आखिर क्‍यों हाइफा जाएंगे पीएम मोदी और भारत के लिए क्‍या है इस इजरायली शहर की अहमियत

जेरूसलम। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इजरायल दौरा अब अपने आगाज की ओर बढ़ रहा है। अपने दौरे के तीसरे दिन यानी गुरुवार को पीएम मोदी इजरायल के तीसरे सबसे बड़े शहर हाइफा जाएंगे। पीएम मोदी के साथ इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्‍याहू भी होंगे। दोनों नेता यहां पर उन भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि देंगे जिन्‍होंने सन् 1918 में हाइफा की लड़ाई में अपने प्राण त्‍याग दिए थे।

44 भारतीय सैनिकों ने दी यहां शहादत

44 भारतीय सैनिकों ने दी यहां शहादत

पीएम मोदी पहले दिन इजरायल के याद वाशेम म्‍यूजियम गए और यहां पर उन्‍होंने होलाकॉस्‍ट में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी थी। अब पीएम मोदी हाइफा स्थित उस स्‍माधीस्‍थल का दौरा करेंगे जहां आज भी भारतीय सैनिकों की यादें मौजूद हैं। हाइफा, जेरूसलम से करीब 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और इसका जिक्र खुद पीएम मोदी ने बुधवार को किया है। पीएम मोदी जब भारतीय समुदाय को संबोधित कर रहे थे उन्‍होंने कहा था, 'यहां से करीब 150 किलोमीटर दूर इजरायल के हाइफा में इतिहास का वह हिस्‍सा है जो मेरे देश को काफी प्‍यारा है। यह वह अंतिम जगह है जहां पर 44 भारतीय सैनिकों ने प्रथम विश्‍व युद्ध में शहर को आजाद कराने के लिए अपने प्राण दे दिए थे।'

हाइफा की अहमियत

हाइफा की अहमियत

हर वर्ष भारतीय सेना 23 सितंबर को हाइफा दिवस मनाती है और इस खास मौके पर उन शहीद सैनिकों को याद किया जाता है जिन्‍होंने हाइफा की लड़ाई में अपने प्राण न्‍यौछावर किए थे। प्रथम विश्‍व युद्ध के दौरान हुई इस लड़ाई को आज भी सबसे बहादुरी से लड़ा गया युद्ध माना जाता है। वर्ष 1922 में राजधानी दिल्‍ली में तीन मूर्ति स्‍मारक का निर्माण उन भारतीय सैनिकों की शहादत की याद में किया गया जिन्‍होंने प्रथम विश्‍व युद्ध के दौरान ब्रिटिश भारतीय सेना के तहत इजरायल और फिलीस्‍तीन के बीच अपनी सेवाएं दीं जिसे अब गाजा पट्टी के तौर पर जाना जाता है। उस समय ब्रिटिश शासन के दौरान जोधपुर, हैदराबाद और मैसूर रियासत से सैनिक यहां पर भेजे गए थे।

क्‍या थी हाइफा की जंग

क्‍या थी हाइफा की जंग

दो अगस्‍त 1914 को टर्की की ओट्टोमन रियासत प्रथम विश्‍व युद्ध का हिस्‍सा बनी। यह रियासत ब्रिटिश शासन, फ्रांस और रूस के खिलाफ वह जर्मनी के पक्ष में थी। इस गठबंधन की वजह से ओट्टोमन की सेना की हार हुई। 23 सितंबर 1918 को 15वीं कैवेलरी ब्रिगेड जिसमें घुड़सवार भी शामिल थे, जोधपुर, हैदराबाद और मैसूर रियासत से रवाना हुए। सैनिकों के पास सिर्फ तलवार और भाले थे। लेकिन इसके बावजूद सैनिकों ने हमला किया और इस शहर को ओट्टोमन सेना के चंगुल से आजाद कराया। भारत की ब्रिगेड को नेतृत्‍व जनरल एडमुंड एलेनबाइ कर रह थे और भारतीय सैनिकों को हाइफा में बड़ी सफलता से जंग लड़ी और इस शहर की आजादी में अहम भूमिका अदा की। भारतीय रेजीमेंट्स ने कुल 1,350 जर्मन और ओट्टोमन सैनिकों को कैद किया था।

सैनिकों को मिला सम्‍मान

सैनिकों को मिला सम्‍मान

उस जंग में बहादुरी का प्रदर्शन करने पर कैप्‍टन अमन सिंह बहादुर और दफादार जोर सिंह को सम्‍मान मिला और कैप्‍टन अनूप सिंह और सेकेंड लेफ्टिनेंट सगत सिंह को मिलिट्री क्रॉस से सम्‍मानित किया गया। मेजर दलपत सिंह को तो 'हीरो ऑफ हाइफा' भी कहा जाता है। उन्‍होंने हाइफा को आजादी दिलानें में एक बड़ा रोल अदा किया था। उन्‍हें उनकी बहादुरी के लिए मिलिट्री क्रॉस से भी सम्‍मानित किया गया था।

इजरायल ने दी श्रद्धांजलि

इजरायल ने दी श्रद्धांजलि

वर्ष 2012 में हाइफा के म्‍यूनिसिपल बोर्ड ने फैसला लिया कि वह भारतीय सैनिकों की शहादत को सम्‍मानित करेगा। इसके बाद यहां पर सैनिकों का समाधिस्‍थल बनाया गया। इसके अलावा यहां के स्‍कूलों में भी हाइफा की लड़ाई को पाठ्यक्रम के तौर पर शामिल कर बच्‍चों को वीर भारतीय सैनिकों के बलिदान के बारे में पढ़ाया जाता है। इसके अलावा हर वर्ष म्‍यूनिसिपल कॉरपोरेशन की ओर से एक कार्यक्रम आयोजित होता है। इस कार्यक्रम के दौरान भारतीय सेना की उस वीरता के बारे में बताया जाता है जिसकी वजह से करीब 402 वर्षों तक टर्की के चंगुल में रहने के बाद हाइफा को आजादी मिल सकी थी।

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