जानिये क्या है ईरान परमाणु समझौता और क्यूं दुनिया में हो रही है इसकी चर्चा

(अंकुर सिंह)। परमाणु हथियार बनाने पर ईरान को ऐतिहासिक सफलता हासिल हुई है। परमाणु कार्यक्रम में आ रही बाधाओं को आखिरकार ईरान पार करने में सफल रहा है। ईऱान दुनियी की छह महाशक्तियों के साथ परमाणु समझौता करने में कामयाब रहा है। लेकिन ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिरकार यह मुद्दा दुनियाभर में चर्चा का विषय क्यों हैं।

क्या था विवाद

ईरान कुछ परमाणु कार्यक्रमों को खुद तक ही सीमित रखना चाहता था जिसकी वजह से यह ईरान का परमाणु कार्यक्रम काफी लंबे अरसे से अटका पड़ा था हालांकि ईरान शुरु से यह कहता आ रहा था कि ये कार्यक्रम शांतिपूर्ण माहौल को स्थापित रखने के लिए हैं।

आपको बता दें कि अगर कोई देश परमाणु कार्यक्रम चला रहा है तो उसकी निगरानी अन्य परमाणु शक्ति देश रखते हैं। जिसके चलते ईरान का परमाणु कार्यक्रम काफी लंबे समय से अधर में लटका पड़ा था। इसकी मुख्य वजह थी कोई भी देश ईरान के व्यक्तिगत परमाणु कार्यक्रम को अनुमति देने के लिए तैयार नहीं था।

दुनिया के अन्य देशों को इस बात का अंदेशा था कि ईरान गुपचुप तरीके से परमाणु बम बनाने की फिराक है और ये देश ईरान के परमाणु कार्यक्रम का विरोध कर रहे थे।

क्यों यह अवरोध गलत था सबके लिए

ईरान की अर्थव्यवस्था कई चरणों में काफी नीचे आ गयी थी, ऐसे में दुनिया को इस बात का अंदेशा था कि इसकी वजह है ईरान परमाणु बम बनाने की योजना में जुटा हुआ है। यही नहीं जिस तरह से मिडिल ईस्ट में अस्थिरता मची हुई है ऐसे में विकल्प यही नजर आ रहा था या तो अमेरिका ईरान को परमाणु बम बनाने दे या फिर ईरान के खिलाफ सीधी जंग छेड़ दे।

लेकिन पिछले हफ्ते इस मुद्दे पर शुरु हुई वार्ता का मकसद था पिछले कई सालों से बने इस गतिरोध को दूर करना। ऐसे में अमेरिका इस बात पर ध्यान देना चाहता था कि ईरान को बेहद छोटे स्तर के परमाणु कार्यक्रम की इजाजत दी जाए वो भी सिर्फ शांति बहाली के लिए।

ईरान में हसन रूहानी के नये राष्ट्रपति चुने जाने के बाद ही यह प्रक्रिया शुरु हो गयी और 2013 में ईरान दुनिया के ताकतवर देशों के साथ समझौते के लिए तैयार हो गया। इस ताकतवर जोड़ी को 5 प्लस 1 के नाम से जाना जाता है, जिसमे यूएन सेक्युरिटी काउंसिल के पांचों स्थायी सदस्य यूएस, यूके, रूस, चीन और फ्रांस आते हैं जबकि जर्मनी अस्थायी सदस्य के रूप में।

इस डील के बाद क्या होगा

इस समझौते के बाद ईरान अपने भारी-भरकम परमाणु कार्यक्रम को रद्द करके एक छोटे परमाणु कार्यक्रम की शुरुआत करेगा। इस कार्यक्रम के अंतर्गत यूरेनियम के इस्तेमाल से न्यूक्लियर उर्जा का निर्माण करेगा। लेकिन इस कार्यक्रम के जरिए परमाणु बम बनाने में ईऱान के लिए बहुत मुश्किल है और इसकी मुख्य वजह है इस न्युक्लियर उर्जा से जो जो सेंट्रीफ्यूज निकलेगा वह परमाणु बम बनाने के लिए बहुत ही कम है।

ईरान परमाणु कार्यक्रम का निरीक्षण भी पेश करेगा

इस समझौते के तहत यह भी सुनिश्चित किया गया है कि ईरान किसी भी तरह की गड़बड़ी ना करे। लिहाजा ईरान से परमाणु कार्यक्रम की पूरी जानकारी और रिपोर्ट देने के लिए कहा गया है। मान लीजिए ईरान खुफिया तरीके से न्यूक्लियर को खुफिया जगह पर ले जाये और परमाणु बम बनाने लगे।

ऐसी स्थिति में ईरान को बड़ी मुश्किल का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन अगर किसी भी स्थिति में ऐसा पाया गया कि ईरान खुफिया परमाणु कार्यक्रम चला रहा है तो उसे मिलनी वाली आर्थिक सहायता पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी जाएगी।

ईरान के इस परमाणु कार्यक्रम के समझौते की मियाद 10 साल है जबकि कुछ अन्य मुद्दों की मियाद 25 साल तक है। ऐसे में अगर समझौता सही रास्ते पर गया तो ईरान परमाणु बम नहीं बना पाएगा और इसके साथ ही आर्थिक मंदी के दौर से भी ईरान को बाहर निकलने में मदद मिलेगी।

लेकिन अगर यह डील फेल हो गयी तो अंजाम काफी खतरनाक साबित हो सकते हैं। ऐसे में युद्ध ही एक रास्ता बचेगा वो भी परमाणु हथियार संपन्न ईऱाक के साथ। इस समझौते को ओबामा के कार्यकाल की सबसे बड़ी सफलता मानी जा रही है।

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