9 साल में शादी, हिजाब पहनना जरूरी, जानिए इस्लामिक देश ईरान में महिलाओं को दबाने के कितने कानून हैं?
ईरान में पिछले हफ्ते 13 सितंबर को महासा अमीनी, जो अपने परिवार के साथ राजधानी तेहरान घुमने आई थी, उसके सिर के बाल दिखने की वजह से इस्लामिक पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और बाद में उसकी मौत हो गई।
तेहरान, सितंबर 21: ईरान में इन दिनों औरतें आजादी के लिए संघर्ष कर रही हैं और 22 साल की कुर्दिश महिला महसा अमिनी की मौत ने एक बार फिर से इस्लामिक देश ईरान में महिलाओं के साथ होने वाली बर्बरता को वैश्विक मंच पर सामने ला दिया है। ईरान में महिलाओं के पास काफी कम अधिकार हैं और ज्यादातर कट्टर इस्लामिक देशों की तरह ही ईरान में महिलाओं के लिए हिजाब पहनने से लेकर शादी करने और यात्रा करने तक को लेकर अलग अलग नियम कानून हैं। हालांकि, एक वक्त ऐसा नहीं था और 1979 से पहले ईरान की महिलाएं अपनी मर्जी से जीवन जीती थीं, लेकिन फिर इस्लामिक क्रांति हो गई और ईरान में महिलाओं के सारे अधिकार छीन लिए गये।

हिजाब के लिए लड़की को मारा
ईरान में पिछले हफ्ते 13 सितंबर को महासा अमीनी, जो अपने परिवार के साथ राजधानी तेहरान घुमने आई थी, उसके सिर के बाल दिखने की वजह से इस्लामिक पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और फिर पुलिस कस्टडी में उसकी बुरी तरह से पिटाई की गई और अधमरे हाल में अस्पताल में भर्ती कराया गया। महसा अमीनी कोमा में जा चुकी थी और तीन दिनों के बाद अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पोस्टमार्टर रिपोर्ट में खुलासा हुआ, कि उसके सिर के काफी फ्रैक्चर थे और गंभीर चोटों की वजह से सिर में कई नसें फट गईं थीं और उसी की वजह से महसा अमीनी की मौत हुई। जबकि, पुलिस ने झूठ बोला था, कि महसा अमीनी को हार्ट अटैक आया था। परिवार ने भी आरोप लगाया, कि हिरासत में महसा अमीनी के साथ बुरी तरह से मारपीट की गई, लेकिन महसा अमीनी की मौत ने ईरान में उस गुस्से की बारूद में चिंगारी फूंक दी, जो ईरानी महिलाओं के दिल में लंबे अर्से से भरा पड़ा था। महसा की मौत के बाद समूचे ईरान में भारी विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और प्रदर्शनकारियों पर की गई पुलिस फायरिंग में 5 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि दर्जनों घायल हैं।

महिलाओं का फूटा गुस्सा
हालांकि, इस्लामिक शासन महिलाओं के विरोध प्रदर्शन को कुचलने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है, लेकिन इस बार विरोध प्रदर्शन को युवा पीढ़ी का भी साथ मिल रहा है, लिहाजा इस्लामिक सरकार के लिए काफी मुश्किलें हो रही हैं। अब तक करीब 20 हजार से ज्यादा महिलाओं के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है और सैकड़ों को गिरफ्तार किया गया है, लेकिन महिलाएं भी इस बार आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं और सड़कों पर आकर हिजाब जला रही हैं और अपने बाल काटकर प्रदर्शन कर रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के कई हिस्सों में अब हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गये हैं और खतरनाक आर्थिक संकट में फंसे ईरान के हालात और भी ज्यादा खराब हो गये हैं। हालांकि, ईरान में हमेशा महिलाओं के लिए इस तरह के कड़े पोशाक नियम नहीं थे और 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले, देश में महिलाओं ने अपने पुरुष समकक्षों के समान अधिकारों का आनंद लिया। आईये जानते हैं, कि आइए देखें कि क्रांति के बाद से ईरानी महिलाओं ने क्या बदलाव देखे हैं।

नहीं थी हिजाब पहनने की अनिवार्यता
हालांकि, 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले भी हिजाब ईरान में प्रचलित था, लेकिन हिजाब पहनने की अनिवार्यता नहीं थी और महिलाएं अपनी मर्जी के मुताबिक, किसी पर्व त्योहार पर हिजाब पहनती थीं। लेकिन, सार्वजनिक जगहों पर ईरानी महिलाएं पश्चिमी देशों की महिलाओं के मुताबिक ही जीवन जीती थीं। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, 1979 से पहले ईरान की महिलाएं सार्वजनिक रूप से तंग-फिटिंग जींस, कपड़े, मिनीस्कर्ट्स और शॉर्ट-स्लीव टॉप सहित पश्चिमी शैली के कपड़े पहन सकती हैं। महिलाएं पुरूषों की तरह ही हेयर कटिंग सैलून में जाती थीं, लेकिन इस्लामिक क्रांति के बाद सैलून में महिलाओं का दिखना बंद हो गया और फिर महिलाओं को घर से निकलते ही अपने सिर को पूरी तरह से ढंकने का नियम बना दिया गया और काफी सख्ती के साथ इस नियम का पालन करवाया जाने लगा।

महिलाओं के पास काफी कम अधिकार
न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में महिलाओं के अध्ययन के प्रोफेसर बैरोनेस हलेह अफशर ने बीबीसी को बताया कि, "आजकल आप हेयरड्रेसर के अंदर एक आदमी को नहीं देखेंगे और महिलाओं को दरवाजे से बाहर निकलते ही अपने बालों को ढंकना होता है। कुछ लोग अपने घरों में गुप्त सैलून चलाते हैं, जहां पुरूष और महिलाएं कभी कभार एक साथ नजर आ जाते हैं''। 1980 के दशक की शुरुआत में ईरानी महिलाओं के लिए हिजाब को अनिवार्य बनाया गया था और नैतिकता पुलिस ड्रेस कोड और अन्य प्रतिबंधों को लागू करवाने के लिए जिम्मेदार है। वहीं, इस कानून के बनने के बाद कई युवा महिलाओं को कानून का उल्लंघन करने के लिए काफी सख्त सजा दी गई, जिनमें से कई महिलाओं की मौत भी हो चुकी है। महिलाओं को सार्वजनिक रूप से बाहर होने पर शरीर को कवर करने के लिए एक कोट पहनना भी अनिवार्य कर दिया गया। जो लोग ड्रेस कोड का पालन नहीं करते हैं, उन्हें ईरान प्राइमर के अनुसार, 500,000 रियाल और 74 लैश तक का जुर्माना और दो महीने की जेल की सजा मिलती है। 2019 के अमेरिकी विदेश विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, सख्त हिजाब कानून का विरोध करने वाली महिला कार्यकर्ताओं को अदालतों में कठोर सजा सुनाई गई है। ऐसे मामलों में ही एक मामला मानवाधिकार अटॉर्नी नसरीन सोतौडेह का भी था, जिन्हें 2018 में हिजाब कानून का उल्लंघन करने पर 38 साल की जेल की सजा सुनाई गई है।

शादी की उम्र पर नियम
ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद जैसे ही खुमैनी सत्ता में आए, उन्होंने ईरान में आधुनिक जीवन शैली को रूढ़िवादी मान्यताओं से बदल दिया गया। साल 1979 में लड़कियों के लिए शादी की उम्र पहली बार 18 साल से घटाकर 13 साल किया गया और फिर 1982 में लड़कियों की शादी की उम्र 13 साल से भी घटाकर 9 साल कर दी गई। यानि, ईरान में 9 साल की उम्र में शादी को कानूनी मान्यता मिल गई।

महिलाओं की यात्रा पर कानून
ईरान में विवाहित महिलाएं अकेले देश को नहीं छोड़ सकती हैं या यहां तक कि अपने पति की लिखित अनुमति के बिना वो पासपोर्ट भी प्राप्त नहीं कर सकती हैं, जबकि एकल महिलाओं को अपने पिता की स्वीकृति की आवश्यकता है। ईरान प्राइमर के अनुसार, एक व्यक्ति के पास यह अधिकार है, कि उसका परिवार कहां रहता है और वह अपनी पत्नी को नौकरी करने से भी रोकने का अधिकार रखता है। ईरान में पति के पास अधिकार है, कि उसकी पत्नी पारिवारिक मूल्यों का पालन करती है या नहीं, उसका फैसला करे। नेशनल के लिए शिरीन एबडी लिखते हैं, कि "एक महिला अपने करियर में उच्च पदों पर पहुंच सकती है। फिर भी, एक विवाहित महिला अपने पति की अनुमति के बिना यात्रा नहीं कर सकती है। यह दिलचस्प विरोधाभासों की ओर जाता है।"

फैमिली प्रोटेक्शन कानून सस्पेंड
ईरान में सर्वोच्च नेता खुमैनी के सत्ता में आने के बाद, उन्होंने ईरान से फैमिली प्रोटेक्शन कानून को सस्पेंड कर दिया, जिसके तहत ईरानी महिलाओं को काफी अधिकार प्रदान किए गये थे। इस कानून के सस्पेंड होने के बाद महिलाओं के अधिकारों को काफी नुकसान पहुंचा और पुरूषों को इस बात की इजाजत दे दी गई, कि वो मुंह से बोलकर अपनी पत्नी को फौरन तलाक दे सकते हैं। जबकि, 1979 से पहले ऐसा करने पर सख्त सजा का प्रावधान था। वहीं, नये कानून में कहा गया, कि अगर महिलाओं को तलाक चाहिए, तो उन्हें कोर्ट जाना होगा, लेकिन कोर्ट में महिलाओं को तलाक लेने के लिए इतने स्टेप्स से गुजरने पड़ते हैं, कि बहुत कम महिलाएं ही अदालत जा पाती हैं। साल 2002 में, ईरान प्राइमर के अनुसार, संसद ने एक महिला को तलाक के लिए फाइल करने की अनुमति देने के लिए कानून में संशोधन किया और नये नियम में यह शामिल किया गया, कि एक महिला को तभी तलाक मिल सकता है, अगर उसके पति को जेल की सजा मिली हो, या फिर मानसिक तौर पर बीमार हो या फिर शारीरिक तौर पर अपंग हो। इसके अलावा किसी और सूरत में तलाक नहीं मिल सकती है। इसके साथ ही ईरान में पुरूषों को एक से ज्यादा शादी करने की इजाजत दे दी गई और एक ईरानी पुरुष चार महिलाओं से शादी कर सकता है, जबकि एक महिला का सिर्फ एक पति हो सकता है।

बच्चों की निगरानी पर कानून
ईरानी कानून के मुताबिक, तलाक की नौबत में एक महिला को सिर्फ 7 साल तक ही अपने बच्चों को रखने का अधिकार है और उसके बाद कोर्ट तय करेगा, कि बच्चों की कस्टडी किसे दी जाएगी। यदि एक तलाकशुदा महिला पुनर्विवाह करती है, तो वो अपने पूर्व पति से हुए बच्चे को रखने का अधिकार खो देगी और उस सूरत में भी वो अपने बच्चे को नहीं रख सकती है, कि अगर उसके पूर्व पति की मौत हो जाती है। वहीं, जब फैमिली प्रोटेक्शन कानून लागू था, उस वक्त पुरूषों के पास सीधे तौर पर बच्चों की कस्टडी लेने का अधिकार नहीं था, बल्कि कोर्ट को तमाम बातों को ध्यान में रखते हुए ये तय करने का अधिकार था, कि बच्चे किसके पास ज्यादा सुरक्षित और अच्छे तरीके से रह सकते हैं।

खेलों में महिलाओं के लिए नियम
खेल एक और क्षेत्र है जिसने 1979 की क्रांति के बाद से भारी बदलाव देखा है। पहले महिलाएं अक्सर स्टेडियम का अहम हिस्सा होती थीं। लेकिन, अब भले ही महिलाओं पर कोई आधिकारिक प्रतिबंध नहीं है, लेकिन उन्हें अक्सर स्टेडियम में एंट्री देने से इनकार कर दिया जाता है जहां पुरुष खेल रहे होते हैं। महिलाओं ने आधिकारिक तौर पर इस साल अगस्त में तेहरान के अज़ादी स्टेडियम में एक घरेलू लीग फुटबॉल मैच में भाग लिया। इससे पहले, तीन साल पहले पुरूषों के विश्व कप क्वालीफायर मैच में महिलाओं को स्टेडियम जाकर मैच देखने की इजाजत दी गई थी।












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