INS Vikrant: आईएनएस विक्रांत ने हासिल की फुल ऑपरेशनल पावर, 'एलिट क्लब' में भारत, चीन से भिड़ने को तैयार हम...
INS Vikrant: इस हफ्ते भारतीय नौसेना ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल कर ली है, क्योंकि भारत के पहले स्वदेश निर्मित विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत ने "पूरी तरह से ऑपरेशनल स्टेटस" हासिल कर लिया है। आईएनएस विक्रांत के ऑपरेशनल स्टेटल हासिल करने के साथ ही भारत, उन देशों के इलीट क्लब में शामिल हो गया है, जिनके पास एयरक्राफ्ट कैरियर बनाने और पूरी क्षमता के साथ नेवी में उन्हें सौपने की शक्ति है।
इससे पहले, भारतीय नौसेना के पास केवल एक ऑपरेशनल एयरक्राफ्ट कैरियरनआईएनएस विक्रमादित्य था, जिसे रूस से खरीदा गया था।

यूरेशियन टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड में निर्मित स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत ने दिवाली पर "पूरी तरह से ऑपरेशनल स्थिति" हासिल कर ली है। एक सूत्र ने नाम न छापने की शर्त पर बताया है, कि विमानवाहक पोत अब तैनाती के लिए तैयार है।
इंडियन नेवी ने यह शक्ति ऐसे समय में हासिल की है, जब चीन हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी समुद्री ताकत का दावा कर रहा है और पाकिस्तान के साथ समुद्री अभ्यास कर रहा है।
भारतीय डिफेंस का दुनिया ने माना लोहा
कमोडोर अनिल जय सिंह (सेवानिवृत्त) ने बताया, कि "अब हमारे पास पूरी तरह से दो कैरियर बैटल ग्रुप हैं, जो हमारी ऑपरेशनल क्षमता, हमारे हित के क्षेत्रों में शक्ति प्रोजेक्ट करने की हमारी क्षमता को बढ़ाते हैं और हिंद महासागर क्षेत्र में हमारी प्रमुख समुद्री उपस्थिति को मजबूत करते हैं।"
उन्होंने कहा कि "चीन इस पर ध्यान देगा, क्योंकि वह जानता है, कि वह अभी भी हिंद महासागर में भारत को चुनौती देने से काफी दूर है और इसलिए इन जलक्षेत्रों में फिलहाल चीन की तरफ से कुछ भी उत्तेजक करने की संभावना नहीं है।"

कितना शक्तिशाली है आईएनएस विक्रांत?
आईएनएस विक्रांत की अहमियत भारत के लिए लिहाज से इतना खास इसलिए है, क्योंकि भारत ने इस युद्धपोत को अपने घर में ही तैयार किया है और अमेरिका, चीन, फ्रांस, रूस और ब्रिटेन के बाद अब सिर्फ भारत ही एकमात्र देश है, जिसके पास युद्धपोत बनाने की क्षमता है।
इस एयरक्राफ्ट कैरियर को पूरी तरह से भारत में ही डिजाइन और निर्माण किया गया है और ये एक विशालकाय युद्धपोत है, जिसकी युद्ध लड़ने की क्षमता अब काफी ज्यादा हो गई है।
आईएनएस विक्रांत की लंबाई की बात करें, तो इसकी लंबाई 262 मीटर है और इसकी चौड़ाई 60 मीटर है, जबकि इसका वजन, 45 हजार टन के करीब है। आईएनएस विक्रांत के निर्माण में चार एफिल टावर के बराबर उन्नत किस्म के लोहे का इस्तेमाल किया गया है और इस युद्धपोत में 2400 किलो केबल का इस्तेमाल किया गया है।
आईएनएस विक्रांत में 1700 क्रू मेंबर्स सवार हो सकते हैं और इसमें 2300 कंपार्टमेंट्स हैं, जबकि इसकी उच्च क्षमता 28 नॉट है, वहीं इसकी क्रूजिंग स्पीड 18 नॉट है। इसकी सबसे बड़ी खासियत ये है, कि ये एक बार में 7500 किलोमीटर की दूरी बिना रूके तय कर सकता है। आईएनएस विक्रांत का निर्माण आज से करीब 13 साल पहले शुरू हुआ था, जब भारत में कांग्रेस की सरकार थी।

क्यों जरूरी है एयरक्राफ्ट कैरियर का होना?
एक एयरक्राफ्ट कैरियर किसी भी राष्ट्र के लिए सबसे शक्तिशाली समुद्री संपत्तियों में से एक है, जो हवाई वर्चस्व संचालन करने के लिए अपने घरेलू तटों से दूर यात्रा करने के साथ साथ नौसेना की क्षमता को बढ़ाता है।
कई विशेषज्ञ एक विमानवाहक पोत को "नीले पानी" वाली नौसेना के लिए अत्यंत आवश्यक मानते हैं, यानी, एक ऐसी नौसेना जो समुद्र की अनंत गहराइयों में भी एक राष्ट्र की ताकत और शक्ति को प्रोजेक्ट करने की क्षमता रखती है।
एक एयरक्राफ्ट कैरियर आम तौर पर अपने लाव लश्कर के साथ गुजरता है, जिसमें कैरियर स्ट्राइक और बैटल ग्रुप शामिल होते हैं और चूंकी एयरक्राफ्ट कैरियर काफी ज्यादा महंगी होती है और कभी कभी लक्ष्य कमजोर होता है, लिहाजा इसे आमतौर पर डिस्ट्रॉयर, मिसाइल क्रूजर, फ्रिगेट, पनडुब्बी और सप्लाई जहाजों के समूह के साथ ले जाया जाता है।
भारत के लिए कितनी बड़ी उपलब्धि?
दुनिया में सिर्फ पांच ही ऐसे देश हैं, जिनके पास विमानवाहक पोत के निर्माण की क्षमता है और भारत भी अब इस प्रतिष्ठित क्लब में शामिल हो गया है।
विशेषज्ञों और नौसेना के अधिकारियों ने कहा कि, भारत ने दुनिया के सबसे उन्नत और जटिल युद्धपोतों में से एक माने जाने वाले निर्माण टेक्नोलॉजी की क्षमता हासिल करने के साथ ही आत्मनिर्भरता का प्रदर्शन किया है।
हालांकि, भारत के पास पहले भी एयरक्राफ्ट कैरियर थे, लेकिन उनका निर्माण या तो ब्रिटेन ने या फिर रूस ने किया था। भारत के पास मौजूदा एयरक्राफ्ट कैरियर 'आईएनएस विक्रमादित्य', जिसे 2013 में कमीशन किया गया था और जो वर्तमान में नौसेना का एकमात्र विमानवाहक पोत है, उसे तत्कालीन सोवियत संघ ने बनाया था,और उसका शुरूआती नाम 'एडमिरल गोर्शकोव' हुआ करता था।
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