चीनी कंपनियों को लेकर भारत सरकार का बड़ा U-Turn, 'फायदा' पहुंचाने वाले फैसले पर उठे सवाल
भारत सरकार ने साल 2020 में गलवान घाटी हिंसा के कुछ महीनों के बाद भारत के साथ जमीनी सीमा साझा करने वाले देशों के साथ व्यापार करने के लिए नये नियम बनाए थे और इस नियम का असल मकसद चीनी कंपनियों पर ही लगाम लगाना था...
नई दिल्ली, जुलाई 21: चीन के साथ सीमा विवाद का कोई समधान नहीं हो रहा है और एलएसी पर चीन की आक्रामकता जारी है, वहीं मोदी सरकार चीनी कंपनियों को भारत में अपने सामानों को बेचने के लिए एक और बड़ा मौका देने वाली है, जिसको लेकर भारत के रणनीतिक मामलो के जानकारों ने गंभीर सवाल उठाए हैं। दरअसल, अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं में शामिल केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को जल्द ही चीनी कंपनियों से सामान खरीदने की इजाजत मिल सकती है और अगर भारत सरकार ऐसा करती है, तो चीनी कंपनियों के लेकर ये एक बड़ा यू-टर्न होगा।

चीनी कंपनियों को होगा बड़ा फायदा
इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं को लेकर मोदी सरकार बड़ा फैसला करने वाली है और इस परियोजना में शामिल केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों, जैसे एनटीपीसी को चीनी कंपनियों से उपकरण खरीदने की अनुमति दी जाएगी। मोदी सरकार का ये फैसला, खुद मोदी सरकार के साल 2020 में बनाए गये उस नियम को दरकिनार करते हैं, जिसमें सरकार ने जमीनी सीमा साझा करने वाले देशों से वस्तुओं के खरीदने को लेकर कई तरह के प्रतिबंध लगाए थे। इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि, केंद्र सरकार ने सीपीएसई के लिए प्रतिबंधों में ढील देने के लिए सैद्धांतिक रूप से सहमति जता दी है, ताकि, वाणिज्यिक नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में लगे निजी क्षेत्र के प्रतियोगियों के साथ उन्हें 'लेवल प्लेइंग फील्ड' पर लाना जाए, जो आयात प्रतिबंधों का सामना नहीं करते हैं।

फैसले का क्या है मतलब?
केन्द्र सरकार की तरफ से दी गई इस छूट का मतलब ये है, कि अब एनटीपीसी और दूसरे सीपीएसई, जो रिन्यूवल एनर्जी (आरई) प्रोजेक्ट में शामिल हैं, वो सीधे तौर पर चीन की कंपनियों या बोली लगाने वालों से उपकरण खरीद सकती हैं और अब उन्हें इसके लिए केन्द्र सरकार से इजाजत नहीं लेनी पड़ेगी। हाल ही में कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में हुई बैठक में सीपीएसई को छूट के लिए हरी झंडी दी गई है। ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक, मिनिस्ट्री ऑफ न्यू एंड रिन्यूएबल एनर्जी अब फाइनेंस मिनिस्ट्री को एग्जेम्पशन क्लॉज पेश करने का औपचारिक प्रस्ताव देगी।

2020 में सरकार ने बनाया था कानून
भारत सरकार ने साल 2020 में गलवान घाटी हिंसा के कुछ महीनों के बाद भारत के साथ जमीनी सीमा साझा करने वाले देशों के साथ व्यापार करने के लिए नये नियम बनाए थे और इस नियम का असल मकसद चीनी कंपनियों पर ही लगाम लगाना था, लेकिन सरकार के इस फैसले पर एक्सपर्ट्स गंभीर सवाल उठा रहे हैं। भारत सरकार ने जो नियम बनाए थे, उस नियम के मुताबिक, चीन या अन्य देश, जो भारत के साथ सीमा साझा करते हैं, वो चीनी कंपनियों ने सामान सीधे तौर पर नहीं खरीद सकते थे, बल्कि भारत में निवेश करने से लेकर भारतीय कंपनियों के साथ व्यापार करने के लिए उन्हें खास प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता और इजाजत के बाद ही वो भारत में व्यापारिक भागीदारी कर सकते थे। हालांकि, मिशन आत्मनिर्भर ने सामान्य वित्तीय नियमों के नियम 144 (xi) के तहत बनाए गये इस नियम में परिवर्तन की मांग की थी, जो भारत में सार्वजनिक खरीद को नियंत्रित करता है।

क्या है नियम 144 (xi)?
आपको बता दें कि, जीएफआर के नियम 144 (xi) के मुताबिक, किसी देश के किसी भी बोलीदाता को, जो भारत के साथ सीमा साझा करते हैं, उन्हें परामर्श और गैर-परामर्श सेवाओं और टर्नकी परियोजनाओं सहित किसी भी सामान / सेवाओं के लिए, एक सक्षम प्राधिकारी के सामने रजिस्ट्रेशन कराना होगा। जीएफआर के नियम 144 (xi), सरकारी मंत्रालयों और विभागों के अलावा, यह सभी स्वायत्त निकायों, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और वित्तीय संस्थानों, पीपीपी परियोजनाओं पर लागू होता है। एनटीपीसी भी आरई परियोजना में लगे अन्य सीपीएसई के बीच जीएफआर नियम 144(xi) के दायरे में आता है, लिहाजा अगर एनटीपीसी को किसी चीनी कंपनी से कोई उपकरण खरीदना हो, तो उसे अधिकारियों से इजाजत लेनी होगी।

सरकार क्यों उठा रही है ये कदम?
हालांकि, चूंकि आरई क्षेत्र में आयात पर निर्भरता अभी भी काफी ज्यादा है, और इसे मुख्य रूप से चीनी फर्मों के माध्यम से संबोधित किया जाता है, इसीलिए रजिस्ट्रेशन की जरूरत ने सीपीएसई को निजी क्षेत्र के प्रतिस्पर्धियों की तुलना में गंभीर मूल्य निर्धारण नुकसान में डाल दिया है। सीपीएसई को बड़े पैमाने पर इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण ठेकेदारों के माध्यम से उपकरणों के साथ अन्य वस्तुओं कीा आयात करना पड़ता है। लिहाजा, इसने प्रोजेक्ट्स की लागत पर गंभीर असर डालना शुरू कर दिया और सीपीएसई को उस समय काफी प्रभावित किया जब वे आरई परियोजनाओं को बढ़ा रहे थे। वहीं, बाद में इस मुद्दे को मंत्रालय में उठाया गया और इस साल इसको लेकर विभिन्न मंत्रालयों के बीच बैठक की गई। वहीं, ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक, जीएफआर नियम 144 (xi) के अलावा, सरकार 2017 के विभिन्न सार्वजनिक खरीद आदेशों पर भी चर्चा कर रही है, जिसे उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) ने जारी किया था।

जीएफआर नियम को बायपास
जीएफआर नियम 144 के तहत पंजीकरण प्रक्रिया के अलावा, उप-ठेकेदारों का पंजीकरण, प्रौद्योगिकी छूट का हस्तांतरण, आपूर्तिकर्ताओं / बोली लगाने वालों का वर्गीकरण, कच्चे माल की खरीद के लिए पंजीकरण की आवश्यकता समेत अन्य जटिल मुद्दे थे, जो इस सख्त खरीद व्यवस्था के तहत उभरे हैं। वहीं अब डीपीआईआईटी, इनमें से कुछ नियमों को संबोधित करने के लिए 2017 के खरीद आदेशों में संशोधन पर रिपोर्ट तैयार कर रहा है।
एक्सपर्ट ने उठाए गंभीर सवाल
भारत के प्रमुख डिफेंस एक्सपर्ट ब्रह्मा चेलानी ने मोदी सरकार के इस फैसले पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने एक ट्वीट में कहा है कि, 'जबकि चीन, हिमालय में सीमाओं को लगातार बढ़ा रहा है, मोदी सरकार भारत के खिलाफ अपनी आक्रामकता के लिए पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चायना को पुरस्कृत कर रही है, जिसके कारण सैन्य गतिरोध जारी है। यह ऐसा है जैसे नई दिल्ली में कोई रणनीतिक दृष्टि या रणनीतिक सोच नहीं है।
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