इजराइल और ईरान... दो कट्टर दुश्मनों में भारत के सबसे करीब कौन? मोदी सरकार ने संघर्ष की निंदा क्यों नहीं की?
ईरान ने 1 अप्रैल को सीरिया पर किए गए हमले का बदला लेते हुए इजराइल पर क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइलें के अलावा ड्रोन से बड़े पैमाने पर हमला किया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान ने इजराइल पर करीब 350 मिसाईलों से हमला किया। इनमें से 99% को हवाई सुरक्षा द्वारा रोक दिया गया।
ईरान के इस हमले में दक्षिणी इजराइल के एक सैन्य अड्डे को मामूली नुकसान पहुंचा है। वहीं एक 10 वर्षीय लड़की गंभीर रूप से घायल हो गई है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक ड्रोन्स को सीरिया और जॉर्डन में भी मार गिराया गया है।

गौरतलब है कि ईरान के इस हमले के बाद अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन ने निंदा की है। जबकि भारत ने अब तक ईरानी हमले की निंदा नहीं की है। हालांकि भारत ने इस हमले पर गहरी चिंता जताई है। विदेश मंत्रालय ने पश्चिम एशिया के हालात पर बयान जारी करते हुए कहा है कि दोनों देशों को कूटनीति के जरिए मुद्दों का हल करना चाहिए।
विदेश मंत्रालय ने जताई चिंता
विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी करते हुए कहा, 'हम इजराइल और ईरान के बीच बढ़ती शत्रुता से गंभीर रूप से चिंतित हैं जिससे क्षेत्र में शांति और सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है। हम तत्काल तनाव कम करने, संयम बरतने, हिंसा से पीछे हटने और कूटनीति के रास्ते पर लौटने का आह्वान करते हैं। हम मौजूदा हालात पर करीब से नजर बनाए हुए हैं। इस क्षेत्र में मौजूद हमारे दूतावास भारतीय समुदाय के साथ लगातार संपर्क में हैं। यह बहुत अहम है कि क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता बनी रहे।'
भारत ने क्यों नहीं की निंदा?
भारत के लिए इसराइल और ईरान दोनों ही बराबर की अहम रखते हैं। एक के पक्ष में रहकर भारत दूसरे संग संबंध खराब नहीं कर सकता। ईरान शिया मुस्लिम बहुल देश है और भारत में भी ईरान के बाद सबसे ज़्यादा शिया मुस्लिम रहते हैं। ईरान और भारत के संबंध कभी खराब नहीं रहे हैं लेकिन ईरान पर लगे प्रतिबंधों के कारण दोनों के रिश्ते उतार-चढ़ाव भरे निश्चित ही रहे हैं।
इजराइल-ईरान दोनों के करीब भारत
वहीं, दूसरी ओर मोदी सरकार आने के बाद भारत के संबंध इजराइल से काफी बेहतर हुए हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा, साइबर, तकनीकी के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा है। क्षेत्रीय मामलों में भारत अपने हितों के हिसाब से इजराइल और ईरान का साथ देता आया है।
भारत की नीति है कि इजराइल, ईरान के साथ संबंधों में रुकावट न बने और न ही ईरान इसराइल के साथ रिश्ते में बाधा बने। भारत कभी भी दो देशों के आपसी संघर्ष पर नहीं बोलता है। भारत की सदैव ही ये नीति रही है। भारत की पॉलिसी ये रही है, कि डिप्लोमेसी से ही समस्या का समाधान निकल सकता है, ना कि युद्ध से।
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