भारतीय बंदरगाहों पर क्यों नहीं ठहरते विशालकाय जहाज? जानिए दुनिया का सबसे बड़ा शिपिंग हब बनने की क्या है तैयारी
Maritime shipping hub: अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में आपके ताकत के विस्तार के लिए आपके पास समुद्री परिवहन की ताकत होनी चाहिए, तभी आप वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख आधार बन सकते हैं, लेकिन अभी तक भारत विशालकाय व्यापारिक जहाजों को अपने बंदरगाहों पर लाने में नाकाम रहा है।
अंतर्राष्ट्रीय शिपिंग चैंबर के मुताबिक, इंटरनेशनल शिपिंग उद्योग, वैश्विक व्यापार के लगभग 90 प्रतिशत के ट्रांसपोर्टेशन के लिए जिम्मेदार है। इसलिए, यह अप्रत्याशित नहीं है, कि हवाई मार्ग जैसे परिवहन के अन्य वैकल्पिक और अग्रणी साधनों के काफी विस्तार के बावजूद, समुद्री परिवहन या शिपिंग का भारत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है।

अपनी स्ट्रैटजिक भौगोलिक स्थिति की वजह से, बंदरगाह भारतीय इतिहास का अभिन्न अंग रहे हैं।
आधुनिक समय में भी, ये बंदरगाह देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं, जो भारत के बाहरी व्यापार का 95 प्रतिशत मात्रा के हिसाब से और 70 प्रतिशत मूल्य के हिसाब से मैनेज करते हैं। वित्तीय वर्ष 2022 में, भारत के प्रमुख बंदरगाहों पर कार्गो यातायात बढ़कर 406.98 मिलियन मीट्रिक टन हो गया, जो 2021 की तुलना में लगभग 15 प्रतिशत ज्यादा था। इसलिए, यह भारत के राष्ट्रीय विकास में समुद्री क्षेत्र की बढ़ती भूमिका की ओर इशारा करता है।
लिहाजा, यह आश्चर्यजनक नहीं है, कि बंदरगाहों ने हाल के वर्षों में अपनी क्षमता में भारी इजाफा किया है। भारत खुद को एक मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात केंद्र के साथ-साथ ग्लोबल सप्लाई चेन में एक केन्द्र के रूप में स्थापित करने की महत्वाकांक्षा रखता है। लेकिन, इसके लिए भारत को विश्व मंच पर अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता और कनेक्टिविटी बढ़ानी होगी। लिहाजा भारत को अपने बंदरगाहों की क्षमता को बढ़ाना होगा और भारतीय बाजार में जहाजों की तैनाती बढ़ाना होगा।
भारत को बढ़ाना होगा बड़े जहाजों की संख्या
लिहाजा, भारत को भारत-केंद्रित व्यापार मार्गों पर समर्पित रूप से तैनात किए जाने वाले ज्यादा संख्या में बड़े जहाजों की जरूरत होगी। जो सुनिश्चित करेगा, कि नई दिल्ली ग्लोबल सप्लाई चेन में प्रभावी रूप से शामिल हो, और भारत काफी आसानी से इंटरनेशनल ट्रेड की सुविधा देने वाला देश हो।
और इसके लिए भारत को अपने बंदरगाहों को विशालकाय जहाजों के लिए उपयुक्त बनाना होगा और बंदरगाहों के इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास करना होगा।
हालांकि, हालिया समय में भारत ने इस दिशा में काफी काम किए हैं और महाराष्ट्र में बना वधावन बंदरगाह का काम पूरा के बाद 'भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC)' और विझिंजम बंदरगाह से जो अतिरिक्त मांग उत्पन्न होंगी, उसे पूरा कर सकता है।
विझिंजम बंदरगाह पर हाल ही में पहला मदरशिप, सैन फर्नांडो जहाज को उतारा गया था, जो यह दर्शाता है कि भारत अंतर्राष्ट्रीय समुद्री व्यापार के क्षेत्र में अपनी स्थिति को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहा है।
एक्सपर्ट्स विश्लेषकों को भरोसा है, कि भारत जल्द ही सिंगापुर, शंघाई, शेनझेन, बुसान और हांगकांग जैसे बड़े बंदरगाह वाले समूह में शामिल होने की क्षमता रखता है, जो दुनिया के सबसे बड़े ट्रांसशिपमेंट बंदरगाहों का गठन करते हैं।

विझिंजम बंदरगाह का काम जल्द होगा पूरा
अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी और एडवांस स्वचालन और आईटी सिस्टम से लैस विझिंजम, भारत का पहला अर्ध-स्वचालित बंदरगाह बनने की राह पर है। काम पूरा होने पर, यह बंदरगाह दुनिया के सबसे बड़े बंदरगाहों में शुमार हो जाएगा और भारत के प्रमुख ट्रांसशिपमेंट हब के रूप में काम करेगा।
यहां, छोटे जहाजों से बड़े मदर शिप में कार्गो को ट्रांसफर किया जाएगा, जिससे उनके लास्ट डेस्टिनेशन तक की यात्रा आसान हो जाएगी। यह बंदरगाह जहाजों के फौरन टर्नअराउंड के लिए बड़े पैमाने पर ऑटोमेशन भी प्रदान करेगा, जिसमें मेगामैक्स कंटेनरशिप को संभालने की क्षमता होगी।
इस बंदरगाह से दुनिया के कुछ सबसे बड़े कंटेनर जहाजों को आकर्षित करने की उम्मीद है। देश के सबसे दक्षिणी सिरे के पास अपने रणनीतिक स्थान को देखते हुए, बंदरगाह में महत्वपूर्ण वैश्विक शिपिंग मार्गों का लाभ उठाने की क्षमता है, जिससे भारत को अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार का एक बड़ा हिस्सा हासिल करने में मदद मिलेगी, जिस पर वर्तमान में चीन का दबदबा है। इस संबंध में, यह बंदरगाह चीन के खिलाफ एक वैकल्पिक विनिर्माण गंतव्य बनने की भारत की महत्वाकांक्षाओं को बढ़ावा देगा।
इसके अलावा, कम लॉजिस्टिक और शिपिंग लागत और ज्यादा कार्गो और कंटेनर क्षमता, भारत को प्रमुख शिपिंग लाइनों के लिए साइड पोर्ट ऑफ़ कॉल के बजाय मुख्य पोर्ट ऑफ़ कॉल के रूप में स्थापित करेगी।
यह मोदी सरकार के "मैरीटाइम इंडिया विज़न 2030" के साथ पूरी तरह से मेल खाता है, जो भारत के समुद्री क्षमता को बदलने के मकसद से एक रणनीतिक पहल है, जो विश्व स्तरीय मेगा पोर्ट विकसित करने, एडवांस ट्रांसशिपमेंट हब स्थापित करने और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण पर केंद्रित है।

जियो-पॉलिटिकल तनाव में कैसे होगा फायदा?
जबकि, भारत में ऐसे बंदरगाहों के संभावित लाभों के बारे में बहुत चर्चा की गई है, लेकिन एक पहलू को नजरअंदाज कर दिया गया है, वो है समुद्र में उत्पन्न होने वाले भू-राजनीतिक तनावों को झेलने और सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन (SLOCs) को कभी भी ब्लॉक करने की भारत की क्षमता।
जियो-पॉलिटिकल संघर्षों की बात करें, तो बंदरगाहों पर इसका काफी प्रभाव देखने को मिलता है। हाल के वर्षों में, भू-राजनीतिक तनाव काफी तेज और नियमित होते जा रहे हैं और वैश्विक शक्तियों में लगातार टकराव बढ़ता जा रहा है। आधुनिक शक्तिशाली देश जियो-पॉलिटिक्स और जियो-इकोनॉमिक्स को बदलने की कोशिश कर रहे हैं, जैसे यूक्रेन युद्ध के बाद यूक्रेनी बंदरगाह को ब्लॉक करना या फिर चीन की दक्षिण चीन सागर से गुजरने वाली जहाजों की निगरानी बढ़ना या फिर लाल सागर में शिपिंग जहाजों पर हूती विद्रोहियों के हमले।
इसी तरह की घटनाएं होर्मुज जलडमरूमध्य में भी देखी गईं, जो दुनिया के तेल का लगभग पांचवां हिस्सा ले जाने वाली एक महत्वपूर्ण धमनी है, जो पिछले कुछ वर्षों में कई भू-राजनीतिक तनावों का केंद्र रही है।
पिछले कुछ महीनों में, दो प्रमुख शिपिंग मार्गों पर संकट की वजह से वैश्विक व्यापार को काफी नुकसान पहुंचा है। लाल सागर में जहाजों पर हमलों ने स्वेज नहर के माध्यम से यातायात को कम कर दिया है, जो एशिया और यूरोप के बीच सबसे छोटा समुद्री संपर्क है, जो आम तौर पर वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग 15 प्रतिशत हिस्सा है। इस बीच, अटलांटिक के पार, पनामा नहर में एक गंभीर सूखे ने अधिकारियों को प्रतिबंध लगाने के लिए प्रेरित किया है, जिसने पिछले अक्टूबर से दैनिक जहाज क्रॉसिंग को काफी कम कर दिया है, जिससे इस महत्वपूर्ण चोकपॉइंट के माध्यम से समुद्री व्यापार में और बाधा आ रही है, जो आमतौर पर वैश्विक समुद्री यातायात का लगभग 5 प्रतिशत हिस्सा है।
जिससे समझा जा सकता है, कि शिपिंग मार्ग पर कंट्रोल कितना महत्वपूर्ण जियो-पॉलिटिकल फायदे दे सकती है।
वर्तमान विश्व जनसांख्यिकी भारत के अनुकूल है, जो इसे आवश्यक कुशल श्रम शक्ति का आधार प्रदान करती है और दुनिया को शिपिंग सेवाएं प्रदान करती है। अपनी विस्तृत तटरेखा और 200 से ज़्यादा बंदरगाहों के बावजूद, भारत का समुद्री उद्योग वैश्विक मंच पर अभी भी पीछे है। 2021 में, भारत ने वैश्विक कंटेनर ट्रैफिक का सिर्फ 2.4 प्रतिशत हिस्सा लिया, जो संयुक्त अरब अमीरात (2.3 प्रतिशत) के बराबर है, लेकिन सिंगापुर के 4.5 प्रतिशत से काफी कम है, जबकि भारत को पास समुद्री कारोबार को कंट्रोल करने की विशालकाय क्षमता है।
अब तक, बड़े कंटेनर जहाज कम गहराई के कारण भारतीय बंदरगाहों को नजरअंदाज कर देते थे, इसके बजाय कोलंबो, दुबई, सिंगापुर और मलेशिया जैसे पड़ोसी केंद्रों का विकल्प चुनते थे। लेकिन भारत के बंदरगाह क्षेत्र में हाल के विकास और शिपिंग कनेक्टिविटी बढ़ाने के कोशिशों के साथ, यह अनुमान लगाना गलत नहीं होगा, कि भारत जल्द ही ट्रांस-शिपमेंट के लिए दुनिया के प्रमुख केंद्रों की लिस्ट में शामिल हो सकता है।
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