Khamenei Death: खामेनेई की मौत और चीन का 33 लाख करोड़ स्वाहा! ट्रंप के कैसे जिनपिंग को सड़क पर ला दिया?
Khamenei Death Impact on China Economy: ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई की मौत और वहां की शक्तिशाली सेना (IRGC) द्वारा सत्ता की कमान संभालने की खबर ने भारत के साथ-साथ बीजिंग में हड़कंप मचा दिया है। चीन के लिए यह केवल एक राजनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि उसके 33 लाख करोड़ ($400 बिलियन) के महा-निवेश के डूबने का संकेत है।
दशकों की मेहनत से शी जिनपिंग ने ईरान को अपनी 'बेल्ट एंड रोड' पहल का केंद्र बनाया था, लेकिन अब वहां फैली अस्थिरता ने चीनी अर्थव्यवस्था के लिए 'डेथ वारंट' तैयार कर दिया है। ट्रंप का नया 'सीक्रेट प्लान' और ईरान पर सख्त प्रतिबंधों की आहट, चीन के सस्ते तेल और ग्लोबल सप्लाई चेन की रीढ़ तोड़ने वाली है।

China-Iran Trade Loss: 33 लाख करोड़ का 'ईरान दांव' फेल
चीन ने ईरान के साथ 25 साल का एक मेगा-एग्रीमेंट किया था, जिसके तहत वह तेल और बुनियादी ढांचे में अरबों डॉलर निवेश कर रहा था। खामेनेई की मौत के बाद ईरान में नेतृत्व शून्यता और सेना का आक्रामक रुख इस पूरे निवेश को 'हाई रिस्क' में डाल चुका है। यदि वहां गृहयुद्ध जैसे हालात बनते हैं, तो चीन का यह पैसा मिट्टी में मिल जाएगा, जिससे बीजिंग का पूरा आर्थिक संतुलन बिगड़ना तय है।
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ट्रंप का चीन की घेराबंदी
डोनाल्ड ट्रंप की 'मैक्सिमम प्रेशर' नीति का सबसे बड़ा निशाना ईरान का तेल निर्यात है। ट्रंप का प्लान है कि ईरान के तेल व्यापार को पूरी तरह शून्य कर दिया जाए। चूंकि चीन, ईरान के सस्ते तेल का सबसे बड़ा खरीदार है, इसलिए ये प्रतिबंध सीधे बीजिंग की कमर तोड़ देंगे। सस्ता ईंधन बंद होने से चीन की विशाल फैक्ट्रियों में उत्पादन लागत (Production Cost) आसमान छूने लगेगी, जिससे चीनी सामान ग्लोबल मार्केट में महंगे और अप्रभावी हो जाएंगे। यह चीन के लिए औद्योगिक मंदी का बड़ा कारण बनेगा।
'पेट्रो-युआन' के सपने का अंत
शी जिनपिंग का सपना था कि वह वैश्विक तेल बाजार से डॉलर की बादशाहत खत्म कर 'युआन' को स्थापित करें। ईरान इस मिशन का सबसे मजबूत खिलाड़ी था। लेकिन खामेनेई की मौत और अमेरिकी घेराबंदी ने इस योजना को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। अब डॉलर और भी मजबूत होगा, जिससे चीन की करेंसी 'युआन' अंतरराष्ट्रीय बाजार में अलग-थलग पड़ जाएगी।
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China Defense Export Iran Crisis: चीनी डिफेंस मार्केट को झटका
चीन के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द उसका गिरता हुआ डिफेंस एक्सपोर्ट है। चीन लंबे समय से ईरान को मिसाइल तकनीक, ड्रोन और उन्नत हथियार बेचकर अरबों डॉलर कमा रहा था। लेकिन ईरान में तख्तापलट और सेना (IRGC) के सीधे नियंत्रण के बाद यह सौदा खटाई में पड़ सकता है। यदि नई सत्ता अपनी सैन्य आत्मनिर्भरता या किसी अन्य गुट की ओर झुकती है, तो चीनी हथियारों की मांग गिर जाएगी। यह चीनी रक्षा उद्योगों के लिए एक बड़ा वित्तीय झटका होगा, जिससे उसकी पहले से सुस्त अर्थव्यवस्था और कमजोर हो जाएगी।
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World News Hindi: सप्लाई चेन की बर्बादी
ईरान के रास्ते चीन मध्य-पूर्व और यूरोप तक अपना माल पहुंचाना चाहता था। अब युद्ध और तनाव के कारण समुद्री रास्ते (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) असुरक्षित हो गए हैं। चीन की अर्थव्यवस्था निर्यात (Export) पर टिकी है। यदि शिपिंग रूट्स बंद होते हैं, तो चीन का माल पोर्ट्स पर ही सड़ जाएगा, जिससे वहां रिकॉर्ड तोड़ बेरोजगारी और औद्योगिक मंदी आना निश्चित है।
ट्रंप की 'टैरिफ वॉर' और बीजिंग की लाचारी
ट्रंप ने साफ कर दिया है कि ईरान की मदद करने वाले देशों को अमेरिकी बाजार से हाथ धोना पड़ेगा। चीन के सामने अब दो रास्ते हैं, या तो वह अपने पुराने दोस्त ईरान का साथ छोड़े या फिर अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध लड़े। ट्रंप का सीक्रेट प्लान चीन की उन कंपनियों को ब्लैकलिस्ट करने का है जो ईरान से जुड़ी हैं, जिससे चीन का बैंकिंग सिस्टम पूरी दुनिया से कट सकता है।
चीन ही नहीं भारत को भी लग सकता है बड़ा झटका
ईरान में अयातुल्ला खामेनेई के निधन और सेना (IRGC) के बढ़ते प्रभाव ने सिर्फ चीन ही नहीं, बल्कि भारत के लिए भी खतरे की घंटी बजा दी है। खामेनेई के दौर में भारत-ईरान के बीच जो व्यापारिक संतुलन और कूटनीतिक तालमेल था, वह अब खत्म होने की कगार पर है। पश्चिम एशिया में संभावित युद्ध और सप्लाई चेन की बाधा सीधे तौर पर भारत के ऑटोमोबाइल, फार्मा और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर को प्रभावित करेगी। सबसे बड़ी चिंता 14,000 करोड़ रुपये ($1.68 अरब) के उस व्यापार की है, जो सेना के दखल और बैंकिंग सिस्टम फेल होने से पूरी तरह ठप हो सकता है। निर्यातकों का पैसा फंसने का मतलब है भारतीय बाजारों में बड़ी आर्थिक उथल-पुथल।
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