Israel Iran War: एक लग्जरी पार्टी और ईरान में कट्टर इस्लाम का आगमन, जानें इस्लामिक क्रांति की पूरी कहानी
Israel Iran War: प्रथम विश्वयुद्ध खत्म हो गया था, जर्मनी, रूस, ऑस्ट्रिया हंगरी और तुर्की साम्राज्य का पतन हो चुका था, जबकि इस युद्ध को जीतने वाले मित्र देशों में से एक ब्रिटेन बड़ी शक्ति बनकर उभर चुका था। इसके पहले पर्शिया में रूस और ब्रिटेन के प्रभाव वाले इलाकों में बंटा हुआ था चूंकि रूस की करारी हार हो चुकी थी, लिहाजा इसके बाद ब्रिटेन इसे अपने प्रोटेक्टोरेट के रूप में घोषित करना चाहता था लेकिन ऐसा हुआ नहीं। फिर साल आता है 1925, इस साल पर्शिया में एक ऐतिहासिक शुरुआत हुई, दरअसल यहां पहलवी राजवंश की नींव रखी जा चुकी थी।
पहलवी राजवंश की शुरुआत
ईरान में पहलवी राजवंश के पहले शासक थे रेजा शाह पहलवी, रेजा शाह ने 16 साल पर्शिया पर राज किया, पर्शिया का नाम 1935 में बदलकर ईरान भी कर दिया था। क्योंकि पर्शिया के लोग इसे पहले ईरान के नाम से ही बुलाते थे, जबकि पर्शिया बाहरी लोगों का दिया हुआ नाम था। अब आता है दूसरे विश्वयुद्ध का दौर। इन दिनों शासन भले ही पहलवी का था लेकिन ईरान की एक रिफाइनरी अभी भी ब्रिटेन के नियंत्रण में थी। युद्ध शुरू हुआ तो ब्रिटेन को इस बात का खतरा सताने लगा कि कहीं हिटलर की सेना इस रिफाइनरी पर कब्जा ना कर ले। ब्रिटेन ने रेजा शाह से जर्मन लोगों को उनके देश से भगाने के लिए कहा लेकिन रेजा शाह पहलवी इसके लिए तैयार नहीं हुए। नतीजतन 1941 में ब्रिटेन और रूस ने मिलकर ईरान पर हमला कर दिया, इस हमले के बाद रेजा शाह पहलवी को सत्ता गंवानी पड़ी और उनकी जगह नए शाह और उनके बेटे मोहम्मद रेजा शाह पहलवी को कमान सौंपी गई, जो लंबे समय से ईरान को मॉर्डन बनाना चाहते थे, उनकी छवि भी एक लिबरल नेता की थी जो अमेरिका और ब्रिटेन का एक बढ़िया दोस्त था। इसका एक और कारण था, मोहम्मद रेजा शाह पहलवी अमेरिका और ब्रिटेन को सस्ते दाम में कच्चा तेल भी बेचते थे और करीबी थे।

मुसादिक की एंट्री और तख्तापलट
कुछ साल सब बढ़िया चला लेकिन फिर आया साल 1950, कहानी मेें एंट्री होती है मोहम्मद मुसादिक की। मुसादिक एक ईरानी राष्ट्रवादी नेता, पेशे से लेखक, वकील और राजनेता भी थे। इसी दशक में मुसादिक कच्चे तेल को लेकर ऐसा बिल लेकर आए जो विवाद की वजह बना। मुसादिक जो बिल लाए थे उसमें ब्रिटेन को नुकसान पहुंचा रहा था, लेकिन ईरानी जनता को इससे फायदा होने लगा। लोगों में उनका समर्थन बढ़ा। 1951 में मुसादिक चुनाव में पीएम चुने गए और शाह को ईरान छोड़कर भागना पड़ा। लेकिन ब्रिटेन और अमेरिका ऐसा होता देख चुप कैसे रह सकते थे। तो दोनों तरफ के गोरे साहबों ने दिमाग लगाया और मुसादिक का ही तख्तापलट कर दिया और उनकी जगह फज्लोल्लाह जहेदी को नया पीएम बनाया दिया और इनके सहारे ईरान में मोहम्मद रेजा शाह पहलवी की वापसी हुई और शुरू हुआ फिर से अमेरिका, ब्रिटेन और ईरान के तेल का खेल।
महिलाओं के लिए खुला ईरान
तेल के इस बंदरबांट ने ईरान को आर्थिक नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया। जनता में फिर पहलवी के खिलाफ गुस्सा भड़कने लगा। दस साल तक सहन करने के बाद ईरानी जनता में सफेद क्रांति की शुरूआत हुई, जिसमें ईरान को आधुनिक बनाने की बात कही गई। शाह हिजाब और दूसरे कट्टर इस्लामी परम्पराओं के खिलाफ भी थे तो कट्टर मुस्लिम मौलानाओं के निशाने पर रहते थे। रजा पहलवी के शासन में ईरान पश्चिमी देशों से भी ज्यादा 'खुला' था. विश्वविद्यालयों में महिलाओं की संख्या बढ़ने लगी थी. उनकी ड्रेस, बालों और पहनावे पर कोई रोक-टोक नहीं थी. महिलाएं सड़कों पर पश्चिमी शैली के कपड़े पहने नजर आती थीं. उनके अपने अधिकार थे जिनकी मालिक वो खुद थीं। वे पढ़ सकती थीं, नौकरी कर सकती थीं।
मौलानाओं के निशाने पर शाह
शाह के मुताबिक धर्म और शासन दोनों अलग-अलग थे। लेकिन मौलानाओं के अंदर भी सत्ता की भूख बढ़ रही थी। कब तक खाली धर्म के सहारे माहौल बनाते जबकि असली मजा तो सत्ता में था। इन्हीं में से एक धार्मिक नेता थे, अयातोल्ला अल-उज़्मा सायद रुहोल्ला मोसावि खुमैनी, उर्फ अयातुल्ला रुहोल्ला खुमैनी। खुमैनी की जड़ें भारत से थीं, उनके दादा सैयद अहमद मुसावी जिन्हें लोग हिंदी भी कहते थे, उनका जन्म भारत के बाराबंकी के कुंटूर में हुआ था। वे यहां से धार्मिक यात्रा पर ईरान गए, फिर वहां दिल ऐसा लगा कि वहीं के हो गए। खैर, खुमैनी जनता के तो करीब थे लेकिन रेजा शाह की उनको लेकर निगाह हमेशा तिरछी ही रहती थी, तो उन्होंने 1964 में रुहोल्ला खुमैनी को ईरान से बाहर कर दिया। यहीं से खुमैनी लेख लिखकर लोगों को इस्लामी क्रांति के नाम पर जगाए रखा। उनके लेखों ने शाह के खिलाफ माहौल इतना गर्म कर दिया कि कभी भी क्रांति की आग लग जाए। इस क्रांति में चिंगारी खुद शाह दे बैठे लेकिन गलती से।
एक जश्न, सब भस्म
दरअसल हुआ यूं कि 1971 में पर्शियन साम्राज्य के ढाई हजार साल पूरे हो रहे थे, शाह ने जलसे का सोचा, जलसा हुआ पर्शिया के पहले शासक सायरस के मकबरे के पास। 30 किलोमीटर के दायरे को पार्टी के लिए तैयार किया गया। 600 किलोमीटर की रोड बिछाई, रेशम के भव्य शामियाने बने, इतने भव्य कि इनका रेशम अगर उधेड़ा जाता तो 35 किलोमीटर से भी ज्यादा का इलाका कवर हो सकता था। खालीपन ना लगे इसले 50 हजार गौरेयाएं यूरोप से इम्पोर्ट की गईं। पेरिस का सबसे नामचीन हलवाई और उसकी टीम, पेरिस से बर्तन, स्विट्जरलैंड से वेटर। जो मेहमान आने वाले थे उनके पालतू जानवरों तक के लिए खास इंतजाम थे। तीन दिन तक पार्टी चली, टाइम्स मैग्जीन में पार्टी की खबर छपी, पार्टी को सबसे महंगी पार्टी का तमगा गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज हुआ और यहीं से शाह के खिलाफ बने गर्म माहौल में चिंगारी खुद शाह ने दे दी। दरअसल पार्टी के बाद प्रेस से निपटना एक बड़ी चुनौती बन गया था। एक तरफ शाह की सौ मिलियन डॉलर के खर्च वाली पार्टी थी, तो दूसरी तरफ प्रेस लिख रही थी कि ईरान में लोग भूख से मर रहे हैं और शाह पार्टी में मशरूफ हैं। शाह की पत्नी फराह फहलवी ने भी अपने लेखों में इस घटना का जिक्र किया है।
शाह का पतन और खुमैनी की वापसी
अयातोल्ला खुमैनी ने भी इस पार्टी को मुद्दा बनाकर ईरान के बाहर से ही आंदोलन बुलंद करना शुरू कर दिया। जनता में गुस्सा बढ़ा और शाह का लिबरलिज्म धरा रह गया। भारी प्रदर्शन शुरू हो गए, लोगों को जेल में भरना शुरू किया तो मामला औऱ बिगड़ गया। इतना कि जान बचाने के लिए रेजा शाह पहलवी को मुल्क छोड़ना पड़ा और 14 साल बाद वापसी हुई अयातुल्ला रुहोल्ला खुमैनी की। खुमैनी ने लौटते ही जनमत संग्रह करवाया और ईरान में इस्लामिक गणतंत्र की स्थापना की। जिसे हम सब ईरान की इस्लामिक क्रांति कहते हैं, दरअसल उसके पीछे कहानी यही है। इसके 10 साल तक अयातुल्ला रुहोल्ला खुमैनी राज किया फिर उनकी मौत के बाद ईरान के तत्कालीन राष्ट्रपति अली खामेनेई को सुप्रीम लीडर बनाया गया जो अभी तक ईरान के सुप्रीम लीडर के पद पर हैं।
अब का ईरान
ये तो था 1979 के पहले का ईरान, जहां महिलाओं के अधिकारी थे, आधुनिक था, पढ़ाई-लिखाई और साइंस पर जोर था। अब बात करते हैं 1979 के बाद के ईरान की। अब ईरान एक कट्टर इस्लामिक मुल्क बन गया, जहां हिजाब न पहनने पर भी सजा दी जाती है. ईरान एक शरिया कानून पर चलने वाला देश है, जो धार्मिक मान्यताओं का पालन पूरी कट्टरता से करता और करवाता है. कपड़ों से लेकर इबादत तक से जुड़े कई कड़े नियम लोगों के सार्वजनिक जीवन को नियंत्रित करते हैं. इन नियमों पर ईरानी सरकार की कड़ी नजर रहती है और इनका उल्लंघन करने पर सख्त सजा दी जाती है. उदाहरण के लिए आप सितंबर 2022 में हुआ महसा अमीनी केस पढ़ सकते हैं। जब हिजाब ना पहनने पर एक 22 साल की लड़की को कैसे यातनाएं देकर अली खामेनेई की मोरल पुलिस ने मार दिया था। उसके बाद भी लोगों में मौजूदा इस्लामिक रिजीम वाली सरकार के खिलाफ असंतोष है। जब ईरान में सैन्य ठिकानों पर इजरायली हमले हो रहे थे, तब कई ईरानी लोग डेथ टू खामेनेई के नारे लगा रहे थे। इस जंग में आगे क्या होगा, ये वक्त तय करेगा।
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