सऊदी अरब के शुरू हो गये बुरे दिन? भारत को 'ब्लैकमेल' करने वाले देश की अर्थव्यवस्था कैसे खतरे में आई

तेल उत्पादक देशों ने हमेशा से दुनिया को अपनी शर्तों पर झुकने के लिए मजबूर किया और उन्होंने तेल को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है, लेकिन अब वक्त बदल रहा है।

India-Saudi Arab

India-Saudi Arab: कोविड संकट के बाद जब भारतीय बाजार फिर से खुलने लगे थे, उस वक्त सऊदी अरब ने तेल की कीमतों को बढ़ाने के लिए तेल के प्रोडक्शन में कमी करनी शुरू कर दी, जिससे दुनियाभर में तेल की कीमतों में इजाफा होना शुरू हो गया।

भारत, जो इराक के बाद सबसे ज्यादा कच्चा तेल सऊदी अरब से खरीदता था, उसने कई बार सऊदी अरब सरकार से तेल प्रोडक्शन बढ़ाने की अपील की, लेकिन सऊदी सरकार ने बार बार भारत की अपील को खारिज किया।

भारत, सऊदी अरब का तीसरा सबसे बड़ा ग्राहक था, लेकिन सऊदी अरब ने भारत की दिक्कतों पर ध्यान देने के बजाए अपनी बदमाशी जारी रखी, जिसका नतीजा ये हुआ, कि अप्रैल 2021 के शुरूआती महीनों में भारत में तेल की कीमत में बेतहाशा वृद्धि हुई।

भारत के पेट्रोलियम मंत्री ने सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्री से भी मुलाकात की थी, लेकिन सऊदी के ऊर्जा मंत्री ने भारत की अपील को सिरे से खारिज कर दिया। ये पूरा वाकया मार्च-अप्रैल 2021 में हुआ था।

सऊदी अरब की मनमर्जी भारत को काफी भारी पड़ी, लेकिन भारत उस वक्त कुछ नहीं कर सकता था, सिवाय इसके, कि मौके का इंतजार करे और ठीक एक साल बाद ही भारत को मौका मिल गया, जब फरवरी 2022 में यूक्रेन पर आक्रमण करने के बाद रूस ने भारत को डिस्काउंट पर तेल बेचने का ऑफर दिया।

भारत को यही मौका चाहिए था और भारत ने रूस से तेल खरीदना शुरू किया और एक साल के बाद भारत अपनी जरूरतों का 42 प्रतिशत कच्चा तेल रूस से खरीदता है, जो फरवरी 2022 में सिर्फ एक प्रतिशत खरीदता था।

सऊदी अरब पर मोदी सरकार का पलटवार

भारत ने रूस से भारी मात्रा में तेल खरीदना शुरू कर दिया और ये सऊदी अरब के लिए परेशान करने वाला था। पिछले साल जून में भारत ने सऊदी अरब से ज्यादा तेल रूस से खरीदना शुरू कर दिया, क्योंकि रूसी तेल भारत को सस्ता पड़ रहा था।

भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत कच्चा तेल दूसरे देशों से खरीदता है, जिसमें अभी तक सऊदी अरब बड़ी भूमिका निभा रहा था, लेकिन सऊदी अरब की मोनोपोली से भारत हमेशा से परेशान रहा है। तेल प्रोडक्शन बढ़ाने की मांग लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी पिछले साल अमेरिका का दौरा किया था, लेकिन फिर भी सऊदी अरब ने तेल का प्रोडक्शन नहीं बढ़ाया, ताकि डिमांड ज्यादा हो और तेल की कीमत बढ़े।

लेकिन, अब हालात बदल गये हैं। सऊदी अरब से तेल खरीदने वाले दो सबसे बड़े देश, चीन और भारत अब अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा रूस से खरीद रहे हैं, जिसका सीधा असर सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।

लिहाजा, तेल की कीमत आसमान छुए, इसके लिए सऊदी अरब के नेतृत्व वाले ओपेक देशों ने फिर से तेल का प्रोडक्शन कम करने की घोषणा की है और जुलाई महीने से हर दिन एक मिलियन बैरल कम तेल का उत्पादन किया जाएगा।

कुछ बाजार विश्लेषकों का अनुमान है, कि सऊदी अरब "सदमे और खौफ" में आकर तेल प्रोडक्शन में कमी कर रहा है, जिससे तेल बाजार में मजबूती लाया जाए और कीमतों में बढ़ोतरी हो। लेकिन, सऊदी अरब का तेल कटौती कर दाम बढ़ाने का फैसला फेल हो रहा है, क्योंकि रूस निर्बाध तरीके से तेल की सप्लाई कर रहा है और दक्षिण एशिया में चीन और भारत के बाद अब पाकिस्तान और बांग्लादेश भी रूस से तेल खरीद रहे हैं।

कुछ लोग इसे "शॉक एंड अवे" कट कह रहे हैं, जिसका उद्देश्य नाटकीय रूप से तेल बाजार को मजबूत करना और कीमत को रॉकेट की रफ्तार से आगे बढ़ाना है। लेकिन, ये कोशिश नाकाम साबित हो रही है।

सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था पर गंभीर खतरा

सऊदी अरब, दुनिया के ऊर्जा भंडार का लगभग 15% कमांड करता है, और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है। सऊदी उत्पादन स्तर में बदलाव से कच्चे तेल की कीमतों में भारी बदलाव हो सकता था, लेकिन रूस, जो बेतहाशा तेल सप्लाई कर रहा है, उसने सऊदी को कोशिशों पर पानी फेर दिया है।

सऊदी अरब और ओपेक के सदस्य इस बाजार के प्रभुत्व का उपयोग उत्पादन में हेरफेर करने और तेल की कीमतों पर एक हद तक नियंत्रण बनाए रखने के लिए करते हैं।

लेकिन, वैश्विक मंदी की आशंकाओं और बाजार के फिर से खुलने के बाद भी, तेल की मांग गिरावट ही रही है, क्योंकि चीन की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं हो पाई है।

मार्च 2022 में तेल की कीमतें 14 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंचने के बाद से सऊदी अरब ने कच्चे तेल के उत्पादन में तीसरी बार कटौती की है, ताकि तेल की कीमत को और ऊपर ले जाया जाए और पैसा कमाया जाए, लेकिन सऊदी नाकाम रहा है।

सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुलअजीज ने दलील दी थी, कि सऊदी अरब तेल बाजार को स्थिरता प्रदान करने के लिए प्रोडक्शन में कमी कर रहा है, लेकिन उनकी दलील इसलिए खोखली थी, क्योंकि रूस से तेल खरीदना बंद करने यूरोपीय देश सऊदी से ही तेल खरीदने वाले थे, लेकिन सऊदी तेल प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए तैयार नहीं था। सऊदी अरब की लाख कोशिशों के बाद भी कच्चे तेल की कीमत पिछले साल अक्टूबर के बास से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास ही मंडरा रहा है।

क्यों फंस गया है सऊदी अरब?

वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक, सऊदी अरब को अपने बजट को संतुलित करने के लिए तेल की कीमत 81 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर ले जाने की आवश्यकता है। लेकिन, कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बढ़ने का नाम नहीं ले रही है।

दूसरी तरफ सऊदी अरब ने कई प्रोजेक्ट्स में अरबों डॉलर का निवेश किया है, ताकि भविष्य के शहरों का निर्माण किया जा सके और इसके लिए उसे तेल पर ही निर्भर होना है। सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था तेल पर ही निर्भर है और अभी तक सऊदी अरब के पास व्यापार के अन्य साधन विकसित नहीं हुए हैं।

पिछले हफ्ते OPEC की बैठक के दौरान सऊदी अरब ने ओपेक देशों के सामने तेल उत्पादन कम करने का प्रस्ताव रखा, लेकिन ओपेक देश इसके लिए राजी नहीं हुए। खासकर संयुक्त अरब अमीरात को तेल प्रोडक्शन में कटौती को लेकर गहरा एतराज था।

लिहाजा, सऊदी अरब ने खुद अपने ही तेल उत्पादन में 10 प्रतिशत तक कटौती करने का फैसला किया है।

ब्लूमबर्ग के डेविड फिकलिंग के अनुसार, सऊदी अरब को तेल उत्पादन में कटौती करके तेल कीमतों को 14 प्रतिशत बढ़ाने की जरूरत है, लिहाजा सऊदी अरब की तेल कंपनी अरामको ने उत्पादन में 10 प्रतिशत तक की कटौती करने का फैसला लिया है।

इन महत्वपूर्ण उत्पादन कटौती के फल देने के लिए तेल की कीमतों को लगभग 14% अधिक करने की आवश्यकता है। नतीजतन, सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी अरामको उत्पादन में कटौती के बाद अमेरिका, यूरोप और एशिया के लिए अपने तेल की बिक्री की कीमतें बढ़ा रही है।

लेकिन, दूसरी तरफ रूस अपनी अर्थव्यवस्था को बिखड़ने से बचाने के लिए लगातार तेल का प्रोडक्शन बढा रहा है, जिसकी वजह से वैश्विक तेल बाजार में कीमतें 70 डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा जा ही नहीं पा रही हैं। रूस का कच्चा तेल फिलहाल 60 डॉलर प्रति बैरल से भी कम कीमत पर बिकता है, जिससे तेल की कीमतों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है।

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