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अंधेरे में प्रकाश के कणों पर संदेश भेजकर ISRO ने रचा इतिहास, चीन के लिए हैक करना होगा असंभव

क्वांटम कम्युनिकेशन दो जगहों के बीच संचार करने के लिए सबसे ज्यादा सुरक्षित नेटवर्स माना जाता है और अभी तक दुनिया में ऐसी टेक्नोलॉजी नहीं बनी है, जिसके जरिए इस नेटवर्क सिस्टम को हैक किया जा सके।

अहमदाबाद, फरवरी 02: भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने एक ऐसा नेटवर्क सिस्टम बनाने में कामयाबी हासिल कर ली है, जिसे हैक करना नामुमकिन होगा। इसकी की ये कामयाबी ऐतिहासिक मानी जा रही है, क्योंकि अब तक चीन लगातार दुनियाभर के नेटवर्क सिस्टम को हैक करता रहा, लेकिन अब चीन छटपटा कर रह जाएगा, लेकिन वो नये नेटवर्क सिस्टम को किसी भी तरह से हैक नहीं कर पाएगा। इसरो ने 300 मीटर की दूरी के बीच क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन (क्यूकेडी) का इस्तेमाल करते हुए क्वांटम इंटेनग्लेमेंट का परीक्षण किया है, जो भारतीय साइंस क्षेत्र में बहुत बड़ी उपलब्धि है और अभी तक ये टेक्नोलॉजी सिर्फ अमेरिका और चीन के पास ही है।

क्या है क्वांटम कम्युनिकेशन नेटवर्क?

क्या है क्वांटम कम्युनिकेशन नेटवर्क?

क्वांटम कम्युनिकेशन दो जगहों के बीच संचार करने के लिए सबसे ज्यादा सुरक्षित नेटवर्स माना जाता है और अभी तक दुनिया में ऐसी टेक्नोलॉजी नहीं बनी है, जिसके जरिए इस नेटवर्क सिस्टम को हैक किया जा सके। इस नेटवर्क सिस्टम को काफी उच्च स्तर के कोड और क्वांटम क्रिप्टोग्राफी के जरिए तैयार किया जाता है, जिसे किसी भी बाहरी सिस्टम के जरिए ना ही डिकोड किया जा सकता है और ना ही उसे किसी भी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर उस नेटवर्क सिस्टम को तोड़ा जा सकता है। अगर कोई हैकर क्वांटम कम्युनिकेशन में मैसेज को क्रैक करने की कोशिश करता है, तो इस सिस्टम में ऐसी टेक्नोलॉजी होती है, कि जिसने मैसेज भेजा है, उस तक अलर्ट मैसेज चला जाता है और इनके बीच जो मैसेज रहता है, वो अपना स्वरूप बदल लेता है या फिर नेटवर्क से डिलीट हो जाता है और किसी भी हालत में उसे पढ़ा नहीं जा सकता है।

कैसे किया गया परीक्षण?

कैसे किया गया परीक्षण?

क्वांटम नेटवर्क सिस्टम के परीक्षण के दौरान वैज्ञानिकों ने वातावरण में ही ही एक चैनल का निर्माण किया और फिर उस चैनल के जरिए दुनिया के सबसे सुरक्षित तरीके से क्वांटम प्रोटेक्टेड टेक्स्ट मैसेज, तस्वीरें भेजीं। इसके साथ साथ वैज्ञानिकों ने क्वांटम प्रोटेक्टेड वीडियो कॉलिंग भी करने में कामयाबी हासिल की है। वैज्ञानिकों ने यह प्रयोग स्पेस एप्लिकेशन सेंटर में 300 मीटर की दूरी पर स्थिति दो बिल्डिंग्स के बीच इस प्रयोग को करने में सफलता हासिल की है। आसान शब्दों में इसे समझने की कोशिश करें, तो वैज्ञानिकों ने रोशनी के कणों के जरिए मैसेज भेजने में कामयाबी हासिल की है और भारत के लिए ये एक बहुत बड़ी उपलब्धि है, खासकर डिफेंस सेक्टर में इस टेक्नोलॉजी के जरिए काफी गोपनीय बातचीत की जा सकती है।

शुद्ध स्वदेशी टेक्नोलॉजी

शुद्ध स्वदेशी टेक्नोलॉजी

इस प्रयोग को कामयाबी के साथ करने के बाद इसरो ने एक बयान जारी करते हुए कहा है कि, ''यह प्रयोग एक नहीं, बल्कि कई रातों में बार बार दोहराया गया है, ताकि स्वदेशी तकनीत से विकसित क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन प्रणाली की मजबूती से जांच की जा सके और पूरी तरह से सुनिश्चित किया जा सके, कि ये प्रयोग पूरी तरह से सफल रहा है और पूरी तरह से सुरक्षित नेटवर्क सिस्टम का निर्माण हो पाया है।'' इसरो ने कहा कि, 'सैटेलाइट क्वांटम कम्युनिकेशन नेटवर्क बनाने की दिशा में ये काफी महत्वपूर्ण कदम है और अब हम सैटेलाइट के जरिए क्वांटम नेटवर्क बनाने की कोशिश करेंगे, जो अत्यधिक तेज और पूर्ण सुरक्षित होगा।' इस नेटवर्क का इस्तेमाल उन सीक्रेट कम्युनिकेशन स्थापित करने के लिए किया जाएगा, जिसे पूरी तरह से गोपनीय रखना है, खासकर डिफेंस, टेक्नोलॉजी और गवर्नमेंट सेक्टर के लिए।

दो बिल्डिंग के बीच परीक्षण

दो बिल्डिंग के बीच परीक्षण

जब इसरो की टीम इस परीक्षण को कर रही थी, उस वक्त इसरो के प्रमुख एस. सोमनाथ भी वहां मौजूद थे। इसरो की रिपोर्ट के मुताबिक, परीक्षण के दौरान कई तस्वीरों को 'क्वांटम की' उत्पन्न करके उसे एन्क्रिप्ट किया गया और फिर एक क्लासिकल चैनल के जरिए 300 मीटर की दूरी में मौजूद एक बिल्डिंग से दूसरी बिल्डिंग के बीच भेजा गया। इस दौरान, जिन तस्वीरों को मैसेज के जरिए भेजा गया था, उन्हें रीयल टाइम में दूसरे बिल्डिंग में बनाए गये टर्मिनल में डिक्रिप्ट किया गया।

कैसे बनाया गया क्वांटम नेटवर्क?

कैसे बनाया गया क्वांटम नेटवर्क?

इसरो की इस उपलब्धि को कुछ इस तरह समझिए कि फ्री स्पेस क्वांटम कम्यूनिकेशन की टेक्नोलॉजी को क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन भी कहते हैं। और इसके जरिए कोई मैसेज, कोई पिक्चर या फिर कोई वीडियो भी प्रकाश कणों के जरिए फोंटोस में डाला जाता है और फिर से एक जगह से दूसरी जगह तक खास प्रकार से ट्रांसमीटर के जरिए भेजा जाता है। सबसे खास बात ये है कि इस प्रकार से भेजे गये मैसेज को एक खास प्रकार का रिसीवर ही प्राप्त कर सकता है, लिहाजा हैकर्स के लिए इस प्रकार के मैसेज को डिकोड करना नामुमकिन से कम नहीं होगा। सबसे खास बात ये है कि, इसरो ने इस टेक्नोलॉजी को खुद से ही डिजाइन और निर्माण किया है। इसरो का ये टेक्नोलॉजी शुद्ध स्वदेशी है यानि इसे पूरी तरह से भारत में ही बनाया गया है। लिहाजा इस साल इसरो ने हर भारतवासी को गर्व करने के लिए बड़ी वजह दी है। इसरो ने नाविक रिसीवर को अपग्रेड करके इसे इस लायक बनाया है, कि वो फ्री स्पेस क्वांटम कम्यूनिकेशन को डिसप्ले कर सके।

हैक करना होगा असंभव

हैक करना होगा असंभव

इसरो अपनी इस टेक्नोलॉजी को और मजबूत करने की कोशिश कर रहा है और अगर इसरो इस तकनीक को और शक्तिशाली करने में कामयाबी हासिल कर लेता है तो फिर स्पेस से भेजे गये मैसेज, खासकर सिक्रेट मैसेज को साथ ही अपने सैटेलाइटट से भेजे गये मैसेज को सोच से भी कम वक्त में सौ फीसदी सिक्योरिटी की गारंटी के साथ अपने गंतव्य स्थान तक पहुंचा सकता है और किसी भी दुश्मन की औकात नहीं होगी, कि उस संदेश को पढ़ सके। यानि, किसी भी देश के कितने भी ताकतवार हैकर्स के लिए इन मैसेज को पढ़ पाना नामुमकिन होगा।

भारतीय वैज्ञानिकों ने मनवाया लोहा

भारतीय वैज्ञानिकों ने मनवाया लोहा

फ्री स्पेस क्वांटम कम्यूनिकेश के जरिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करने में भी कामयाबी हासिल की है, जिसे भविष्य की टेक्नोलॉजी कहा जाता है। यानि, ये इतना ज्यादा सुरक्षित है कि इस तकनीक से की गई बातचीत को कोई भी नहीं जान सकता है। मान लीजिए भविष्य में अगर कोई लड़ाई होती है और इंडियन मिलिट्री को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोई महत्वपूर्ण प्लान बनाना हो, तो इंडियन आर्मी बगैर किसी डर के सीक्रेट से सीक्रेट मिटिंग कर सकती है और दुश्मन किसी भी हाल में हमारी प्लानिंग को नहीं समझ सकते हैं। उस वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग को दुश्मनों के लिए हैक करना किसी भी देश के हैकर्स के लिए नामुमिकन होगा। विश्व के विकसीत देश जैसे चीन और अमेरिका इसी टेक्नोलॉजी को और विकसित करने पर काम कर रहे हैं। यानि, भारतीय वैज्ञानिकों ने दिखा दिया है, कि उनकी क्षमता किसी से कम नहीं है।

क्वांटम क्रिप्टोग्राफी को समझिए

क्वांटम क्रिप्टोग्राफी को समझिए

क्वांटम क्रिप्टोग्राफी अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी माना जाता है जिसका मतलब ये होता है कि किसी संदेश को प्रकाश कण फोंटोस में बदल दिया जाता है और फिर उसे सुरक्षित रखा जाता है। इसे इस तरह से सुरक्षित रखा जाता है कि कोई इसे ब्रेक नहीं कर सकता है। यानि, जो मैसेज आप वाट्सएप पर किसी को भेजते हैं वो जितना सुरक्षित होता है उससे लाखों गुना ज्यादा सुरक्षित इसरो की ये टेक्नोलॉजी है। लिहाजा, इसरो के लिए इस टेक्नोलॉजी का सफल परीक्षण करना काफी बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। इसरो ने जिस टेक्नोलॉजी का सफल परीक्षण किया है, उसे तोड़ने के लिए दुनिया में अभी तक कोई टेक्नोलॉजी बनी ही नहीं है। यानि, अभी तक दुनिया के किसी भी देश के पास वो तकनीक नहीं है, जिसके जरिए वो क्रिप्टोग्राफी के मैसेज को ब्रेक कर सके। इसरो ने इस टेक्नोलॉजी का प्रदर्शन अहमदाबाद स्थिति स्पेस एप्लिकेशन सेंटर में किया है।

चीन को भारतीय वैज्ञानिकों की सीधी चुनौती

चीन को भारतीय वैज्ञानिकों की सीधी चुनौती

पिछले साल रिपोर्ट आई थी कि चीन भी फ्री स्पेस क्वांटम कम्यूनिकेशन की टेक्नोलॉजी को विकसित करने जा रहा है। चीन की भी कोशिश यही थी कि उसके मैसेज को कोई और देश या हैकर्स तोड़ ना सके। रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चीन ने इस नेटवर्क में सेना, बैंक, सरकार और बिजली विभाग के 2 हजार से ज्यादा अधिकारियों को इस नेटवर्क से जोड़ा था। चीन का ये संदेश सिर्फ नेटवर्क में मौजूद लोग ही पढ़ सकते थे। इसके साथ ही रिपोर्ट ये भी है कि 2030 तक चीन ऐसे ही सैटेलाइट्स अंतरिक्ष में स्थापित करने की कोशिश में हैं और अब इसी कोशिश में इसरो भी लग गया है। यानि, इसरो और चीन के बीच एक तरह की प्रतिस्पर्धा चल रही है। माना जा रहा है कि चीन अपना क्वांटम शेयरिंग नेटवर्क बनाने की कोशिश में लगा है ताकि पूरे देश की सुरक्षा को ही लॉक किया जा सकेऔर इसरो का भी मकसद भविष्य में साइबर वार से देश को बचाने के लिए इसी टेक्नोलॉजी को विकसित करना है।

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