Khamenei Power Struggle: क्या गिरने वाला है खामेनेई का साम्राज्य? परमाणु डील पर भिड़े दो ईरानी दिग्गज नेता
Khamenei Power Struggle: ईरान में गालिबाफ और सईद जलीली के बीच छिड़ी वर्चस्व की जंग ने तेहरान में राजनीतिक भूकंप ला दिया है। इस्लामिक रिपब्लिक आज उस दोराहे पर खड़ा है, जहां एक तरफ 'प्रैग्मैटिक हार्डलाइनर' मोहम्मद बागेर गालिबाफ हैं, जो डूबती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए पश्चिम से हाथ मिलाने की वकालत कर रहे हैं। दूसरी ओर 'लिविंग शहीद' सईद जलीली और उनका कट्टरपंथी धड़ा है, जिनके लिए समझौता 'गुनाह' और टकराव ही एकमात्र रास्ता है।
तेहरान के सबसे सुरक्षित दफ्तर 'बेत' से लेकर सड़कों तक फैली यह दरार बताती है कि 'सुप्रीम लीडर' की पकड़ ढीली पड़ रही है। यह जंग सिर्फ परमाणु वार्ता की नहीं, बल्कि इस बात की है कि मुज्तबा खामेनेई के दौर में ईरान एक आधुनिक राष्ट्र बनेगा या कट्टरपंथ की आग में खुद को झोंक देगा।

Mohammad Bagher Ghalibaf vs Saeed Jalili: विचारधाराओं का टकराव
ईरान की राजनीति आज दो ध्रुवों में बंट गई है। गालिबाफ मानते हैं कि प्रतिबंधों से चरमराती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए अमेरिका से बातचीत जरूरी है। वहीं, सईद जलीली किसी भी समझौते को 'आत्मसमर्पण' मानते हैं। जलीली की कट्टरपंथी सोच उन्हें 'प्रतिरोध' की राजनीति का चेहरा बनाती है। यह विवाद अब इतना बढ़ चुका है कि गालिबाफ पर 'रेड लाइन्स' पार करने के आरोप लग रहे हैं, जो सीधे तौर पर सुप्रीम लीडर के उत्तराधिकारी की सत्ता को चुनौती देने जैसा है।
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'बेत' और मुज्तबा खामेनेई का अदृश्य नियंत्रण
ईरान की असली ताकत संसद में नहीं, बल्कि 'बेत-ए रहबरी' में बसती है। सुप्रीम लीडर के बेटे मुज्तबा खामेनेई इस दफ्तर के जरिए पूरे देश को नियंत्रित कर रहे हैं। 4,000 से अधिक कर्मचारियों वाला यह 'समांतर शासन' तय करता है कि सेना, अर्थव्यवस्था और परमाणु नीति किस दिशा में जाएगी। वर्तमान विवाद में मुज्तबा की भूमिका सबसे अहम है, क्योंकि गालिबाफ और जलीली की यह लड़ाई दरअसल मुज्तबा के दरबार में अपनी वफादारी साबित करने की होड़ है।
आर्थिक तबाही और डूबता हुआ रियाल
ईरान इस वक्त केवल राजनीतिक ही नहीं, बल्कि वजूद की लड़ाई लड़ रहा है। होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी ने देश की कमर तोड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की अर्थव्यवस्था 8 सप्ताह से ज्यादा यह बोझ नहीं उठा पाएगी। इंटरनेट बंद होने से 20% वर्कफोर्स बेरोजगार हो चुकी है और निजी क्षेत्र में लाखों नौकरियां जाने का खतरा है। यह आर्थिक तबाही ही वह मुख्य कारण है जिसके चलते गालिबाफ जैसा नेता पश्चिम के साथ समझौते का दांव खेल रहा है।
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जनता का विद्रोह और तख्तापलट का साया
ईरान की सुरक्षा एजेंसियां भीतर से डरी हुई हैं। खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक, बेरोजगारी और भुखमरी से परेशान जनता कभी भी सड़कों पर उतर सकती है। जनवरी 2026 की हिंसा की यादें अभी ताजा हैं, और अब निर्वासित प्रिंस रेजा पहलवी का बढ़ता प्रभाव सरकार की नींद उड़ा रहा है। सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल को डर है कि अगर गालिबाफ और जलीली की खींचतान नहीं रुकी, तो यह आंतरिक कलह एक बड़े जन-विद्रोह को जन्म दे सकती है।
क्या ईरान युद्ध की राह पर है?
सईद जलीली की संभावित वापसी इस बात का संकेत है कि ईरान समझौते की मेज को लात मारने वाला है। अगर जलीली को मुख्य वार्ताकार बनाया जाता है, तो परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत पूरी तरह ठप हो जाएगी। यह स्थिति सीधे तौर पर पश्चिम और इजरायल के साथ टकराव को न्योता देगी। गालिबाफ भले ही सुधारक बनना चाहते हों, लेकिन कट्टरपंथियों का बढ़ता दबाव संकेत दे रहा है कि ईरान ने वह रास्ता चुन लिया है जो अंततः उसे एक विनाशकारी युद्ध की ओर ले जा सकता है।












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