2500 सालों बाद अफगानिस्तान से मिटा यहूदियों का नामो-निशान, आखिरी यहूदी शख्स ने भी छोड़ा देश
अफगानिस्तान में पिछले 2500 सालों से यहूदी रहते आए हैं। लेकिन, कट्टरपंथियों ने ज्यादातर यहूदियों को मार दिया या देश छोड़ने पर मजबूर किया या फिर उनका तलवारों के दम पर धर्म परिवर्तन कर दिया।
काबुल, सितंबर 10: अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा होने के बाद पलायन का सिलसिला अभी भी जारी है। खासकर अल्पसंख्यक समुदाय अपनी जान बचाने के लिए या तो पहले ही अफगानिस्तान से निकल गये या कुछ लोग अभी भी बाहर निकल गये हैं। रिपोर्ट के मुताबिक अफगानिस्तान की जमीन से अब आखिरी यहूदी शख्स भी बाहर निकल गया है। यानि, अब अफगानिस्तान की जमीन पर एक भी यहूदी मौजूद नहीं है।

अफगानिस्तान से निकला आखिरी यहूदी
अफगानिस्तान के यहूदी समुदाय के अंतिम सदस्य ने तालिबान के देश पर कब्जा करने के बाद देश छोड़ दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, अफगानिस्तान से बाहर निकलने वाले आखिरी शख्स इजरायली-अमेरिकी व्यापारी थी और उन्हें अफगानिस्तान से निकालने के लिए स्पेशल सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, जेबुलोन सिमेंटोव नाम के इजरायली-अमेरिकी व्यापारी स्पेशल सुरक्षा व्यवस्था के बीच अफगानिस्तान से बाहर निकाले गये और उन्होंने एक 'पड़ोसी देश' ले जाया गया। वो अफगानिस्तान में अमेरिका की एक कंपनी चला रहे थे।

कई सालों से अफगानिस्तान में थे
रिपोर्ट के मुताबिक, जेबुलोन सिमेंटोव पिछले कई दशक से अफगानिस्तान में रह रहे थे और उन्होंने अफगानिस्तान से बाबहर निकलवे से मना कर दिया था। उन्होंन अफगानिस्तान में सोवियत यूनियन का दौर देखा है तो उन्होंने 1996 में तालिबानी शासन को भी देखा था। इस बार भी उन्होंने देश छोड़ने से इनकार कर दिया था। लेकिन, पिछले 10 दिनों से उन्हें भारी सुरक्षा में रखा गया था और अब उन्हें देश से सुरक्षा एजेंसियों ने स्पेशल सुरक्षा व्यवस्था के तहत बाहर निकाला है। सुरक्षा एजेंसी के कहाना ने कहा कि 'सिमेंटोव की जान काफी खतरे में थी और वो इस्लामिक स्टेट-खुरासान के आतंकियों के निशाने पर थे। वो देश नहीं छोड़ना चाहते थे, लेकिन आखिरकार उन्होंने हमारी बात मान ली'। कहाना ने कहा कि 'उन्हें स्थिति के बारे में समझाया गया और मुझे लगता है कि उन्होंने अंत में खुद ही अफगानिस्तान से बाहर निकलने का फैसला लिया'

29 लोगों को निकाला बाहर
रिपोर्ट के मुताबिक सिमेंटोव ने सुरक्षा एजेंसी से अपने साथ अपने कुछ करीबी दोस्तों और पड़ोसियों को भी अफगानिस्तान से बाहर निकालने की गुजारिश की थी, जिसके बाद उनके साथ उनके 29 पड़ोसियों को भी देश से बाहर निकाला गया है। कहाना ने कहा कि सिमेंटोव का न्यूयॉर्क में परिवार है और उम्मीद है कि अगले हफ्ते योम किप्पुर की छुट्टी के आसपास जल्द ही वो अपने परिवार के साथ मिल पाएंगे। आपको बता दें कि 1950 के दशक में पश्चिमी शहर हेरात में जन्मे सिमेंटोव 1980 के दशक की शुरुआत में सोवियत आक्रमण के दौरान काबुल चले गए थे और वो अफगानिस्तान में ही रह रहे थे। लेकिन, अब आईएसआईएस के आतंकियों की वजह से उनकी जान को खतरा था। पिछले कुछ सालों में सिमेंटोव के सभी रिश्तेदारों ने धीरे धीरे अफगानिस्तान छोड़ दिया और अमेरिका चले गये। उनकी पत्नी और दो बेटियों ने भी अफगानिस्तान छोड़ दिया था।

मुसलमान बनाने की कोशिश
रिपोर्ट के मुताबिक, उन्हें अफगानिस्तान में चार बार इस्लाम में परिवर्तित करने की कोशिश की गई और यहूदी होने की वजह से तालिबान शासन में उन्हें चार बार गिरफ्तार किया गया, उसके बाद भी वो अफगानिस्तान में ही रूके रहे। उन्होंने कहा कि उन्होंने लगातार तालिबान का मुकालबा किया और अफगानिस्तान की धरती पर पिछले 2500 सालों से यहूदी रहते आएं हैं, मुस्लिम धर्म के आने से काफी पहले से। उन्होंने कहा कि आज भी अफगानिस्तान के कई शहरों में यहूदी धर्म के निशान मिलते हैं। लेकिन, अब अफगानिस्तान की धरती से यहूदी समुदाय का नामोनिशान मिट गया है।

तालिबान का सितम
आपको बता दें कि तालिबानियों के जुल्म से बचने के लिए लोग अभी भी दूसरे देशों में शरण लेने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन आतंकियों ने अब अफगान से बाहर निकलने के सारे रास्ते बंद कर दिए हैं। इस बीच तालिबान का एक बार फिर असली चेहरा सामने आया है, उसने अब काबुल में नार्वे के दूतावास पर कब्जा कर वहां तोड़फोड़ मचा दिया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक नार्वे के दूतावास पर कब्जे के बाद तालिबानी बंदूकधारियों ने वहां रखी शराब की बोतलें तोड़ दीं और किताबों को नष्ट कर दिया। ईरान में नॉर्वे के राजदूत सिगवाल्ड हाउगे ने एक ट्वीट में कहा, तालिबान ने अब काबुल में नॉर्वे के दूतावास को अपने कब्जे में ले लिया है। कहा गया है कि वह दूतावास को बाद में हमें लौटा देंगे लेकिन पहले वहां रखी शराब की बोतलें तोड़नी हैं और बच्चों की किताबें नष्ट करनी हैं।

तालिबान की सरकार
बता दें कि इससे पहले तालिबान ने कहा था कि वह दूतावासों सहित विदेशी देशों के राजनयिक प्रतिष्ठानों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। हालांकि यह सच किसी से नहीं छिपा कि तालिबान गिररिट की तरह रंग बदलने में माहिर हैं, इससे पहले वह अपनी कई बातों से पलट चुका है। तालिबान अब अफगानिस्तान में सरकार बना रहे हैं जिसका नेतृत्व हिबतुल्लाह अखुंदजादा कर सकते हैं। तालिबान की कट्टरपंथी अंतरिम सरकार में विशेष रूप से नामित वैश्विक आतंकवादी सिराजुद्दीन हक्कानी को कार्यवाहक आंतरिक मंत्री के रूप में शामिल किया गया है। बता दें कि पिछले महीने डेनमार्क और नॉर्वे ने घोषणा की थी कि वे काबुल में अपने दूतावास बंद कर रहे हैं और अपने कर्मचारियों को निकाल रहे हैं क्योंकि अफगानिस्तान में सुरक्षा की स्थिति खराब हो गई है।












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