Ali Khamenei Shia or Sunni: अली खामेनेई शिया थे या सुन्नी? ईरान में किस फिरके के लोग बनते हैं सुप्रीम लीडर?
Ali Khamenei Shia or Sunni: ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की 28 फरवरी 2026 को हुए हवाई हमले में मौत की खबर ने पूरी दुनिया को चौंका दिया। अमेरिका-इजराइल पर इस स्ट्राइक का आरोप लगाया गया है।
खामेनेई खुलकर इजराइल के अस्तित्व को मिटाने की बात करते थे और मिडिल-ईस्ट की राजनीति में ईरान की आक्रामक नीति का चेहरा माने जाते थे। उनकी मौत के बाद एक सवाल तेजी से चर्चा में है-क्या खामेनेई शिया थे या सुन्नी? और ईरान में सुप्रीम लीडर बनने के लिए किस फिरके से होना जरूरी है?

खामेनेई किस फिरके से थे? (Khamenei Religion Explained)
अयातुल्लाह अली खामेनेई शिया मुस्लिम थे। वे ईरान के शिया धार्मिक ढांचे के सबसे ऊंचे पद पर बैठे थे। ईरान खुद दुनिया का सबसे शक्तिशाली शिया देश माना जाता है, जहां 90 से 95 प्रतिशत मुस्लिम आबादी शिया है, जबकि 5 से 10 प्रतिशत सुन्नी हैं।
खामेनेई का जन्म 19 अप्रैल 1939 को ईरान के धार्मिक शहर मशहद में एक मौलवी परिवार में हुआ था। उनके पिता सैयद जावेद खामेनेई शिया उलेमा थे। बचपन से ही उन्हें इस्लामी तालीम दी गई। चार साल की उम्र में मकतब भेजा गया, जहां उन्होंने कुरान और अरबी सीखी। बाद में वे कोम शहर पहुंचे और वहां Ruhollah Khomeini से शिक्षा ली।
कम उम्र में ही वे धार्मिक विद्वान के रूप में पहचाने जाने लगे। आगे चलकर वे शाह मोहम्मद रजा पहलवी की नीतियों के खिलाफ खड़े हुए और इस्लामी शासन के समर्थक बन गए।
क्रांति से 'रहबर' तक का सफर (Rise to Supreme Leader)
1963 में शाह विरोधी भाषण देने पर खामेनेई को गिरफ्तार किया गया। धीरे-धीरे वे सरकार विरोधी आंदोलन का बड़ा चेहरा बन गए। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद जब खोमैनी ईरान लौटे और नई इस्लामी सरकार बनी, तब खामेनेई को क्रांतिकारी परिषद में जगह मिली।
1981 में तेहरान की एक मस्जिद में भाषण के दौरान उन पर बम हमला हुआ, जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हुए। उसी साल एक और धमाके में तत्कालीन राष्ट्रपति की मौत के बाद हुए चुनाव में वे ईरान के तीसरे राष्ट्रपति बने।
1989 में खोमैनी के निधन के बाद उन्हें देश का सर्वोच्च नेता यानी 'रहबर' बनाया गया। इसके लिए संविधान में संशोधन भी किया गया। समर्थक उन्हें इस्लामी व्यवस्था का रक्षक मानते रहे, जबकि आलोचक उन पर सख्त और कट्टर शासन चलाने का आरोप लगाते रहे।
ईरान में सुप्रीम लीडर कौन बन सकता है? (Iran Supreme Leader Criteria)
ईरान में सुप्रीम लीडर का चयन 'असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स' नाम की धार्मिक परिषद करती है। परंपरागत रूप से यह पद एक वरिष्ठ शिया मौलवी को दिया जाता है। यानी सुप्रीम लीडर बनने के लिए शिया धार्मिक विद्वान होना लगभग अनिवार्य है। ईरान की राजनीतिक व्यवस्था शिया इस्लामी विचारधारा पर आधारित है। इसलिए सुन्नी मुस्लिम इस पद के लिए पात्र नहीं माने जाते।
शिया और सुन्नी में फर्क क्या है? (Shia vs Sunni Difference)
- इस्लाम में शिया और सुन्नी दो मुख्य समुदाय हैं। सुन्नी दुनिया की मुस्लिम आबादी का लगभग 80 से 90 प्रतिशत हिस्सा हैं। वे मानते हैं कि पैगंबर मोहम्मद के बाद खलीफा का चयन समुदाय की सहमति से होना चाहिए था।
- शिया, जो लगभग 10 से 20 प्रतिशत हैं, मानते हैं कि नेतृत्व पैगंबर के परिवार से होना चाहिए था और हज़रत अली उनके सही उत्तराधिकारी थे।
- सुन्नी मानते हैं कि पैगंबर के बाद अबु बक्र, उमर, उस्मान और अली चारों खलीफा वैध थे। शिया मानते हैं कि सिर्फ हज़रत अली और उनके वंशज ही असली इमाम थे।
- दोनों कुरान में विश्वास रखते हैं और नमाज अदा करते हैं, लेकिन धार्मिक नेतृत्व और परंपराओं की व्याख्या में अंतर है।
- दुनिया भर में सुन्नी बहुमत में हैं। शिया समुदाय ईरान, इराक, बहरीन और अजरबैजान में प्रमुख है। भारत में ज्यादातर मुसलमान सुन्नी हैं, जबकि शिया करीब 13 से 15 प्रतिशत माने जाते हैं।
खामेनेई की विरासत और आगे का असर (Impact on Middle East)
खामेनेई के नेतृत्व में मिडिल-ईस्ट में ईरान का प्रभाव बढ़ा। लेबनान, सीरिया और इराक जैसे देशों में ईरान की भूमिका मजबूत हुई। उनकी मौत से क्षेत्रीय राजनीति में बड़ा बदलाव संभव है।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि वे शिया थे या सुन्नी। असली सवाल यह है कि उनके बाद ईरान की सत्ता किस दिशा में जाएगी और क्या शिया धार्मिक नेतृत्व की वही सख्त लाइन जारी रहेगी। फिलहाल इतना साफ है कि ईरान का सुप्रीम लीडर शिया मौलवी ही बनता है और यही देश की राजनीतिक-धार्मिक व्यवस्था की बुनियाद है।
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