FH-77B howitzer, T-72 tanks, इंडियन आर्मी के वो हथियार, जिन्होंने कारगिल को PAK सैनिकों की खून से रंग दिया
Kargil Vijay Diwas Indiam Weapons: पाकिस्तानी सैनिकों ने जब जनरल परवेज मुशर्रफ के आदेश के बाद भारतीय जमीन पर पैर रखने का दुस्साहस किया था, उस वक्त उन्हें पता नहीं था, कि भारत के तरकश में ऐसे ऐसे हथियार हैं, जो उनपर मौत बनकर बरसेगी और कारगिल की चोटियों को उनके खून से रंग देगी।
1999 का कारगिल युद्ध भारत के सैन्य इतिहास के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण था, जहां भारत ने हजारों फीट चोटियों पर अपनी युद्ध क्षमता, अपने हथियारों की धार और अपने रणनीतिक कौशल से पाकिस्तान को सन्न कर दिया था।

पाकिस्तानियों को बचपन से ही बताया जाता है, कि भारत में लड़ने की शक्ति नहीं है, भारतीय कभी भी पाकिस्तानी से मुकाबाल नहीं कर सकते और पाकिस्तान के सैनिक भी इसी सपने में वर्षों से जीते आए थे, लेकिन जब कारगिल की चोटियों पर भारतीय हथियारों ने मौत बरसाना शुरू किया, तो डरपोक पाकिस्तानी, अपने ही सैनिकों के शवों को चोटियों पर लावारिश छोड़कर भागने लगे।
मई 1999 में, भारतीय सेना को पहली बार पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ के बारे में पता चला और उसके बाद 26 मई को कब्जे वाले क्षेत्रों से पाकिस्तानियों को भगाने के लिए 'ऑपरेशन विजय' शुरू किया गया। इस संघर्ष ने भारत की सामरिक क्षमता और सैन्य शक्ति को पूरी दुनिया के सामने ला दिया और पूरी दुनिया ने पहली बार देखा, कि भारत सिर्फ शांति की बात ही नहीं करता, बल्कि पीठ पर चाकू भोंगने वालों को शिवाजी की तरह चीर भी देता है।
भारतीय तोपों ने पाकिस्तानियों को किया बेबस
कारगिल युद्ध में भारत की कामयाबी का एक प्रमुख हथियार, तोपखाने का खतरनाक इस्तेमाल था। बोफोर्स FH-77B हॉवित्जर, एक 155 मिमी तोपखाना तोपों ने जब अपनी आग पाकिस्तानी सैनिकों पर बरसानी शुरू की, तो उन्हें भागने का रास्ता नहीं दिख रहा था।
यह तोप दुश्मन के बंकरों को कमजोर करने और उनकी आपूर्ति लाइनों को काटने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जिससे यह कारगिल युद्ध के सबसे बेहतरीन हथियारों में से एक बन गई। तोपों की बौछार इतनी विनाशकारी थी, कि भारतीय सेना ने 5 जुलाई को टाइगर हिल और प्वाइंट 4875 और 7 जुलाई 1999 को मश्कोह घाटी पर कब्जा कर लिया।
द्रास और मश्कोह उप-क्षेत्रों में तोपखाने के उत्कृष्ट प्रदर्शन को सलामी देने के लिए भारतीय सेना ने प्वाइंट 4875 का नाम बदलकर "गन हिल" रख दिया।
भारतीय सेना ने रणनीतिक क्षेत्रों में दुश्मनों को खदेड़ने के लिए और उनके ठिकानों पर आग बरसाने के लिए BM-21 ग्रैड मल्टीपल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम का इस्तेमाल किया।
130 मिमी कैलिबर वाली एम-46 फील्ड गन का इस्तेमाल लंबी दूरी की बैराज के लिए किया गया, जिससे दुश्मन की रेखाओं और किलेबंदी को प्रभावी ढंग से निशाना बनाया गया। इसके अलावा, L16 81 मिमी और 120 मिमी जैसे मोर्टार का इस्तेमाल इनडायरेक्ट फायर सपोर्ट के लिए किया गया, जो पैदल सेना इकाइयों को पहाड़ी इलाकों में महत्वपूर्ण बैकअप प्रदान करते थे, जहां ऊंचाई पर मौजूद पाकिस्तानी सैनिकों के साथ आमने-सामने की लड़ाई के लिए काफी मुश्किल स्थिति बनाते थे।

पैदल सेना के विनाशक हथियारों को जानिए
भारतीय पैदल सेना की इकाइयां कई तरह के छोटे हथियारों से लैस थीं, जो कारगिल के चुनौतीपूर्ण इलाके में नजदीकी लड़ाई के लिए काफी जरूरी साबित हुए।
5.56×45 मिमी चैम्बर वाली इंसास राइफल, सैनिकों के लिए मानक असॉल्ट राइफल के रूप में काम करती थी। इसने रेंज और सटीकता का एक भारतीय सेना के लिए विश्वसनीय संतुलन प्रदान किया। AK-47 का आधुनिक वेरिएंट AKM ने भी पाकिस्तानी सैनिकों के खिलाफ युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिक निभाई।
इसके अलावा, 7.62×51 मिमी नाटो में चैम्बर वाली 1A1 सेल्फ-लोडिंग राइफल (SLR) को इसकी शक्तिशाली फायरिंग क्षमता के लिए इस्तेमाल किया गया था, हालांकि उस समय इसे नये मॉडल के साथ बदलने की प्रक्रिया चल रही थी।
पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर ने कारगिल युद्ध के दौरान दुश्मन की पैदल सेना को भारी नुकसान पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) ने इसे विकसित किया था और ट्रकों पर इसे लगाया जा सकता था। प्रत्येक यूनिट में 12 रॉकेट शामिल हैं, जो 44 सेकंड के भीतर फायर करने में सक्षम हैं। मार्क-1 और मार्क-2 वेरिएंट की रेंज 40 किलोमीटर है, जबकि मार्क-3 इस रेंज को 65 किलोमीटर तक बढ़ाया जा सकता है।

टैंक रोधी उपायों और बंकरों को ध्वस्त करने की जरूरत को देखते हुए भारतीय सेना ने कार्ल गुस्ताफ रिकॉइललेस राइफल का इस्तेमाल किया, जो बख्तरबंद वाहनों और किलेबंद ठिकानों के खिलाफ अपनी प्रभावशीलता के लिए जानी जाती है। इग्ला और स्ट्रेला-2 जैसी पोर्टेबल एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइलों को भी किसी भी संभावित हवाई खतरे का मुकाबला करने के लिए तैनात किया गया था, जो कम उड़ान वाले दुश्मन के विमानों के खिलाफ रक्षात्मक क्षमता प्रदान करती हैं।
भारत की जीत में तोपखानों की भूमिका काभी अहम रही थी। जिसमें बोफोर्स एफएच-77बी हॉवित्जर ने दुश्मन के बंकरों को ध्वस्त करने में अहम भूमिका निभाई। भारतीय सेना ने लंबी दूरी के हमलों के लिए बीएम-21 ग्रैड मल्टीपल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम और एम-46 फील्ड गन का भी इस्तेमाल किया। पैदल सेना की इकाइयों को नजदीकी लड़ाई के लिए इंसास राइफलों और एकेएम से लैस किया गया था, जबकि पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर और कार्ल गुस्ताफ रिकॉइललेस राइफल को एंटी-टैंक ऑपरेशन और बंकर विनाश के लिए इस्तेमाल किया गया था।
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