भारत-पाकिस्तान सिंधु घाटी जल आयोग की आज अहम बैठक, जानिए क्यों भारत रोकना चाहता था पानी?
करीब ढाई साल के लंबे इंतजार के बाद आज भारत और पाकिस्तान के बीच फिर से सिंधु घाटी जल आयोग की बैठक होने वाली है। पाकिस्तान के आठ अधिकारी भारत पहुंच चुके हैं और दो दिनों तक दोनों देशों के बीच बात होगी।
नई दिल्ली: करीब ढाई साल के लंबे इंतजार के बाद आज भारत और पाकिस्तान के बीच फिर से सिंधु घाटी जल आयोग की बैठक होने वाली है। पाकिस्तान के आठ अधिकारी भारत पहुंच चुके हैं और दो दिनों तक दोनों देशों के अधिकारी सिंधु घाटी जल बंटवारे पर बात करेंगे। भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव तनावपूर्ण रहते हैं, लेकिन इस बार इस बैठक से पहले दोनों देशों के बीच सीजफायर समझौता हो चुका है और तनाव में काफी कमी जरूर आई है। लिहाजा, माना जा रहा है कि एक अच्छे माहौल में सिंधु घाटी जल को लेकर बातचीत होगी। लेकिन, याद करिए जब पाकिस्तानी आतंकियों ने पुलवामा में भारतीय सैनिकों पर आतंकी हमला किया था, उस वक्त पाकिस्तान पाकिस्तान का पानी रोकने की काफी मांग की जा रही थी। भारत में आवाज उठ रही थी कि आखिर भारत अपने हिस्से का पानी पाकिस्तान को क्यों दे रहा है? ऐसे में आईये जानते हैं कि आखिर सिंधु घाटी समझौता क्या है और क्या भारत वास्तव में इस स्थिति में है कि पाकिस्तान को पानी ना दे?

सिंधु आयोग की स्थापना
भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 की जल संधि के तहत सिंधु आयोग की स्थापना की गई थी। जिसकी बैठक नई दिल्ली में आज और कल होगी। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के विदेश सचिव रहे कंवल सिब्बन ने पाकिस्तान को पानी देने से मना करते हुए समझौता तोड़ने के लिए कहा था। लेकिन, जानकारों की माने तो दोनों में से कोई एक देश इस समझौते को एकतरफा नहीं तोड़ सकता है। दोनों देश मिलकर या तो इस समझौते में बदलाव कर सकते हैं या फिर इसे बदल सकते हैं, लेकिन इसे तोड़ नहीं सकते हैं। अब सवाल ये उठता है कि आखिर इस समझौते को तोड़ा क्यों नहीं जा सकता है? तो यहां आता है वर्ल्ड बैंक की भूमिका।

वर्ल्ड बैंक की भूमिका
भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में सिंधु घाटी जल समझौता हुआ था, जिसे सिंधु जल संधि भी कहते हैं। दोनों देशों के बीच इस समझौते को अंजाम तक पहुंचाने में वर्ल्ड बैंक ने बड़ी भूमिका निभाई थी। वर्ल्ड बैंक की पहल पर दोनों दशों के बीच करीब 9 सालं तक बातचीत चली थी और फिर 19 सितंबर 1960 को कराची में सिंधु नदी घाटी समझौते पर दोनों देशों ने हस्ताक्षर किया था। इस समझौते के तहत दोनों देशों के बीच 6 नदियों के पानी के बंटवारे पर फैसला लिया गया था।

सिंधु जल समझौते में क्या है?
सिंधु जल समझौते पर 1960 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे। समझौते के मुताबिक पूर्वी हिस्से की तीनों नदियों रावी, ब्यास और सतलज पर भारत का अधिकार है। इसके बदले भारत पश्चिमी हिस्से के तीनों नदियों सिंधु, चेनाब और झेलम के जल को बेरोक-टोक पाकिस्तान में बहने देगा। समझौते के मुताबिक भारत पश्चिमी हिस्से की नदियों के जल का भी इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन इस तरह से कि पाकिस्तान को उससे कोई नुकसान न हो। भारत उन नदियों के पानी का घरेलू इस्तेमाल और सिंचाई और बिजली पैदा करने के लिए भी कर सकता है, बशर्ते वह समझौते के मुताबिक हो।

इस बार पाकिस्तान क्या मुददे उठाएगा?
भारत और पाकिस्तान के अधिकारियों के बीच आज और कल दो दिनों तक सिंधु घाटी जल समझौते पर बातचीत होगी। जिसमें पाकिस्तान दो अहम मुद्दों को भारत के सामने उठा सकता है। पाकिस्तानी मीडिया के मुताबिक इस बातचीत में पाकिस्तान पकाल डल और लोअर कलनई हाइड्रोपावर संयंत्रों को लेकर आपत्ति दर्ज करा सकता है। पाकिस्तान को इन हाइड्रोपावर संयंत्रों के डिजाइन पर आपत्ति है। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता जाहिद चौधरी ने पाकिस्तान की आपत्तियों का जिक्र भी किया था। दरअसल, भारत सरकार की तरफ से लद्दाख में कई पावर प्रोजेक्ट शुरू किए गये हैं और सिंधु समझौते के तहत भारत सरकार ने पाकिस्तान को सारे प्रोजेक्ट्स को लेकर जानकारियां भी दी हैं। हालांकि, अब पाकिस्तानी अधिकारी भारत के सामने इन प्रोजेक्ट्स को लेकर अपनी बात रख सकते हैं।
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