भारतीय कश्मीर बन गया स्वर्ग, पाकिस्तान ने PoK को बना दिया नर्क.. 30 साल में पहली बार कैसे हुआ चमत्कार?
Jammu Kashmir: भारत के गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट शब्दों में कहा है, कि जम्मू-कश्मीर में जल्द ही विधानसभा चुनाव होंगे और मोदी सरकार ने कश्मीर में विकास की जो धारा बहाई है, उसका बहना जारी रहेगा।
समाचार एजेंसी पीटीआई को हाल ही में दिए गये एक इंटरव्यू में भारतीय गृहमंत्री अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर को लेकर मोदी सरकार के प्लान को लेकर बातचीत की है, जिसमें केन्द्र सरकार की भविष्य की नीति और पॉलिटिकल स्थिरता का जिक्र किया गया था। भारतीय गृहमंत्री ने इस दौरान जो संकेत दिया है, कैसे भारत सरकार का मकसद कश्मीर के लिए एक बेहतरीन लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाना है।

इसके साथ ही, भारतीय गृहमंत्री ने कश्मीर घाटी के राजनीतिक नेतृत्व के बारे में लंबे समय से चली आ रही गलत धारणा को दूर कर दिया है, कि NDA सरकार या तो कश्मीर को लेकर अस्पष्ट है, या फिर भविष्य की योजनाओं से लोगों को दूर रख रही है।
शांतिपूर्ण चुनाव से क्या मिल रहे हैं संदेश?
कश्मीर के तीन निर्वाचन क्षेत्रों - अनंतनाग, श्रीनगर और बारामूला में संसदीय चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गये हैं और सबसे हैरानी की बात ये रही, कि जिस कश्मीर में कभी शांतिपूर्ण चुनाव ना हुए, वहां इस बार कोई हिंसा नहीं हुई और इसके साथ ही मतदान प्रतिशत में भी ऐतिहासिक उछाल देखा गया है।
इसके साथ ही, महत्वपूर्ण बात ये भी हुई है, को नेता और ऐसे ग्रुप, जो भारतीय संविधान के मुताबिक, कश्मीर में मतदान नहीं करना चाहते थे, उन्होंने भी ना सिर्फ इलेक्शन प्रोसेस में चुपचाप भाग लिया, बल्कि उन्होंने लोगों को भड़काने के लिए और मतदान का बहिष्कार करने जैसे व्हिप भी जारी नहीं किए, जिससे पता चलता है, कि मोदी सरकार ने कश्मीर में किस हद तक शांति कायम किया है।
कश्मीर की मुख्यधारा की क्षेत्रीय पार्टियां, नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी), पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी), कांग्रेस और अन्य पार्टियों ने पहले ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने की अपनी इच्छा का संकेत दिया था। दिलचस्प बात यह है, कि हुर्रियत के मीरवाइज फारूक गुट ने भी चुनाव के बहिष्कार का आह्वान करने से परहेज किया था। और ये काफी महत्वपूर्ण बात है।
कश्मीर में कैसे आई शांति?
जमात-ए-इस्लामी के पूर्व दिग्गज अली शाह गिलानी की मौत के बाद हुर्रियत (मीरवाइज) घाटी की जमात-ए-इस्लामी का गढ़ बन गया है। मौलवी उमर को कुछ समय के लिए नजरबंद रखा गया था, जब उन पर कश्मीर अलगाववादियों के लिए पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) से फंडिंग हासिल करने और उन्हें पहुंचाने के लिए माध्यम बनने का आरोप लगा था।
वहीं, इस खुलासे के बाद ऐसी उम्मीद थी, कि मीरवाइज पर मुकदमा चलाया जाएगा और उनकी गुप्त गतिविधियों के लिए उन्हें बेनकाब किया जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और मामला ठंडे बस्ते में चला गया।
पिछले कुछ समय से कश्मीर के प्रमुख और प्रभावशाली मुस्लिम नेता मीरवाइज खबरों में नहीं थे और ना ही कश्मीर जमात-ए-इस्लामी को स्थानीय मीडिया में बड़े पैमाने पर प्रमुखता मिली।
तो क्या मीरवाइज, जमीनी हालात का दोबारा आकलन और आत्मनिरीक्षण कर रहे थे? क्या वह पाकिस्तान की परेशान करने वाली स्थिति पर नजर रख रहे थे, जहां आर्थिक संकट मचा है। क्या वह इस्लामिक देशों की ताकत और कमियों और उनमें से कई देशों, खासकर सऊदी अरब के साथ भारत के लगातार मजबूत होते संबंध का विश्लेषण कर रहे थे?
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह, कि क्या वह पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) के लोगों और इस्लामाबाद के शासकों के बीच तेजी से बिगड़ते संबंधों को बड़ी परेशानी के साथ देख रहे हैं?
मीरवाइज को लेकर माना जाता है, कि वो पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में अच्छा प्रभाव रखते हैं और पीओके के प्रवासी, जो कश्मीर में रहते हैं, उनके बीच भी मीरवाइज की अच्छी खसी पकड़ है। मीरवाइज के पूर्वज मौलवी यूसुफ शाह को 1948 में शेख अब्दुल्ला के सत्ता संभालने के तुरंत बाद उनकी सरकार ने श्रीनगर से निर्वासित कर दिया था। लेकिन, ताजा चुनाव में मतदान प्रतिशत को देखते हुए लगता है, कि मीरवाइज जैसे नेताओं का भी पाकिस्तान से मोहभंग हुआ है।
PoK में बुरे हालात, ना खाने को रोटी, ना बिजली पानी
पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान में पिछले एक साल से ज्यादा वक्त से इस्लामाबाद विरोधी आंदोलन ने इस्लामिक स्टेट ऑफ पाकिस्तान को हिला कर रख दिया है। यह इस्लाम बनाम इस्लाम की लड़ाई है।
पीओके में मची लड़ाई से यह भी पता चलता है, कि क्यों भारत सरकार, 1994 में सर्वसम्मत से पारित संसदीय प्रस्ताव के मुताबिक, पीओके को वापस लेने की लगातार चेतावनियां जारी कर रही है, जब पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में कांग्रेस सत्ता में थी।
पिछले दो या तीन वर्षों में कश्मीर में सैन्य और सुरक्षा योजनाकारों की रणनीति का प्रभाव भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। दक्षिण कश्मीर, विशेष रूप से पुलवामा, शोपियां जैसे क्षेत्रों को अलगाववादियों और आतंकवादियों से मुक्त कर दिया गया है, और स्थानीय लोगों में कश्मीर को लेकर एक नई उम्मीद जगी है, जहां लोग शांति और विकास कार्यों को देखकर खुश हैं। कश्मीर में पहले जहां शाम पांच बजे के बाद खामोशी पसर जाती थी, वहां अब शाम पांच बजे के बाद जिंगदी शुरू होती है।
मोदी सरकार ने कश्मीर में शांति बहाली के लिए काफी योजनाबद्ध तरीके से काम किया है और विकास ही मकसद है, अपने इस नजरिए से स्थानीय लोगों को वाकिफ करवाया है। सरकार की नीतियों में युवाओं पर फोकस किया गया है और उनके लिए ना सिर्फ नौकरियों के अवसर बनाए गये हैं, बल्कि उनके लिए खुद के रोजगार शुरू करने के भी मौके बनाए गये हैं।
जम्मू कश्मीर में डिग्री कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, मेडिकल कॉलेजों, आईआईटी, आईआईएम और पॉलिटेक्निक कॉलेजों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जहां युवा और होनहार छात्र बिना किसी डर या पक्षपात के एडमिशन ले रहे हैं।
लिहाजा, गृह मंत्री का बयान एनसी, कांग्रेस, पीडीपी, सीपीआई और कुछ अलगाववादी दलों के इस रुख को खत्म करता है, कि केंद्र में बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार, राज्य विधानसभा को भंग करना चाहती है और इसे "हिंदू" बहुमत वाले राज्य में बदलना चाहती है।
इसके विपरीत, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में हाल बेहाल हैं। महंगाई और बेरोजगारी ने लोगों का जीना दूभर कर दिया है और अब भारतीय कश्मीर से मिलने के लिए हलचल तेज होने लगी है।












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