पेट्रोल किस देश में सबसे सस्ता और कहां लगी है कीमतों में आग

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यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद दुनिया के कई देशों में पेट्रोल-डीज़ल के दाम बढ़ गए हैं. लेकिन किसी देश में पेट्रोल-डीज़ल महंगा है या नहीं, ये वहां के लोगों की परचेज़िंग पावर पर निर्भर करता है.

मिसाल के तौर पर अगर स्विट्ज़रलैंड में पेट्रोल की कीमतें सरसरी तौर पर भले ही 'बहुत ज़्यादा' लग रही हों लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है.

दरअसल स्विट्ज़रलैंड में लोगों की संपत्ति का जो स्तर है उसकी तुलना में ये ज़्यादा महंगा नहीं है, जितना लग रहा है.

हॉन्गकॉन्ग में पेट्रोल की कीमतें सबसे ज़्यादा हैं. यहां प्रति लीटर पेट्रोल 2.98 डॉलर पर बिक रहा है.

एक गैलन पेट्रोल 11.28 डॉलर का है. लेकिन 'गैसोलीन अफोर्डेबिलिटी रैंकिंग' के मुताबिक यहां के लोगों के जीवनस्तर को देखते हुए पेट्रोल यहां सबसे महंगा नहीं है.

ये रैंकिंग 'ग्लोबल पेट्रोल प्राइसेज़' की ओर से तैयार की गई है. ये एक एनर्जी डेटा कलेक्शन और एनालिसिस प्रोजेक्ट है.

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पेट्रोल की कीमतें और लोगों की कमाई का स्तर

'ग्लोबल पेट्रोल प्राइसेज़' और ग्लोबल इकोनॉमी प्रोजेक्ट के डायरेक्टर नेवेन वालेव का कहना है, ''क़तर और कुवैत जैसे तेल निर्यात करने वाले देश सब्सिडी देकर पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें काफी कम करके रखते हैं. लेकिन अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसी विकसित अर्थव्यवस्था वाले देशों में पेट्रोल महंगा है लेकिन वहां लोगों की आय अधिक है.''

वह कहते हैं, ''लेकिन दूसरी ओर कई गरीब देश हैं. पेट्रोल वहां कोई खास महंगा नहीं है लेकिन वहां लोगों की आय का स्तर काफी कम है. ''

यही वजह है कि क़तर, कुवैत, लग्ज़मबर्ग, अमेरिकाऔर ऑस्ट्रेलिया में लोगों को पेट्रोल की कीमतें काफी सस्ती लगती हैं. दूसरी ओर मोज़ाम्बिक, मैडागास्कर, मलावी, सियेरा लियोन और रवांडा में पेट्रोल की कीमतें काफी ज़्यादा लगती हैं. यह अलग-अलग देशों में लोगों की आय के स्तर का असर है.

ऐसे वक्त में जब पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट है तो पेट्रोल की कीमतें कई देशों के लिए बड़ा सिरदर्द बन गई हैं. ज़्यादातर देशों को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में ऊंची कीमतों पर पेट्रोल खरीदना पड़ रहा है ताकि अपने नागरिकों को सस्ता तेल मुहैया किया जा सके.

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महंगे पेट्रोल से महंगाई की नई लहर

पेट्रोल, डीज़ल और गैस की कीमतों की वजह से अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में महंगाई की नई लहर पैदा कर दी है. इसने ग्लोबल अर्थव्यवस्था को हिला कर रख दिया है. लोगों का घरेलू बजट बिगड़ चुका है. ब्याज दरें बढ़ने और आर्थिक विकास दर घटने की वजह से उथल-पुथल का माहौल है.

वालेव ने बीबीसी मुंडो से कहा, ''यूक्रेन युद्ध की ओर से ईंधन की बढ़ती कीमतों में और आग लग गई है. कोविड के बाद ग्लोबल अर्थव्यवस्था में रिकवरी की वजह से भी तेल के दाम बढ़ रहे हैं.''

अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की कीमतों में इज़ाफे की वजह से आम उपभोक्ताओं को महंगा तेल खरीदना पड़ रहा है. लेकिन अलग-अलग देशों में हालात भी अलग-अलग है.

ये इस बात पर निर्भर करता है कि ये देश कच्चे तेल का आयात करते हैं या निर्यात. तेल की कीमतें इस बात पर भी निर्भर करती हैं कि किसके पास कितनी रिफाइनिंग क्षमता है. कुछ और चीज़ों पर भी कीमतें निर्भर करती हैं, जैसे सरकार की सब्सिडी का लेवल क्या है?

अगर विभिन्न देशों में लोगों की आय के स्तर के पहलू को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए तो वेनेज़ुएला, लीबिया, ईरान, अल्जीरिया और कुवैत में तेल के दाम सबसे कम हैं. जबकि हॉन्गकॉन्ग, आइसलैंड, ज़िम्बाब्वे, नॉर्वे और मध्य अफ्रीकी गणराज्यों में कीमतें सबसे अधिक हैं.

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आगे की तस्वीर

इस साल की शुरुआत में दुनिया में पेट्रोल की औसत कीमत 1.23 डॉलर प्रति लीटर थी. लेकिन धीरे-धीरे इसकी कीमतें बढ़ती गईं और जून तक ये शीर्ष पर पहुंच गईं. उस दौरान ये कीमतें बढ़कर 1.50 डॉलर प्रति लीटर हो गई थी.

हालांकि इस समय यह 1.31 डॉलर प्रति लीटर के स्तर पर पहुंच रही है. यह कीमत यूक्रेन युद्ध से पहले की है. कच्चे तेल की कीमतें भी युद्ध पूर्व के स्तर पर पहुंचती दिख रही हैं. लेकिन इसकी वजह है दुनिया भर में आर्थिक गतिविधियों में आ रही सुस्ती.

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