कर्ज बांटकर देशों पर कैसे 'कब्जा' करता है ड्रैगन, जानिए चीन के जाल में कैसे फंस गये 58 देश?

2020 में जारी की गई एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि, चीन अब तक 5.6 ट्रिलियन डॉलर का लोन अलग अलग देशों को विकास के नाम पर बांट चुका है और ये रकम भारत की अर्थव्यवस्था का दोगुना है।

नई दिल्ली, दिसंबर 19: बहुत आसानी से लोग पूछ बैठते हैं, कि आखिर चीन किसी और देश को अपना 'गुलाम' कैसे बना लेता है? आखिर ड्रैगन के जाल में ज्यादातर देश फंसते कैसे जा रहे हैं और चीन के वो गुप्त शर्तें क्या होती हैं, जिनको जानने के बाद भी कई देश कर्ज लेने से पीछे नहीं हटते हैं, हम आपको समझाने वाले हैं। आएएमएफ और वर्ल्ड बैंक ने मिलकर अभी तक जितने लोन बांटे हैं, उससे ज्यादा लोन अभी तक चीन बांट चुका है और आपको ये जानकर और भी ज्यादा हैरानी होगी, कि भारत की जीडीपी से दोगुना रुपये अभी तक चीन अलग अलग लोगों को बतौर कर्ज दे चुका है और जाहिर सी बात है, चीन से कर्ज लेने वाले देश इतने छोटे हैं, कि अब उनके लिए ड्रैगन के जाल को काटना नामुमकिन सरीखा हो चुका है।

कितना कर्ज बांट चुका है ड्रैगन?

कितना कर्ज बांट चुका है ड्रैगन?

2020 में जारी की गई एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि, चीन अब तक 5.6 ट्रिलियन डॉलर का लोन अलग अलग देशों को विकास के नाम पर बांट चुका है और ये रकम भारत की अर्थव्यवस्था का दोगुना है। इसके साथ ही विश्व में जितने भी द्विपक्षीय संबंधों के तहत लोन बांटे गये हैं, उसका 65 फीसदी हिस्सा अकेले सिर्फ चीन ने बांटे हैं। यानि, आप बहुत आसानी से समझ सकते हैं, कि चीन छोटे देशों को कैसे कर्ज के जाल में बुरी तरह से फंसा लेता है। साल 2017 मं चीन की सरकार ने एक व्हाइट पेपर जारी किया था, जिसमें उसने बांटे गये लोग को 'इंटरनेशनल डेवलपमेंट कॉपरेशन' कहा था, और उसने अपनी देश को जनता को ये बताया था, कि वो जो लोन अलग अलग देशों को बांट कहा है, वो उस ''साउथ-साउथ कॉपरेशन'' का हिस्सा है, जो को 'वैश्विक समुदाय का जिम्मेदार देश' होने के नाते चीन का कर्तव्य बनता है। लेकिन, असलियत काफी अलग है। आपको जानकर हैरानी होगी, कि चीन ने विश्व के 58 देशों को अपने कर्ज के जाल में पूरी तरह से जकड़ लिया है, जिनमें पाकिस्तान और श्रीलंका भी शामिल हैं।

'वैश्विक कल्याण' के नाम पर लोन बांटता है चीन

'वैश्विक कल्याण' के नाम पर लोन बांटता है चीन

द टाइम्स ऑउफ इडजरायल ने पिछले दिनों एक रिपोर्ट छापी है, जिसमें चीन द्वारा दिए जाने वाले कर्ज को लेकर उसकी पोल खोली गई है। इस रिपोर्ट में फैबियन बौसार्ट ने चीन की सरकार की कर्ज की नीति को लेकर लिखा है कि, ''चीन जो कर्ज देता है, उसे वो वैश्विक कल्याण के वास्ते दिया गया कर्ज बताता है और कहता है कि उसका लोन बांटने का मकसद विश्व में सार्वजनिक तौर पर अच्छा काम करना है, और वो वैश्विक समुदाय का जिम्मेदार देश होने के नाते ऐसा कर रहा है''।

चीनी कर्ज से देश अस्थिर

चीनी कर्ज से देश अस्थिर

उन्होंने कहा कि, लेकिन अगर आप चीन द्वारा दिए जाने वाले कर्ज को गहराई से देखेंगे, तो आपको पता चलेगा, कि चीनी कर्ज काफी ज्यादा खतरनाक और हिंसक है। जिसमें फंसने वाला कभी बाहर नहीं निकल सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि, चीनी शर्त मानने के साथ ही कर्ज लेने वाला देश पूरी तरह से अस्थिर हो जाता है और वहां की राजनीति पर चीन अप्रत्यक्ष तौर पर कब्जा कर लेता है। यानि, देश की संप्रभुता पर चीन का कब्जा हो जाता है। उन्होने कहा कि, चीन जो लोन बांटता है, उसका करीब 60 फीसदी हिस्सा कॉमर्शियल रहता है और उसमें किसी भी तरह की कोई छूट नहीं रहती है, जो एक बहुत बड़ा धोखा होता है।

कर्ज बांटने के पीछे खतरनाक मकसद

कर्ज बांटने के पीछे खतरनाक मकसद

रिपोर्ट के मुताबिक, कर्ज देने से पहले चीन ने पूरी तरह से सुनिश्चित कर लेता है, कि उसका लोन किसी भी पब्लिक वेलफेयर के काम में ना जाए और जो लोन वो दे रहा है, उसके जरिए उस देश पर उसका नियंत्रण स्थापित हो जाए। दरअसल, लोन देकर भी चीन अपना ही विकास करता रहता है। और इसका सबसे बड़ा उदाहरण पाकिस्तान है। रिपोर्ट में कहा गया है कि, चायना-पाकिस्तान इकोनोमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) में जो काम हुआ है, उसके लिए चीन ने पाकिस्तान को भारी ब्याज दरों पर कर्ज दिया है, लेकिन कर्ज के साथ साथ पाकिस्तान में जो भी काम हो रहा है, उसमें काम करने वाले मजदूर भी चीन के हैं। जिसको लेकर इन दिनों पाकिस्तान में भारी विरोध प्रदर्शन हो रहा है और चीन का भयानक विरोध किया जा रहा है।

श्रीलंका को भी चीन ने फंसाया

श्रीलंका को भी चीन ने फंसाया

वहीं काम चीन ने श्रीलंका में भी किया है। कोलंबो बंदरगाह के निर्माण के लिए चीन ने कर्ज दिया है और चीन के ही सारे मजदूर काम कर रहे है। बंदरगाह पर चीन के ही जहाज आते हैं और श्रीलंका अपने ही देश के बंदरगाह का इस्तेमाल नहीं कर सकता है। द टाइम्स ऑफ इज़राइल की रिपोर्ट के मुताबिक, "हाउ चाइना लेंड्स: ए रेयर लुक इन 100 डेब्ट कॉन्ट्रैक्ट्स विद फॉरेन गवर्नमेंट्स" शीर्षक से हाल ही में अप्रैल 2021 की रिपोर्ट में चीनी विदेशी उधार को लेकर सनसनीखेज रिपोर्ट प्रकाशित की गई है।

चीनी कर्ज का विश्लेषण

चीनी कर्ज का विश्लेषण

जर्मनी के कील इंस्टीट्यूट और वाशिंगटन स्थित सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट, एंड डेटा और पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स ने चीन द्वारा साल 2000 से 2020 तक 24 विकासशील देशों को बांटे गये लोन का अध्ययन किया है। इसके अलावा दुनिया के बाकी 142 देशों को मिले गैर-चीनी संस्थानों द्वारा बांटे गये लोन के साथ इसकी तुलना की गई है, जिन्हें 28 कॉमर्शियल संस्थान, या द्विपक्षीय संबंध या फिर बहुपक्षीय संबंधों द्वारा मिले गये है। इनके अध्ययन से पता चला है कि चीन जो कर्ज देता है, वो काफी कठोर शर्तों पर होता है।

चीनी लोन के पीछे कठोर और गुप्त शर्तें

चीनी लोन के पीछे कठोर और गुप्त शर्तें

चीन जो कर्ज दुनिया के देशों को बांटता है, उसके पीछे काफी कठोर शर्तें रखी गई होती हैं और उन शर्तों में सबसे बड़ा शर्त 'गोपनीयता' का होता है। यानि, कर्ज लेने वाले देश इसका खुलासा नहीं कर सकते हैं, कि उन्होंने चीन से किन शर्तों पर कर्ज लिया है। वहीं चीन ने उन्हें कितना कर्ज दिया है, और रेट ऑफ इंटरेस्ट क्या है, ये भी बताने की मनाही होती है। जो सीधे तौर पर ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनोमिक कॉपरेशन एंड डेवलपमेंट यानि ओईसीडी के नियमों का उल्लंघन है। चीन द्वारा दिए गये 'अपारदर्शी' कर्ज से कर्ज लेने वाले देशों पर छिपा हुए कर्ज का भार काफी ज्यादा बढ़ जाता है और जनता को चीन द्वारा दिए गये कर्ज और कर्ज की शर्तों का पता ही नहीं लग पाता है। इसके साथ ही चीन जो कर्ज बांटता है, वो 'नो पेरिस क्लब' एग्रीमेंट से अलग रहता है। 'नो पेरिस क्लब' वह संस्था है, जिसमें विश्व के तमाम कर्ज बांटने वाले बड़े बड़े देश शामिल हैं, जो कर्ज लेने वाले देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं और अगर कर्ज लेने वाला कोई देश कर्ज चुकाने में नाकाम साबित होता है तो फिर उसे रियायत दी जाती है। लेकिन, चीन कर्ज देते वक्त सबसे पहले इस शर्त को हटा देता है। यानि, कर्ज लेने के साथ ही देश असुरक्षित हो जाता है।

चीन की खतरनाक शर्तों को जानिए

चीन की खतरनाक शर्तों को जानिए

कर्ज देने से पहले चीन कई कठोर शर्तें थोपता है। एक शर्त ये होता है कि

  • चीन कभी भी कर्ज के कॉन्ट्रैक्ट को रद्द करने का अधिकार रहता है और कभी भी कर्ज का पूरा पैसा वापस मांग सकता है, चाहे कर्ज लेने वाले देश की स्थिति कैसी भी क्यों ना हो और कर्ज अदायगी से उसपर कोई भी फर्क क्यों ना पड़े।
  • चीनी शर्त के मुताबिक, चूंकी 60 प्रतिशत लोन कॉमर्शियल लोन होता है, लिहाजा जो काम होगा, उसमें चीन के लोगों के शामिल होने का शर्त अलग से रहता है। इसके साथ ही उस देश के पर्यावरण और कानून को पहुंचे नुकसान से चीन को कोई मतलब नहीं होगा, ये शर्त भी रहता है। ये शर्तें सीधे तौर पर कर्ज लेने वाले देश की संप्रभुता के लिए खतरा होते हैं।
  • चीन अपने पास कर्ज देने वाले देश के कानून को मानने या फिर नहीं मानने का अधिकार रखता है, जो उस देश की संप्रभुता का सीधा उल्लंघन है। इसके साथ ही कभी भी पूरा पैसा मांगकर वो आपको अपाहिज कर सकता है और फिर आपकी जमीन पर कब्जा कर सकता है, जो उसने श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह के साथ किया।
देश की राजनीति पर कब्जा

देश की राजनीति पर कब्जा

कर्ज देने के अलावा चीन विकासशील देशों के पॉलिटिकल सिस्टम पर भी कब्जा करने लगता है। इसके लिए वो देश के नेताओं को रिश्वत खिलाना शुरू करने लगता है। चीन सत्तापक्ष के साथ साथ विपक्षी पार्टियों को भी जमकर रिश्वत खिलाता है और फिर उस देश की सरकार जब टेंडर निकालती है, तो चीनी कंपनियां उस टेंडर को आसानी से हासिल कर लेती हैं और विपक्ष के नेता चुप्पी साधे रहते हैं और देश की जनता कभी चीन के अतिक्रमण को नहीं समझ पाती है। यानि, चीन के लोन पर बनने वाले प्रोजेक्ट का टेंडर भी चीन के पास ही जाता है। उदाहरण के तौर पर जकार्ता-बांडुंग रेल परियोजना के लिए जापान ने 0.1 प्रतिशत पर कर्ज देने का ऑफर दिया था, बावजूद इसके वहां की सरकार ने 2 प्रतिशत ब्याज दर पर चीन से लोन लिया और रेल लाइन बनाने का ठेका भी चीन को दिया गया।

पॉलिटिकल पार्टी बनते हैं गुलाम

पॉलिटिकल पार्टी बनते हैं गुलाम

जैसे ही देश के नेता चीन के पैसों पर पलना शुरू करते हैं, उस देश की राजनीति की बागडोर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के हाथ में आ जाती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण पाकिस्तान है, जहां की सभी राजनीतिक पार्टियां चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की गुलाम बन चुकी है। दरअसल, इसी साल चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने सांस्कृतिक मेल मिलाप और मदद के नाम पर पाकिस्तान की राजनीतिक पार्टियों को अपने साथ जुड़ने का ऑफर दिया था, जिसे पाकिस्तान की सभी राजनीतिक पार्टियों ने स्वीकार किया, जिसका नतीजा ये हुआ है, कि अब पाकिस्तान की हर विदेश नीति का फैसला चीन करने लगा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण इसी महीने तब सामने आया है, जब अमेरिका द्वारा आयोजित 'लोकतंत्र शिखर सम्मेलन' में पाकिस्तान हिस्सा नहीं ले पाया। पाकिस्तान की राजनीतिक पार्टियां इस बात को दरकिनार कर गईं, कि राजनीतिक संबंध दो देशों के सरकारों के बीच होती हैं, दो देशों की राजनीतिक पार्टियों के बीच नहीं।

औकात से ज्यादा देता है कर्ज

औकात से ज्यादा देता है कर्ज

रिपोर्ट में पता चला है कि, चीन ने विश्व के 50 देशों को उनकी जीडीपी का 15 प्रतिशत से ज्यादा कर्ज दे रखा है और दुनिया के आठ देशों को उनकी जीडीपी का 45 प्रतिशत से ज्यादा कर्ज दे रखा है और एक्सपर्ट्स कहते हैं कि ये देश अब पूरी तरह से चीन के 'गुलाम' बन चुके हैं। पाकिस्तान को चीन ने उसकी जीडीपी का 50 प्रतिशत से ज्यादा कर्ज दे दिया है, जिसे पाकिस्तान के लिए चुकाना नामुमकिन हो चुका है। इसके साथ ही अब चीन ने अपनी मर्जी के हिसाब से पाकिस्तान की सरकार को भी चलाना शुरू कर दिया है और पाकिस्तान के पत्रकार दबी जुबान में अब ये बात स्वीकारने लगे हैं, कि आने वाले वक्त में चीन पाकिस्तान के गले में फंदा कस सकता है और पाकिस्तान के पास बच निकलने का कोई ऑप्शन नहीं होगा।

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