अफ्रीकी देशों को भारतीय हथियारों से पाट देगी मोदी सरकार, जानिए कैसे लगाया है मास्टरस्ट्रोक?
Africa India Defence Market: अफ्रीका, जिसे अक्सर दुनिया का सबसे पुराना आबाद महाद्वीप माना जाता है, वो लंबे समय से उपनिवेशवाद की विरासत और विकास के रास्ते में आने वाली चुनौतियों से जूझ रहा है। वर्ल्ड एटलस के डेटा से पता चलता है, कि अफ्रीका में प्रति व्यक्ति, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) सबसे कम $1,809 है, जबकि विश्व का औसत $10,300 है।
नेशनल ज्योग्राफिक की रिपोर्ट के मुताबिक, महाद्वीप का आर्थिक परिदृश्य मुख्य रूप से कृषि प्रधान है, और कामकाजी उम्र की दो-तिहाई आबादी इस क्षेत्र में कार्यरत है, जो अफ्रीकी देशों में सकल घरेलू उत्पाद में 20% से 60% का योगदान देती है।

अफ्रीकी देशों को क्यों है हथियारों की जरूरत
राजनीतिक अस्थिरता, नागरिक संघर्ष, आतंकवाद, समुद्री डकैती...अफ्रीकी देशों के लिए हमेशा से सिरदर्द रहे हैं। हालिया सालों में आतंकवाद और समु्द्री डकैती की घटनाएं काफी बढ़ी हैं। सोमालिया के समुद्री लुटेरे पूरी दुनिया में कुख्यात रहे हैं।
Armed Conflict Location and Event Data Project (ACLED) की रिपोर्ट में इस बात को माना गया है, कि अफ्रीकी देश दुनिया के सबसे ज्यादा संघर्षरत क्षेत्र हैं, जहां करीब 250 से ज्यादा हथियारबंद सशस्त्र गिरोह हैं, जो 28 अफ्रीकी देशों में फैले हुए हैं। ये सभी गिरोह 1989 से 2013 के बीच पनपे हैं, जिनमें से ज्यादातर अब आतंकी संगठन बन चुके हैं। ये संगठन लोगों का अपहरण करते हैं, उनकी हत्याएं करते हैं और गांवों को लूटना इनका मुख्य काम है।
खासकर 6 अफ्रीकी देश सबसे खतरनाक हालातों से जूझ रहे हैं, जिनके नाम हैं नाइजीरिया, सोमालिया, सूडान, इथियोपिया, केन्या और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य। इन देशों में 2013 के बाद हुए संघर्ष में करीब 60 हजार लोगों की मौतें हुई हैं।
लिहाजा, इन्हें रोकने के लिए अफ्रीकी देशों को हथियारों की जरूरत है।
अफ्रीकी देशों में परिवर्तन के संकेत
हालांकि, अफ्रीकी देश अब सकारात्मक बदलाव की तरफ बढ़ रहे हैं। ACLED के हालिया डेटा से पता चलता है, कि सशस्त्र संघर्षों में हुए मौतों की संख्या में अब कमी आनी शुरू हो गई है, लिहाजा अफ्रीकी महाद्वीप में विकास होने की संभावना तेज हो गई है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के मुताबिक, अफ्रीकी देश ऊर्जा और खनिज संसाधनों में समृद्ध हैं और अफ्रीकी महाद्वीप में दुनिया के 30% खनिज भंडार, 12% तेल भंडार और 8% प्राकृतिक गैस भंडार हैं।
यह महाद्वीप दुनिया में कोबाल्ट, हीरे, प्लैटिनम और यूरेनियम के सबसे बड़े भंडार के साथ-साथ 90% क्रोमियम और प्लैटिनम भंडार और 40% सोने के भंडार का दावा करता है।
इनके अलावा, अफ्रीकी राष्ट्र दुनिया के सबसे बड़े मुक्त व्यापार क्षेत्र, अफ्रीकी महाद्वीपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र (एएफसीएफटीए) की स्थापना के लिए एक साथ आए हैं, जिसने आधिकारिक तौर पर जनवरी 2021 में अपना पहला चरण शुरू किया। एएफसीएफटीए का लक्ष्य एक सिंगल महाद्वीपीय बाजार बनाना है, जिसमें 3.4 ट्रिलियन डॉलर संयुक्त सकल घरेलू उत्पाद के साथ 55 देश शामिल हों।
हालांकि, कोविड-19 महामारी के परिणाम के कारण अफ्रीका की अर्थव्यवस्थाओं में 1.4% की गिरावट का अनुमान है, लेकिन स्टेटिस्टा डेटा विश्लेषण में महत्वपूर्ण वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। अनुमान लगाया गया है, कि अफ्रीकी सकल घरेलू उत्पाद 2020 में 2.449 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 2027 में 4.288 ट्रिलियन डॉलर होने का अनुमान है, जो 75% की उल्लेखनीय वृद्धि है।

कितना बड़ा हथियार भंडार है अफ्रीका
अफ्रीकी देशों की जीडीपी बढ़ी है, लिहाजा सैन्य खर्च भी बढ़े हैं। हालांकि, वैश्विक खर्च के मुकाबले ये अभी भी कम है, लेकिन कुछ अफ्रीकी देशों में ये वैश्विक औसत से काफी ज्यादा है।
(एमपी-आईडीएसए) विश्लेषण के मुताबिक, शीत युद्ध के बाद, दुनिया भर में प्रति व्यक्ति सैन्य व्यय में लगभग 26% की वृद्धि हुई, लेकिन अफ्रीका में, इसमें 30% की वृद्धि हुई।
विश्व बैंक और SIPRI मिलिट्री एक्सपेंस डेटाबेस के डेटा प्रमुख अफ्रीकी अर्थव्यवस्थाओं और पूरे महाद्वीप के बीच सैन्य व्यय में बढ़ती प्रवृत्ति को दर्शाते हैं। अफ्रीकी सैन्य खर्च 33.2 अरब डॉलर से बढ़कर 43.2 अरब डॉलर हो गया है, जो 2010 से 2020 तक 28.6% की वृद्धि दर्शाता है।
अफ्रीका ने 2020 में सैन्य व्यय में 5.1% की उच्चतम वृद्धि को दर्शाया है, जबकि इसके बाद यूरोप (4%), अमेरिका (3.9%) का स्थान रहा है। वहीं, एशिया और ओशिनिया (2.5%) का है। अफ्रीकी देश मिस्र, नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रीका, मोरक्को और अल्जीरिया, यहां तक कि मध्य पूर्व और उप-सहारा अफ्रीकी देशों में भी रक्षा बजट बढ़ने की उम्मीद है।
अफ्रीकी देशों में कदम बढ़ाता भारत
भारत का प्रारंभिक रक्षा निर्यात लक्ष्य उसकी मध्यम आकांक्षाओं का संकेत है, जिसका लक्ष्य 2025 तक 5 अरब डॉलर तक पहुंचने का है। अफ्रीकी महाद्वीप इस लक्ष्य को प्राप्त करने या उससे भी आगे निकलने में महत्वपूर्ण योगदान देने की क्षमता रखता है।
भारत के एक्ज़िम बैंक की एक हालिया शोध रिपोर्ट बताती है, कि भारत 2017 और 2021 के बीच पहले ही मॉरीशस, मोज़ाम्बिक और सेशेल्स जैसे देशों में अग्रणी रक्षा निर्यातक के रूप में उभरा है।
इस दौरान इन तीन देशों ने सामूहिक रूप से भारत के हथियार निर्यात का 13.9% हिस्सा अपने पक्ष में किया है। रिपोर्ट में भारत को अफ्रीकी देशों की समुद्री, एयरोस्पेस और रक्षा जरूरतों के लिए एक केंद्रीय केंद्र बनने की वकालत की गई है, जिसमें विशुद्ध रूप से जरूरत-आधारित दृष्टिकोण के बजाय प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और मानवीय सहायता के माध्यम से सशक्तिकरण पर जोर दिया गया है।
मोदी सरकार का मास्टरस्ट्रोक कैसे है?
भारत वैश्विक दक्षिण की अग्रणी आवाजों में से एक के रूप में उभरा है, और अब भारत, ग्लोबल साउथ के लीडर के तौर पर उभर रहा है। जी20 में अफ्रीकी यूनियन को भारत ने शामिल करवाकर अफ्रीकी देशों को अपने पाले में कर लिया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसके लिए जून 2023 में G20 नेताओं को पत्र लिखा था। उन्होंने सितंबर में दिल्ली शिखर सम्मेलन के दौरान एयू को जी20 की पूर्ण सदस्यता देने का विचार प्रस्तावित किया था। इसके बाद, 9 सितंबर को, एयू को समूह में शामिल किया गया, जिससे सदस्यों की संख्या 21 हो गई।
भारत, अफ़्रीकी महाद्वीप के कई देशों के साथ ऐतिहासिक संबंध साझा करता है। भारतीय प्रभाव अफ्रीकी देशों में काफी गहराई से महसूस की जा सकती है। औपनिवेशिक काल के दौरान कई अफ्रीकी देशों में भारतीय गिरमिटिया मजदूरों को भेजा गया, जो अब मजबूत स्थिति में आ चुके हैं।
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 2018 में दक्षिण अफ्रीका, रवांडा और युगांडा की अपनी यात्राओं के दौरान, अफ्रीकी महाद्वीप को एक रक्षा भागीदार में बदलने की अपनी सरकार की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया था।
भारत ने अफ्रीकी महाद्वीप के देशों के साथ अपनी रक्षा वार्ता को संस्थागत बना दिया है और डेफएक्सपो 2022 के हिस्से के रूप में भारत-अफ्रीका रक्षा वार्ता (आईएडीडी) का दूसरा संस्करण आयोजित किया है।
लिहाजा, भारत आने वाले वक्त में अफ्रीकी देशों के लिए बहुत बड़ा हथियार भंडार हो सकता है और इससे भारत की डिफेंस इंडस्ट्री को उड़ान भरने में मदद मिलेगी।
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