Lok Sabha Chunav Result: मोदी की अकेले दम पर सरकार नहीं.. क्या अबकी बार बदल जाएगी भारत की विदेश नीति?
Lok Sabha Chunav Result 2024: विपक्षी दल इंडिया ब्लॉक ने सभी एग्जिट पोल पूर्वानुमानों को पलट दिया है और अभी तक के चुनावी आंकड़ों से पता चलता है, कि NDA की सरकार तो बनती दिख रही है, लेकिन बीजेपी अकेले दम पर बहुमत हासिल करने में नाकाम हो गई है।
जिसका सीधा मतलब है, कि अगर नरेन्द्र मोदी सरकार बनाते हैं, तो उनकी सरकार सहयोगियों पर निर्भर होगी और जेडीयू के नीतिश कुमार और टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू इस सरकार के संचालन में सबसे अहम भूमिका निभाने वाले हैं।

चुनावी आंकड़ों से ये भी पता चलता है, कि प्रधानमंत्री मोदी ने जितनी आक्रामकता से पिछली दो बार सरकार चलाई है, उतनी आक्रामकता के साथ सरकार इस बार शायद ही चलाएंगे! वहीं, सवाल ये भी हैं, कि क्या विदेशी मोर्चे पर अबकी बार बीजेपी जो अपनी नीतियों के हिसाब से फैसले लेती थी, क्या वैसे फैसले इस कार्यकाल में ले पाएगी?
आइये जानने की कोशिश करते हैं, कि अगर मोदी सरकार तीसरे कार्यकाल में जाती है, तो क्या मोदी सरकार की विदेश नीति, पहले दो कार्यकाल के मुकाबले थोड़ी अलग होगी?
क्या भारत की विदेश नीति बदल सकती है?
विदेश नीति एक्सपर्ट्स का मानना है, कि सरकार बदलने से ज्यादातर मामलों में विदेश नीति पर प्रभाव नहीं पड़ता है और खुद नरेन्द्र मोदी ने भी चुनाव प्रचार के दौरान इंडिया टीवी को दिए इंटरव्यू में कहा था, कि "विदेश नीति एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।" यानि, इस बात की उम्मीद काफी कम है, कि भारत की विदेश नीति में कोई बदलाव आए।
लेकिन, एक्सपर्ट्स इस बात को भी स्वीकार करते हैं, कि अभी तक एक प्रधानमंत्री के तौर पर नरेन्द्र मोदी जितनी ताकत के साथ वैश्विक मंच पर खुद को प्रस्तुत करते थे, शायद अब उसमें कुछ कमी आए। साथ ही, दुनिया में भी एक संदेश गया है, कि प्रधानमंत्री मोदी इस बार अपने घर में उतने ताकतवर नहीं रहे हैं।
आर्थिक मोर्च पर आगे का रास्ता क्या है?
जब नरेन्द्र मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बने थे, उस वक्त भारत, दुनिया की दसवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी। लेकिन आज, यह पांचवीं सबसे बड़ी इकोनॉमी है।
10 मार्च को सरकार ने यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ के साथ एक मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए और 15 मार्च को इसने दुनिया की अग्रणी इलेक्ट्रिक वाहन कंपनियों के लिए भारतीय बाजार खोलने के लिए एक नई नीति की घोषणा की थी।
वहीं, भारत सरकार ने 16 मार्च की समय सीमा से पहले तीन नई सेमीकंडक्टर परियोजनाओं, तरलीकृत पेट्रोलियम गैस के लिए संशोधित कीमतों और नागरिकता संशोधन अधिनियम को लागू करने के लिए औपचारिक नियमों को भी मंजूरी दी।
नई सरकार बनने के बाद भी आर्थिक गतिविधियों की यह झड़ी जारी रह सकती है। कथित तौर पर मोदी ने अपने मंत्रिमंडल से तीसरे कार्यकाल के लिए एक महत्वाकांक्षी सौ-दिवसीय एजेंडा विकसित करने को कहा है। बीजेपी के चुनाव घोषणापत्र और अन्य संकेतों का आकलन करते हुए, मोदी 3.0 में भी आर्थिक विकास को जारी रखने की कोशिश करेगी।
डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर को आगे बढ़ाने पर भारत को जोर रह सरकता है।
इसके अलावा, मोदी सरकार ने ग्लोबल साउथ का आवाज बनने पर काफी फोकस किया था और इस बात की उम्मीद है, मोदी सरकार 3.0 में ग्लोबल साउथ का विश्वास बनाने में और काम किया जाएगा। वहीं, मोदी सरकार का मकसद ग्लोबल साउथ की मदद से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता हासिल करने की होगी।
हालांकि, इसे विशुद्ध तौर पर जियो-पॉलिटिकल लक्ष्य लग सकता है, लेकिन इसके साथ कई इकोनॉमिक फैक्टर भी जुड़े हुए हैं। नई सरकार सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाने और महत्वपूर्ण और उभरती हुई तकनीक जैसे क्षेत्रों में समान विचारधारा वाले देशों के साथ साझेदारी करना जारी रखेगी। नई सरकार, भारत के पड़ोसी देशों, दक्षिण एशिया में कनेक्टिविटी, वाणिज्य और अन्य संबंधों को बढ़ाने के लिए बांग्लादेश, भूटान, नेपाल और श्रीलंका की सरकारों के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने की कोशिश करेगी।
मोदी सरकार के पहले दो कार्यकाल में फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर काफी फोकस किया गया और भारत ने संयुक्त अरब अमीरात और ऑस्ट्रेलिया के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट किए थे। वहीं, अब अगले कार्यकाल में यूनाइटेड किंगडम और ओमान के साथ व्यापार सौदे पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद है।
क्या अमेरिका-यूरोप के नजरिए में आएगा बदलाव?
संयुक्त राज्य अमेरिका चाहता है, कि भारत चीन के लिए एक रणनीतिक प्रतिद्वंदी बने। राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पिछले साल राजकीय रात्रिभोज के लिए मोदी की मेजबानी की थी और दिल्ली के साथ संबंधों को "21वीं सदी की परिभाषित साझेदारी" कहा था।
पिछले साल व्हाइट हाउस द्वारा भारतीय प्रधानमंत्री के लिए लाल कालीन बिछाए जाने के बाद बाइडेन और मोदी ने अपने देशों के संबंधों में एक नए युग की शुरुआत की थी, जिसमें चीन के वैश्विक प्रभाव का मुकाबला करने के उद्देश्य से रक्षा और वाणिज्य पर सौदों का प्रचार किया गया था।
वाशिंगटन में राजकीय रात्रिभोज के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, कि "क्षेत्र की स्थिरता हमारी साझेदारी की केंद्रीय चिंताओं में से एक बन गई है।"
फरवरी में, अमेरिका ने भारत को अत्याधुनिक ड्रोन की 4 बिलियन डॉलर की बिक्री को मंजूरी दी, जो चीन के प्रतिकार में इसकी रक्षा को बढ़ावा देने के लिए नवीनतम कदम है।
इसके अलावा, भारत के यूरोपीय देशों के साथ भी मजबूत संबंध हैं। फ्रांस के साथ, यह राफेल लड़ाकू जेट और स्कॉर्पीन श्रेणी की पनडुब्बियों की बिक्री सहित कई बिलियन डॉलर के सौदों का विस्तार करने की उम्मीद करता है। मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में भारत और फ्रांस के बीच भारतीय नौसेना के लिए राफेल मरीन फाइटर जेट के लिए करार कर सकती है।












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