अमेरिकी FIM-92 Stingers लगेगा बच्चा, DRDO बना रहा कंधे से दागने वाली सबसे खतरनाक मिसाइल, घबराएगा चीन-PAK
Shoulder-Fired Missiles: DRDO कंधे से दागी जाने वाली एयर डिफेंस (AD) मिसाइल विकसित कर रहा है, जो कई मायनों में अमेरिका के FIM-92 Stinger से भी ज्यादा खतरनाक होगी। संसद में एक प्रश्न के लिखित जवाब में रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने कहा, कि DRDO की कंधे से दागी जाने वाली एडी मिसाइल इसकी VSHORADS (Very Short Range Air Defence Missile System) मिसाइल का छोटा वेरिएंट होगी।
उन्होंने कहा, "VSHORADS की टेक्नोलॉजी और कुछ सब-सिस्टम का इस्तेमाल कंधे से दागी जाने वाली स्वदेशी एयर डिफेंस मिसाइल के विकास के लिए किया जा सकता है।"

आपको बता दें, कि VSHORADS चौथी पीढ़ी की मानव-पोर्टेबल मिसाइल प्रणाली है, जिसके लिए ट्राइपॉड लांचर की जरूरत होती है। स्टिंगर तीसरी पीढ़ी की मानव-पोर्टेबल कंधे से दागी जाने वाली मिसाइल है। (स्टिंगर ब्लॉक 2 मिसाइल कथित तौर पर चौथी पीढ़ी की है।)
मिसाइल जेनरेशन
तीसरी पीढ़ी के MANPADS मिसाइल, अपने टारगेट की इमेज बनाने के लिए रोसेट स्कैनिंग IR डिटेक्टरों का इस्तेमाल करते हैं, जबकि चौथी पीढ़ी के MANPADS टारगेट की IR छवि बनाने के लिए इमेजिंग इन्फ्रारेड सेंसर का इस्तेमाल करते हैं, जिससे इनकी सटीकता और भी ज्यादा बढ़ जाती है।
DRDO VSHORADS मिसाइल का एक छोटा और हल्का वेरिएंट विकसित करने का इरादा रखता है, जिसे कंधे से लॉन्च किया जा सकता है। और यही वजह है, कि VSHORADS मिसाइल में अमेरिकी स्टिंगर मिसाइल की तुलना में बेहतर सीकर, लंबी दूरी और बेहतर गतिशीलता है।
इसलिए, VSHORADS का कंधे से फायर किया जाने वाला वेरिएंट, स्टिंगर से बेहतर प्रदर्शन करेगा क्योंकि इसमें बेसलाइन वेरिएंट जैसी ही टेक्नोलॉजी शामिल की गई हैं।
बेहतर सीकर
DRDO के VSHORADS की इफेक्टिव रेंज 6 किलोमीटर है और इसमें इमेजिंग इंफ्रारेड (IIR) होमिंग सिस्टम है। IIR सीकर, अमेरिकी स्टिंगर मिसाइल पर लगे तीसरी पीढ़ी के IR सीकर की तुलना में ज्यादा एडवांस और सक्षम है।
एक IR सीकर किसी ऊष्मा स्रोत का पता लगाने और उसे ट्रैक करने के अलावा उसकी तस्वीर भी बना सकता है। यह IR जैमिंग और स्पूफिंग के प्रति काफी लचीला होता है, जो लक्ष्य की तरफ से, मान लीजिए किसी फाइटर जेट या हेलीकॉप्टर के डिफेंसिव सूट या खुद लक्ष्य की तरफ से रिलीज किए गये IR फ्लेयर्स के बीच आसानी से भेदभाव कर सकता है और उस हिसाब से टारगेट को मार सकता है।
ये सिस्टम दुश्मन के किसी प्रॉक्सी टारगेट को पहचान लेता है और दुश्मन के झांसे में नहीं फंसता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि IIR अपने लक्ष्य की पहचान सकता है और बेहतर मारक क्षमता हासिल करने के लिए लक्ष्य-विशिष्ट खोज एल्गोरिदम का उपयोग कर सकता है।

गतिशीलता
अमेरिकी स्टिंगर मिसाइल को एक ऐसी मिसाइल होने की अच्छी-खासी प्रतिष्ठा प्राप्त है, जिससे बच पाना मुश्किल है। यह एरोडायनामिक कंट्रोल सरफेस और थ्रस्ट वेक्टरिंग के संयोजन का उपयोग करके उड़ान में मजबूती से पैंतरेबाज़ी करता है, जिससे लक्ष्य का बच निकलना बहुत मुश्किल हो जाता है।
लेकिन भारतीय VSHORADS स्टिंगर की तुलना में कहीं ज्यादा खतरनाक है।
यह भी एरोडायनामिक सरफेस और थ्रस्ट वेक्टरिंग का इस्तेमाल करता है, जिसे एक छोटे आकार के रिएक्शन कंट्रोल सिस्टम (RCS) का उपयोग करके लागू किया जाता है। अपने दोहरे पल्स सॉलिड प्रोपेलेंट रॉकेट मोटर के साथ, VSHORADS, अमेरिकी स्टिंगर मिसाइल से काफी बेहतर प्रदर्शन करने की क्षमता रखता है। यह थ्रस्ट वैरिएशन के जरिए अपनी पैंतरेबाजी क्षमता को लगातार बदलता रहता है और जब इसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है, उस वक्त ये थ्रस्ट को बढ़ाता है।
बर्निंग एरिया, नोजल, रॉकेट मोटर चैंबर, प्रोपेलेंट टाइप और कई प्रोपेलेंट ब्लॉक को टेलर करके थ्रस्ट वैरिएशन हासिल किया जाता है। जाहिर है, लॉन्च के बाद, प्रोपेलेंट को ज्यादा स्पीड से बाहर निकालने की क्षमता देकर एक हाई प्रोपेलेंट हासिल किया जा सकता है और ये खासियत भारतीय VSHORADS मिसाइल में है।
लेकिन, अमेरिकी स्टिंगर मिसाइल में डबल पल्स रॉकेट मोटर की सुविधा नहीं है। यह प्रपल्शन के लिए सिंगल-स्टेज सॉलिड रॉकेट मोटर का इस्तेमाल करता है, जो उड़ान के दौरान मिसाइल को उसकी मैक्सिमम स्पीड तक बढ़ाता है। गतिशीलता के लिए, स्टिंगर खास तौर से एयरडायनेमिक कंट्रोल सरफेस और थ्रस्ट वेक्टरिंग पर निर्भर करता है।

डायमेंशनल चैलेंज
VSHORADS मिसाइल 2 मीटर लंबी, 0.09 मीटर व्यास वाली और 21 किलोग्राम वजन की है, जबकि अमेरिकी स्टिंगर 1.52 मीटर लंबी, 0.07 मीटर व्यास और 10.1 किलोग्राम वजन की है। यानि, भारतीय VSHORADS मिसाइल, स्टिंगर की तुलना में काफी बड़ी और काफी ज्यादा भारी है, यही वजह है कि इसे लॉन्च करने के लिए ट्राइपॉड की जरूरत होगी।
मिसाइल के आकार और वजन को कम करने का एक प्रभावी तरीका ये है, कि इसमें छोटे रॉकेट मोटर्स का इस्तेमाल करना होगा, लेकिन ऐसा करने से इसकी रेंज कम हो जाएगी। फिलहाल इसकी रेंज 6 किलोमीटर है, जो खासतौर पर पहाड़ी क्षेत्र में युद्ध के लिए डिजाइन किया गया है। और अगर इसे कंधे के दागे जानी वाली मिसाइल बनाया जाता है, तो फिर इसकी रेंज स्टिंगर मिसाइल जितनी ही हो जाएगी।
DRDO सिर्फ छोटे रॉकेट मोटर्स का उपयोग करके स्टिंगर जैसे डायमेंशन और वजन वाले मिसाइल का निर्माण करे में सक्षम नहीं है। इसे मिसाइल एयरफ्रेम के लिए हल्के वजन वाली सामग्री और इलेक्ट्रॉनिक्स का उपयोग करने की भी जरूरत होगी। लेकिन, कंधे से दागे जाने वाले MANPAD के साथ भी DRDO जो कारनामा कर दिया है, वो रोमांचक है, क्योंकि ये काफी मुश्किल काम है और इसमें काफी टेक्नोलॉजिकल मुश्किलें आती हैं।












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