाला चुनाव मुख्य तौर पर दो गठबंधनों के बीच होगा। प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा की नेपाली कांग्रेस (NC) के नेतृत्व में सत्तारूढ़ गठबंधन है, जिसमें पुष्प कमल दहल प्रचंड की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल-माओवादी सेंटर (CPN-MC) और माधव कुमार नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल-यूनिफाइड सोशलिस्ट (CPN-) शामिल हैं। वहीं, विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व पूर्व प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल-यूनाइटेड मार्क्सिस्ट लेनिनिस्ट (सीपीएन-यूएमएल) कर रही है, जो चुनाव के बाद पद पर लौटने की उम्मीद कर रहे हैं। यूएमएल ने आधा दर्जन सीटों पर राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (आरपीपी) के साथ गठबंधन किया है। वहीं, राजशाहीवादी और हिंदू राष्ट्रवादी आरपीपी ( एफपीटीपी प्रणाली के तहत) 150 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जिसका चुनावी वादा देश को फिर से हिन्दू राष्ट्र बनाने की है। इसके साथ ही तराई के छोटे दलों ने दो प्रमुख गठबंधनों के साथ गठबंधन किया है, जो पहले से अधिक स्वायत्तता की तलाश करने की तुलना में सत्ता में किसी भी तरह से हिस्सेदारी चाहते हैं। वहीं, इस बार नेपाल चुनाव में करीब 1,200 उम्मीदवार निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं।

देउबा बनाम केपी शर्मा ओली

देउबा बनाम केपी शर्मा ओली

शेर बहादुर देउबा नेपाली सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जुलाई 2021 में प्रधानमंत्री बने, जब केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में दो तिहाई बहुमत से बनी सरकार कई हिस्सों में बंट गई। केपी शर्मा ओली ने जिस कम्युनिस्ट गठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, उन्होंने उनसे समर्थन वापस ले लिया। जिसके बाद दो बार सदन को भंग करने के बाद राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी के समर्थन से फिर सरकार बना ली, लेकिन उनकी सरकार अल्पमत में थी। लिहाजा नेपाली सुप्रीम कोर्ट ने सदन के दोनों विघटनों को असंवैधानिक ठहराते हुए राष्ट्रपति को शेर बहादुर देउबा को पीएम पद की शपथ दिलाने का निर्देश दिया था। जिसके बाद से ही ओली लगातार सुप्रीम कोर्ट की निंदा कर रहे हैं और इस चुनाव में पूर्ण बहुमत लाने का दावा कर रहे हैं। ओली के गठबंधन के अंदर से उनका कोई विरोध नहीं दिखाई दे रहा है, लेकिन शेर बहादुर देउबा के लिए राहें काफी मुश्किल दिख रही हैं। पार्टी और गठबंधन के अंदर से ही उनके खिलाफ आवाजें उठती रही हैं, जिसमें उनकी खुद की पार्टी के महासचिव गगन थापा शामिल हैं, जिन्होंने गठबंधन के सत्ता में लौटने की स्थिति में प्रधानमंत्री पद के लिए अभी से दावा पेश कर दिया है। 76 साल के देउबा पांच बार नेपाल के प्रधानमंत्री रह चुके हैं, जबकि ओली और प्रचंड दो-दो बार इस पद पर रह चुके हैं। ओली और प्रचंड की पार्टियों को हर बार असाधारण बहुमत मिलता है, लेकिन सरकार बनाने के बाद या तो पार्टी टूट जाती है, या फिर गठबंधन बिखड़ जाता है।

देऊबा-प्रचंड का अजीब गठबंधन

देऊबा-प्रचंड का अजीब गठबंधन

नेपाल कई सालों तक माओवाद की आग में जलता रहा और प्रचंड ने उस संघर्ष का नेतृत्व किया, जिस वक्त शेर बहादुर देउबा देश के प्रधानमंत्री हुआ करते थे। खुद देउबा भी माओवादियों के हमले में बाल बाल बच चुके हैं और कई सालों तक चली हिंसा में कम से कम 17 हजार नेपाली मारे गये, जिनमें से ज्यादातर शेर बहादुर देउबा की कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता थे। बतौर पीएम देउबा ने दर्जनों माओवादी नेताओं के सिर पर लाखों का इनाम भी रखा था, लेकिन अब यही देउबा और प्रचंड एक दूसरे के सहयोगी हैं। नवंबर 2006 में नेपाल सरकार और माओवादियों के बीच में एक समझौता हुआ था, जिसके तहत अब माओवादी नेता अपने खिलाफ चलने वाली हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघन का जांच रोकने में सक्षम हैं, अगर वो सत्ता में पहुंच जाते हैं। लेकिन, अब नेपाल में माओवादियों ने जनसमर्थन खो दिया है और खुद प्रचंड ने इस बार अपनी सीट बदल ली है, जो उनकी घटली लोकप्रियता का सबूत है। पिछले चुनावों में 50 प्रतिशत वोट कम्युनिस्ट पार्टियों को गए थे, लेकिन उस वक्त नेपाल की दोनों कम्युनिस्ट पार्टी एक साथ आ गये थे, जो इस बार अलग अलग लड़ रहे हैं।

हिन्दू राष्ट्र बन चुका है बड़ा मुद्दा

हिन्दू राष्ट्र बन चुका है बड़ा मुद्दा

नेपाल ने सालों तक कम्युनिस्ट विचारधारा को अपनाया, लेकिन अब देश की युवा आबादी का कम्युनिस्ट शासन से मोहभंग हो चुका है, लिहाजा अब राष्ट्रवादी पार्टियों का उदय हो रहा है। खासकर आरपीपी ने हिन्दू राष्ट्र की मांग का प्रसार काफी तेजी के साथ देश में किया है। नेपाल अवसरवाद की राजनीति का अखाड़ा है और जो आरपीपी देश को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाह रही है, वो उस केपी शर्मा ओली के साथ राजनीतिक गठबंधन में है, जो राम भगवान पर कई बार विवादित बयान दे चुके हैं और जिनके नेपाल के साथ झुकाव जगजाहिर है। हालांकि, केपी शर्मा ओली ने अभी तक हिन्दू राष्ट्र का समर्थन नहीं किया है, लेकिन इस चुनाव में वो अभी तक दर्जनों मंदिरों की यात्रा कर चुके हैं और राम के समर्थन में राजनीतिक भाषणबाजी कर चुके हैं, जिसका मकसद देश की युवा आबादी का वोट अपने पक्ष में हासिल करना है।

नेपाल चुनाव पर भारत की नजर

नेपाल चुनाव पर भारत की नजर

भारत, जो 2005 तक नेपाल की आंतरिक राजनीति में एक निर्णायक भूमिका निभाता था, उसने माओवादियों के साथ सहयोग करने के बाद अपना दबदबा खो दिया, जिसे उसने आतंकवादी घोषित कर रखा था। इसके साथ ही भारत ने उस राजशाही के खिलाफ भूमिका निभाई, जो राजशाही भारत का मजबूती से समर्थन करती थी, और जिसके जरिए भारत नेपाल की राजनीति को नियंत्रित करता था। लेकिन, भारत ने 2005 के बाद से नेपाल के माओवादियों का साथ दिया और धीरे धीरे नेपाल की राजनीति से भारत पूरी तरह से बाहर हो गया। आलम ये है, कि नई दिल्ली के पास फिलहाल नेपाल में अब एक भी विश्वसनीय संस्थागत सहयोगी नहीं है और चीन ने इसका जबरदस्त तरीके से फायदा उठाया है। ओली ने जीत हासिल करने पर उत्तराखंड में कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा को नेपाल के नियंत्रण में लाने का वादा किया है। हो सकता है कि ओली का नया कार्यकाल उनके पहले के दो कार्यकालों से अलग न हो, जिसमें भारत और नेपाल के बीच संबंधों में गिरावट देखी गई। साल 2015 में संविधान बदलने के बाद भारत ने नेपाल की आर्थिक मदद करनी काफी कर दी और फिर साल 2018 में क्षेत्रीय विवाद छिड़ गया, जिसका फायदा भी चीन ने उठाया है।

नेपाल में चीन कैसे बना बड़ा खिलाड़ी

नेपाल में चीन कैसे बना बड़ा खिलाड़ी

भारत ने जैसे ही नेपाल में साल 2005 में मौका गंवाया, चीन ने अपने हिस्से आए मौके को दोनों हाथों से भुनाना शुरू किया। साल 2006 के बाद से चीन ने नेपाल में एक प्रमुख खिलाड़ी बनने की दिशा में काम किया है और कई क्षेत्रों में अपने निवेश को बढ़ाया है। चीन ने काठमांडू में अपने अनुकूल शासन लाने की कोशिश की और पिछली बार चीन की कोशिशों के बाद भी दोनों बड़ी कम्युनिस्ट पार्टियों ने 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल कर दो तिहाई बहुमत के साथ सरकार का गठन किया। वो बात अलग है, कि बाद में दोनों कम्युनिस्ट पार्टियां अलग-अलग हो गईं और सरकार गिर गई। जैसे ही भारत के साथ तनाव बढ़ा, केपी शर्मा ओली की सरकार ने साल 2016 में चीन के साथ एक ट्रेड और ट्रांजिट ट्रिटी पर हस्ताक्षर कर लिए। इसके साथ ही, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अक्टूबर 2019 में नेपाल का दौरा किया और इस साल भी सितंबर 2022 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कांग्रेस से पहले चीन नेशनल असेंबली के प्रमुख ली झांशु ने नेपाल के कम्युनिस्ट नेताओं प्रचंड और ओली के साथ दूसरे बड़े नेताओं के साथ बातचीत की थी, जो नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है।

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