ISI चीफ के काबुल दौरे की BIG इनसाइड स्टोरी, मुल्ला बरादर को राष्ट्रपति क्यों नहीं बनाना चाहता है पाकिस्तान?
तालिबान शुक्रवार को नमाज के बाद सरकार का ऐलान करने वाला था, लेकिन उसे पहले शनिवार तक और फिर अगले हफ्ते तक टाल दिया गया है। माना जा रहा है कि अफगानिस्तान जीतकर भी तालिबान हारने वाला है।
काबुल, सितंबर 05: अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार की घोषणा होने में अब कुछ दिनों का वक्त और लगने वाला है। रिपोर्ट है कि तालिबान के अंदर सरकार बनाने को लेकर झगड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है, जिसे सुलझाने के लिए पाकिस्तान खुफिया एजेंसी के चीफ लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद कल ही काबुल पहुंच चुके हैं। रिपोर्ट है कि तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के बीच विवाद काफी बढ़ गया है। पाकिस्तानी मीडिया ने दावा किया है कि तालिबान ने नई सरकार बनाने के लिए पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के प्रमुख को काबुल में आमंत्रित किया था, लेकिन पाकिस्तानी मीडिया के बड़े सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान चाहता है कि हक्कानी नेटवर्क को अफगानिस्तान में बनने वाली सरकार में बड़ी भूमिका दी जाए, जो तालिबान नहीं चाहता है।

मुल्ला बरादर के खिलाफ पाकिस्तान
अफगानिस्तान की पूर्व सांसद मरियम सोलेमानखी ने दावा किया है कि, आईएसआई प्रमुख फैज हमीद काबुल में आतंकी संगठन हक्कानी नेटवर्क के नेता को तालिबान सरकार का प्रमुख बनाने और मुल्ला अब्दुल गनी बरादर को राष्ट्रपति बनने से रोकने के लिए काबुल पहुंचे हैं। मरियम ने यह भी कहा है कि तालिबान में शामिल अलग अलग गुटों के बीच मुल्ला बरादर को लेकर मतभेद काफी बढ़ चुका है, जिसके बाद पंजशीर में चल रहे युद्ध से मुल्ला बरादर ने खुद को अलग कर लिया है। जबकि, अभी तक तालिबान ने कई वरिष्ठ नेता कह चुके थे कि अफगानिस्तान में बनने वाली अगली सरकार का नेतृत्व मुल्ला बरादर करेंगे, लेकिन पाकिस्तान नहीं चाहता है कि मुल्ला बरादर अफगानिस्तान का राष्ट्रपति बने।

आईएसआई चीफ ने क्या कहा?
अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पहुंचने के बाद आईएसआई चीफ फैज हमीद ने कहा कि ''पाकिस्तान- अफगान सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और अन्य मामलों से संबंधित मुद्दों को तालिबान नेतृत्व के साथ उठाया जाएगा।'' उन्होंने कहा कि, ''चिंता मत करिए, सब ठीक हो जाएगा," लेकिन, लोगों का कहना है कि अर्थव्यवस्था पर बात करना सरकार का काम है, खुफिया एजेंसी के प्रमुख का काम देश की अर्थव्यवस्था पर बात करना नहीं है। वहीं, अर्थव्यवस्था पर अगर बात होनी भी है तो काबुल में सरकार बनने के बाद सरकार के अधिकारियों और मंत्रियों से होनी चाहिए, सरकार बनने से पहले भला किस अर्थव्यवस्था की बात करने आईएसआई चीफ काबुल पहुंचे हैं?
हक्कानी नेटवर्क के साथ पाकिस्तान
हालांकि, अंदरूनी सूत्रों ने कहा कि यह दौरा अफगानिस्तान में बनने वाली नई सरकार में हक्कानी नेटवर्क को जिम्मेदारी देने को लेकर है। पिछले कुछ दिनों से तालिबान नेतृत्व और हक्कानी नेटवर्क के बीच सरकार गठन को लेकर लगातार बातचीत चल रही है, लेकिन दोनों के बीच की बातचीत में अब विवाद बढ़ने लगा है। लिहाजा सरकार का गठन नहीं हो पा रहा है। काबुल पर कब्जे के बाद हक्कानी नेटवर्क के प्रमुख नेता सिरुआजुद्दीन हक्कानी ने अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई और अफगानिस्तान के प्रमुख नेता अब्दुल्ला-अब्दुल्ला से मुलाकात की थी और दावा किया था कि जल्द सरकार का गठन होगा, लेकिन मुलाकात के बाद हामिद करजई और अब्दुल्ला-अब्दुल्ला को तालिबान ने नजरबंद कर दिया। हक्कानी नेटवर्क को सीधा पाकिस्तान का समर्थन हासिल है और ऐसी रिपोर्ट है कि तालिबान के बदले रवैये के चलते पाकिस्तान चाहता है कि अफगानिस्तान की सरकार में तालिबान की जिम्मेदारी कम से कम हो।

जीतकर भी हार जाएगा तालिबान?
अफगानिस्तान की नेता मरियम सोलेमानखिल ने शनिवार को ट्वीट कर जो कहा है, उससे साफ जाहिर हो रहा है कि तालिबान को पाकिस्तान ने बड़ा झटका दे दिया है। उन्होंने कहा कि, तालिबान के खिलाफ तालिबान विरोधी ताकतों के जीतने की संभावना ज्यादा बनने लगी है। यानि, अफगानिस्तान में जिस सरकार का निर्माण होगा, कहने के लिए तो वो तालिबान की सरकार होगी, लेकिन उस सरकार में तालिबान के नेताओं की जिम्मेदारी कम से कम होगी। करीब सात सालों तक पाकिस्तान की जेल में बंद रहने वाले मुल्ला बरादर को पाकिस्तान राष्ट्रपति पद पर बैठते हुए देखना नहीं चाहता है, जबकि तालिबान सिर्फ मुल्ला बरादर को ही राष्ट्रपति बनाना चाहता है, लिहाजा ये लड़ाई और बढ़ने के आसार हैं।
शुक्रवार को ही बनने वाली थी सरकार
आपको बता दें कि, तालिबान शुक्रवार को ही मुल्ला अब्दुल गनी बरादर के नेतृत्व में नई सरकार के गठन की घोषणा करने वाला था, जिसे बाद में शनिवार तक के लिए टाल दिया गया था। लेकिन, अब अफगानिस्तान में सरकार गठन को कुछ दिनों के लिए स्थगित कर दिया गया है। तालिबान के प्रवक्ता ने सरकार बनाने में हो रही देरी को लेकर कहा कि ''वे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए तालिबान की सरकार को मान्यता दिलाने के लिए और कोशिस कर रहे हैं और एक समावेशी सरकार बनाने की कोशिश कर रहे हैं, इसीलिए देरी हो रही है''। लेकिन, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के प्रमुख के काबुल दौरे के बाद ही साफ हो गया है कि तालिबान में मतभेद काफी गहरे हो चुके हैं और ऐसा लग रहा है कि अगर पाकिस्तान की बात मानी जाती है, तो अफगानिस्तान जीतकर भी तालिबान हार जाएगा।

आईएसआई ने किया था बरादर को गिरफ्तार
आपको बता दें कि, 2010 में तालिबान के सह-संस्थापक मुल्ला बरादर को आईएसआई ने पाकिस्तान में गिरफ्तार किया था और इसलिए माना जाता है कि वह आईएसआई के प्रभाव को अस्वीकार कर रहा है और आईएसआई प्रमुख इस झगड़े को सुलझाने के लिए काबुल पहुंचे हैं। मुल्ला बरादर को 2017 में पाकिस्तान में इमरान खान की सरकार बनने के बाद रिहा किया गया था। माना जाता है कि अमेरिका के कहने पर इमरान खान ने मुल्ला बरादर को जेल से रिहा किया था, जिसे डोनाल्ड ट्रंप की सरकार ने शांति वार्ता दल का हिस्सा बनाया था।












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