बैक्टीरिया, वायरस की दवाओं से बढ़ा खतरा! हर साल हो रही 49 लाख मौतें, स्टडी में बड़ा दावा
वायरस और बैक्टीरिया के अलावा कवक के संक्रमण के चलते आए दिन नई बीमारियां सामने आ रही हैं। इन बीमारियों के इलाज के लिए एंटी-माइक्रोबियल दवाएं दी जाती हैं। जिसका शरीर की प्रतिरोधक क्षमता पर असर हो रहा है। एक अध्ययन के मुताबिक, शरीर में दवाओं के प्रभाव का असर खत्म करने के लिए बढ़ रही क्षमता नई बीमारियों को जन्म दे रही है। स्टडी में दावा किया गया है कि एएमआर (Anti-Microbial Resistance) के कारण सालाना 49 लाख से अधिक लोगों की मौत हो जाती है। जबकि अगर इलाज में सावधानी बरती जाए तो हर साल एंटी-माइक्रोबियल प्रतिरोध से जुड़ी 7.5 लाख मौतें कम जा सकती हैं।
साइंस जर्नल द लांसेट में ताजा शोध प्रकाशित किया गया है, जिसमें रोगाणुरोधी प्रतिरोध की घटना क्षमता को लेकर आगाह किया गया है। स्टडी में कहा गया कि इससे सबसे अधिक शिशु, बुजुर्ग और कमजोर लोग शामिल प्रभावित होते हैं। अध्ययन में कहा गया है कि वर्तमान में एएमआर के कारण सालाना 49 लाख से अधिक लोगों की मौत होती है।

प्रकाशित शोध के मुताबिक, अब तक उपलब्ध टीकों, दूषित पानी के चलते निम्न और मध्यम आय वाले देशों एंटी-माइक्रोबियल प्रतिरोध से जुड़ी समस्या अधिक है। अगर बेहतर तरीके से इसका इलाज किया जाए तो हर साल इस समस्या से होने वाली 49 लाख मौतों में से 7.5 लाख मौतें कम की जा सकती हैं।
स्टडी में 2018 से 2020 के बीच अफ्रीका, एशिया, यूरोप, ब्रिटेन और अमेरिका के 11 देशों को शामिल गया है, जहां सेप्सिस से पीड़ित 18 प्रतिशत बच्चों की एंटीबायोटिक्स दिए जाने के बावजूद मौत हो गई।
शोध के सह लेखक व वाशिंगटन में एक स्वतंत्र अनुसंधान संगठन, वन हेल्थ ट्रस्ट के संस्थापक रामानन लक्ष्मीनारायण ने एएमआर को लेकर बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा, " बैक्टीरिया इंफेक्शन के इलाज से हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो रही है। समस्या बहुत लंबे समय से है, जिसे अब हल की जरूरत है।"
क्या है AMR?
ताजा रिसर्च के मुताबिक, एएमआर दुनिया भर में नवजात शिशुओं के अस्तित्व के लिए एक बड़ा खतरा है। तेजी से शरीर में फैलने वाले बैक्टीरिया या कवक इन संक्रमणों का कारण बनते हैं, जो कि मौजूद एंटीबायोटिक दवाओं से नियंत्रित नहीं होते। वैश्विक स्तर पर नवजात शिशुओं की एक तिहाई मौतें संक्रमण के कारण होती हैं और उनमें से आधे सेप्सिस के कारण होती हैं। ये संक्रमण शिशु, बच्चे, बुजुर्ग और पुरानी बीमारी वाले लोगों सबसे अधिक चपेट में लेता है।
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