गोटाबाया राजपक्षे: 40 हजार तमिलों का किया सफाया, क्रूर सैन्य अधिकारी से राष्ट्रपति तक का सफर...
अपने बड़े भाई महिंदा राजपक्षे के विपरीत, जो राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के रूप में लगभग 20 वर्षों तक श्रीलंका की राजनीति पर हावी रहे, गोटाबाया राजपक्षे श्रीलंका की राजनीति में नहीं आना चाहते थे।
कोलंबो, जुलाई 10: सिर्फ एक साल पहले तक श्रीलंका में राजपक्षे परिवार सबसे ताकतवर परिवार माना जाता था और राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री समेत 7 मंत्री सिर्फ और सिर्फ राजपक्षे परिवार से थे। यानि, दादा से लेकर पोता तक... हर कोई सरकार में शामिल और श्रीलंका की किस्मत का फैसला सिर्फ और सिर्फ एक परिवार कर रहा था। राजनीतिक धमक इतनी थी, कि विपक्ष की आवाज दबी की दबी रह जाती थी और श्रीलंका की बहुसंख्यक बौद्ध आबादी के लिए राजपक्षे परिवार सर्वेसर्वा था। लेकिन, अब स्थिति बदल चुकी है। रोटी के लिए तरस रही श्रीलंकन जनता ने राजपक्षे राज को भस्म कर दिया है। परिवार के सभी सदस्य फरार हो चुके हैं। प्रधानमंत्री रहते हुए महिंदा राजपक्षे पहले भागे और राष्ट्रपति रहते हुए छोटे भाई गोतबया राजपक्षे अब भागे हैं, जब जनता जान लेने पर आमादा हो गई।
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तमिल मूवमेंट को निर्ममता से कुचला
श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे, जिन्होंने देश के लंबे समय से चल रहे गृहयुद्ध को समाप्त करने के लिए तमिल टाइगर्स की निर्मम कुचला था, उन्हें आखिरकार देश के राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा। गोटाबाया राजपक्षे इस्तीफा नहीं देने की जिद पर अड़े थे, लेकिन जनता भी उन्हें उखाड़ फेंकने की जिद पर अड़ी थी और आखिरकार जब जनता ने राष्ट्रपति भवन पर धावा बोला, तो राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे दुम दबाकर भाग खड़े हुए। हजारों प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति भवन में मौजूद थे और श्रीलंका की सड़कों पर 'गोटा गो' के नारे लग रहे थे। प्रदर्शनकारियों ने गोटाबाया राजपक्षे के कारों के काफिले का वीडियो जारी किया, जिससे पता चला, कि राजपक्षे परिवार के पास लग्जरी कारों का काफिला कैसा था। वहीं, श्रीलंका संसद के स्पीकर ने एक वीडियो बयान में कहा है, कि गोटाबाय राजपक्षे 13 जुलाई को अपने पद से इस्तीफा दे देंगे और इसके साथ ही आधिकारिक तौर पर राजपक्षे राज का अंत हो जाएगा। हालांकि, अभी तक राष्ट्रपति राजपक्षे की तरफ से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन प्रदर्शनकारियों में कितना गुस्सा है, इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं, कि प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे के घर में भी घुसकर आग लगा दी है, क्योंकि वो राजपक्षे परिवार के नजदीकी माने जाते हैं।

40 हजार तमिलों का किया नरसंहार!
अपने बड़े भाई महिंदा राजपक्षे के विपरीत, जो राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के रूप में लगभग 20 वर्षों तक श्रीलंका की राजनीति पर हावी रहे, गोटाबाया राजपक्षे श्रीलंका की राजनीति में नहीं आना चाहते थे। इसके बजाय, वह 21 साल की उम्र में सेना में शामिल हो गए थे और दो दशकों तक सेवा करने के बाद लेफ्टिनेंट कर्नल के पद तक पहुंचे। जल्दी सेवानिवृत्ति लेते हुए वह संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए, जहां उन्होंने सूचना प्रौद्योगिकी में काम किया। गोटाबाया राजपक्षे का राजनीति में प्रवेश तब हुआ, जब 2005 में उनके बड़े भाई महिंदा राजपक्षे श्रीलंका के राष्ट्रपति बने और उन्हें रक्षा सचिव के रूप में नियुक्त किया, उन्हें लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE) के खिलाफ युद्ध का प्रभारी बना दिया, देश के उत्तर में सक्रिय एक विद्रोही समूह जो एक स्वतंत्र राज्य के लिए लड़ रहा था। 26 साल के संघर्ष के बाद, तमिल टाइगर्स ने अंततः 2009 में एक क्रूर सरकारी हमले के बाद हार मान ली, जिसमें संयुक्त राष्ट्र ने अनुमान लगाया था, कि अकेले युद्ध के अंतिम कुछ महीनों में 40,000 तमिल नागरिक मारे गए थे। तमिल इसे सामूहिक नरसंहार कहते हैं और जिम्मेदारी राजपक्षे परिवार पर डालते हैं।

नहीं होने दी किसी तरह की जांच
तमिल मूवमेंट को बेरहमी से कुचल कर राजपक्षे परिवार श्रीलंका की बहुसंख्यक आबादी का हीरो बन चुका था और उसने तमिलों को मारने से अपनी सारी जिम्मेदारी से हाथ पोंछ लिया। जब कई देशों ने सवाल उठाए, तो श्रीलंका की सरकार की तरफ से कहा गया, कि विद्रोहियों ने हजारों नागरिकों को मानव ढाल के रूप बना रखा था, जिससे मरने वालों की संख्या बढ़ गई। जबकि गोटाबाया राजपक्षे को श्रीलंका के कई सिंहली बौद्ध बहुमत द्वारा युद्ध नायक के रूप में प्रोजेक्ट किया जाने लगा। जबकि, तमिलों के द्वारा लगातार गोटाबाया राजपक्षे को तमिलों की हत्याओं, यातनाओं और सरकारी आलोचकों के लापता होने सहित युद्ध अपराधों का आरोप लगाया, लेकिन गोटाबाया ने लगातार इन आरोपों का खंडन किया।

2015 में राजपक्षे परिवार को लगा झटका
हालांकि, गोटाबाया राजपक्षे ने साल 2015 में उस वक्त अपना पद छोड़ दिया था, जब बड़े भाई महिंदा राजपक्षे चुनाव हार गये, लेतिन ईस्टर रविवार 2019 को सिलसिलेवार बम धमाकों में 250 से ज्यादा लोगों के मारे जाने के बाद श्रीलंका कांप उठा था और इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ पूरे देश में माहौल बन गया, जिसका फायदा राजपक्षे परिवार ने पूरी तरह से उठाया और राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बनाकर राजपक्षे परिवार ने जनता का समर्थन हासिल करना शुरू कर दिया। बम धमाके के पीछे आईएसआईएल (आईएसआईएस) से जुड़े स्थानीय सशस्त्र समूहों को हमलों के लिए दोषी ठहराया गया था। लिहाजा, राजपक्षे परिवार ने बहुसंख्यक बौद्ध आबादी के खिलाफ मुसलमानों के खिलाफ एक तरह का माहौल बनाया और सत्ता में वापसी की। लेकिन, महिंदा राजपक्षे, जो लगातार दो बार राष्ट्रपति रह चुके थे और श्रीलंकन संविधान के मुताबिक, वो तीसरी बार राष्ट्रपति नहीं बन सकते थे, लिहाजा उन्होंने अपने छोटे भाई गोटाबाया राजपक्षे की राजनीति में एंट्री करवाई और उन्हें देश का राष्ट्रपति बना दिया, जबकि खुद महिंदा राजपक्षे देश के प्रधानमंत्री बन गये।

राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता
हमलों के मद्देनजर, गोटाबाया राजपक्षे, तत्कालीन सरकार की आलोचना कर रहे थे, जबकि गोटाबाया लगातार खुद के बारे में दावा कर रहे थे, कि उन्होंने श्रीलंका में गृहयुद्ध के दौरान स्थापित तमाम खुफिया नेटवर्क्स का सफाया कर दिया है। गोटाबाया राजपक्षे को जब उनकी पार्टी ने राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया, तो उसके एक हफ्ते बाद उन्होंने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को दिए गये एक इंटरव्यू में विपक्षी सरकार पर घेरते हुए बताया था, कि 'सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं दी है।' इसके साथ ही गोटाबाया राजपक्षे ने "जातीय सुलह के बारे में बात की और फिर वे मानवाधिकारों के मुद्दों के बारे में बात करने लगे, इसके साथ ही उन्होंने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बारे में भी बात की'। गोटाबाया राजपक्षे ने नवंबर 2019 का चुनाव व्यापक अंतर से जीता, और सभी श्रीलंकाई लोगों का प्रतिनिधित्व करने का वादा किया, चाहे उनकी जातीय और धार्मिक पहचान कुछ भी हो। चुनावी कैंपेन के दौरान गोटाबाया राजपक्षे पर एक स्थानीय पत्रकार को किडनैप करने और उसकी हत्या में हाथ होने के भी आरोप लगे, जिसे उन्होंने निराधार बताया।

श्रीलंका का सबसे ताकतवर परिवार
अगस्त 2020 में, राजपक्षे परिवार की पार्टी ने संसद में अपना बहुमत बढ़ाकर दो-तिहाई कर लिया, और फिर गोटाबाया राजपक्षे ने देश की संविधान को ही बदल दिया और श्रीलंका में राष्ट्रपति की शक्तियों को सीमित करने वाले कानून को निरस्त कर दिया। गोटाबाया राजपक्षे ने इस कानून को भी खत्म कर दिया, कि एक शख्स तीसरी बार राष्ट्रपति नहीं बन सकता है। यानि, राजपक्षे परिवार ने देश की सत्ता को अपनी बपौती मानकर श्रीलंका को एक परिवार का टापू बनाकर छोड़ दिया था। इसके साथ ही, राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने महिंदा राजपक्षे को देश का प्रधानमंत्री नियुक्त किया और अपने पूरे परिवार को श्रीलंका की सरकार में शामिल कर लिया। श्रीलंका में तमाम बड़े मंत्रालय... चाहे वों वित्त मंत्रालय हो, या कृषि मंत्रालय, या मानव संसाधान या खेल मंत्रालय या फिर गृह मंत्रालय... हर बड़े मंत्रालय का प्रमुख राजपक्षे परिवार का ही व्यक्ति था। लेकिन, कहते हैं ना... हर तख्त को धूल में मिलना लिखा होता है, राजपक्षे परिवार के लिए अभी जलालत बाकी थी।

राजपक्षे परिवार को शुरू हो गये बुरे दिन
कोविड-19 महामारी और लोकलुभावन योजनाओं ने श्रीलंका की अर्थव्यवस्था में जहर घोलना शुरू कर दिया और फिर श्रीलंका, औपनिवेशिक शासन के अंत के बाद से अपने सबसे खराब आर्थिक संकट में पड़ गया। इस साल महीनों के विरोध प्रदर्शनों में आवश्यक वस्तुओं की कमी और भारी महंगाई ने हजारों लोगों को सड़कों पर ला खड़ा किया। 9 मई को जब सरकार विरोधी प्रदर्शन काफी ज्यादा बढ़ गया और प्रदर्शनकारियों ने जब महिंदा राजपक्षे के आवास को घेर लिया, तो महिंदा राजपक्षे भाग खड़े हुए, वहीं, परिवार के बाकी सदस्य करीब एक महीने पहले ही इस्तीफा दे चुके थे, जबकि अब सरकार में गोटाबाया राजपक्षे अकेले पड़ गये थे, लेकिन उन्होंने सत्ता छोड़ने से इनकार कर दिया था। लेकिन, प्रदर्शनकारियों ने शनिवार को गोटाबाया राजपक्षे के आवास पर भी धावा बोल दिया और कोलंबो में प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघ के घर में भी आग लगा दी। हालांकि, ऐसी रिपोर्ट है कि, उस समय दोनों अपने आवास में नहीं थे। रक्षा मंत्रालय के दो सूत्रों ने कहा कि, राजपक्षे सप्ताहांत के प्रदर्शन से पहले शुक्रवार को आधिकारिक आवास से निकल गए थे। और इस तरह से राजपक्षे परिवार की राजनीति का फिलहाल अंत हो गया है और सबसे ताकतवर परिवार सेना के कैंप में अपनी जान बचा रहा है।
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