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सोने के व्यापारी फिरोज मर्चेंट कौन हैं, UAE की जेल में बंद 900 भारतीयों को बचाया, पूरी दुनिया में हो रही तारीफ

संयुक्त अरब अमीरात में लाखों की संख्या में भारतीय रहते हैं। यहां की जेलों में भी कई भारतीय कैद हैं। ये कैदी कथित जासूसी, अवैध आव्रजन और अन्य कारणों से वर्षों से जेलों में बंद हैं। एक भारतीय व्यवसायी ने यूएई की जेलों में बंद कैदियों को छुड़ाने का बीड़ा उठाया है।

फिरोज मर्चेंट नाम के चर्चित व्यवसायी ने रमजान के पवित्र महीने से पहले 900 लोगों को कैद से छुड़ाने के लिए 2.25 करोड़ रुपये का दान दिया है। इन कैदियों में अजमान से 495, फ़ुजैरा से 170, दुबई से 121, उम्म अल क्वैन से 69 और रास अल खैमा से 28 कैदी शामिल हैं।

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भारतीय मूल के फिरोज मर्चेंट जो दुबई में एक बड़े बिजनेसमैन हैं। फिरोज मर्चेंट कल्याणकारी कामों और लोगों की मदद करने के लिए जाने जाते हैं। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने कैदियों की रिहाई के लिए इतनी बड़ी रकम दान की है। इससे पहले भी वो सैकड़ों कैदियों को आजाद करवा चुके हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक फिरोज मर्चेंट ने 20 हजार से भी अधिक कैदियों की रिहाई कराई है। इसके लिए उन्होने अभी तक 56 करोड़ से अधिक दाने दे चुके हैं। 66 साल के फिरोज मर्चेंट 'प्योर गोल्ड ज्वैलर्स' के मालिक हैं। प्योर गोल्ड ज्वैलर्स का पूरे मिडिल ईस्ट में 120 से अधिक स्टोर हैं।

फिरोज अपने परोपकारी व्यवहार की वजह से खाड़ी देशों में लोकप्रिय हैं। वो खाड़ी देशों की जेल में कैद शख्स का न सिर्फ कर्ज चुकाते हैं और उनके स्वदेश वापस जाने के लिए उनके हवाई टिकटों की भी व्यवस्था करते हैं।

फिरोज इन कैदियों की रिहाई 2008 में स्थापित द फॉरगॉटन सोसाइटी पहल के तहत कराते हैं। फिरोज का लक्ष्य इस वर्ष 3000 से अधिक कैदियों को रिहा कराना है।

फिरोज मर्चेंट आज भले ही अरबपति हैं मगर एक वक्त था जब उनका परिवार बेहद मुफलिसी में जिंदगी गुजारता था। मर्चेंट का परिवार मुंबई के भिंडी बाजार में इमामवाड़ा बस्ती में रहा करता था।

फिरोज मर्चेंट के पिता गुलाम हुसैन एक रियल एस्टेट ब्रोकर थे। वहीं, उनकी मां मालेकबाई हाउसवाइफ थीं। 11 सदस्यों वाले परिवार में फिरोज के पिता गुलाम हुसैन ही एकमात्र कमाने वाले थे।

जब वह दूसरी कक्षा में थे तो ट्यूशन फीस नहीं भरने के कारण उन्हें स्कूल तक छोड़ना पड़ा। हालांकि वो पढ़ने में बेहद होशियार थे। किसी तरह पढ़ाई पूरी करने के बाद वे रोजगार में लग गए। 1980 में शादी के बाद वे अपना हनीमून मनाने दुबई गए। यहां गोल्ड व्यवसाय से वे काफी प्रभावित हुए। कुछ सालों के बाद वे व्यापार करने दुबई आ गए जिसके बाद उनकी किस्मत ही बदल गई।

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