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चीन का गला घोंटने के लिए भारत की क्‍या है तगड़ी तैयारी? चोकप्वाइंट में चूहे की गर्दन की तरह फंसेगा 'ड्रैगन'

India-China News: दक्षिण चीन सागर और हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) को जोड़ने वाले मलक्का स्ट्रेट, जिसे चीन के लिए चोक प्वाइंट माना जाता है, उसके एंट्री प्वाइंट पर स्थित अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के लिए भारत ने शानदार प्लान बनाया है 9 अरब डॉलर की लागत से प्रोजेक्ट्स लॉंच किए हैं, जिसका मकसद इस क्षेत्र को शिपिंग केंद्र और पर्यटन स्थल बनाना है।

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, भारत की रणनीति का एक अनिवार्य हिस्सा बनकर उभर रही है, ताकि इंडो-पैसिफिक में चीन के बढ़ते प्रभुत्व को संतुलित किया जा सके।

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पिछले एक दशक में, हिंद महासागर में चीनी नौसेना के सतही जहाज और पनडुब्बियां अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं, जो भारत के लिए खतरा बनता जा रहा है। 1962 में, जब भारत और चीन ने अपना पहला खूनी युद्ध लड़ा था, तो उस वक्त हिंद महासागर में चीन की एक पनडुब्बी देखी गई थी, जिसके बाद भारत सरकार ने द्वीपों पर 150 नाविकों की एक टुकड़ी को मंजूरी दी थी।

हिंद महासागर की सुरक्षा क्यों है जरूरी?

मलक्का स्ट्रेट, जो हिंद महासागर में दाखिल होने का दरवाजा है, भारत ने वहीं पर चीन की गर्दन दबोचने की योजना बनाई है।

हिंद महासागर में आने वाली चीनी पनडुब्बियों को संकीर्ण मलक्का जलडमरूमध्य में सतह पर आने के लिए मजबूर होना पड़ता है। और यह देखते हुए, कि अंडमान-निकोबार के 572 द्वीपों में से सिर्फ 37 द्वीपों पर ही लोग रहते हैं, इन द्वीपों के आसपास सुरक्षा उपायों को बढ़ाने की मांग में तेजी आई है।

कारगिल युद्ध के बाद, जब पाकिस्तानी घुसपैठिए भारतीय क्षेत्र में घुस आए और खाली चौकियों पर कब्जा कर लिया, तो भारतीय सेना को एहसास हुआ, कि ये द्वीप, जिनमें से कई निर्जन हैं, उन क्षेत्रों पर भी आक्रामक दुश्मन कब्जा करने के लिए आगे आ सकते हैं और अगर इन द्वीपों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो ये द्वीप असुरक्षित हो सकते हैं और फिर भारत सरकार ने पहली त्रि-सेवा कमान, इस द्वीपसमूह पर स्थापित की गई थी।

भारतीय और प्रशांत महासागर के संगम पर स्थित, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक रूप से अहम द्वीप श्रृंखलाओं में से एक कहा जाता है। 572 द्वीपों में से सबसे उत्तरी बिंदु म्यांमार से सिर्फ 22 समुद्री मील दूर है, और इसका सबसे दक्षिणी बिंदु इंडोनेशिया से सिर्फ 90 समुद्री मील दूर है।

ये द्वीप बंगाल की खाड़ी, सिक्स डिग्री और टेन डिग्री चैनलों को नियंत्रित करते हैं, जिनका उपयोग 60,000 से ज्यादा वाणिज्यिक जहाज वैश्विक कारोबार के लिए करते हैं।

कैंपबेल बे के लिए जो प्लान भारत सरकार ने तैयार किया है, वो ट्रांस-शिपमेंट हब मलक्का जलडमरूमध्य और यूरोप, अफ्रीका और एशिया को जोड़ने वाले पूर्व-पश्चिम शिपिंग मार्ग के करीब होगा।

भारत सरकार का प्रोजेक्ट क्या है?

भारत की मुख्य भूमि से 1200 किलोमीटर से कुछ ज्यादा दूरी पर स्थित इस द्वीप श्रृंखला का सबसे बड़ा फायदा यह है, कि यह मलक्का जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण चोक पॉइंट को कंट्रोल करता है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त शिपिंग लेन में से एक है। इसलिए, भारत द्वीपसमूह में अपनी स्थिति को मजबूत करने और एक स्थिर इंडो-पैसिफिक बनाए रखने की तलाश कर रहा है।

अंडमान-निकोबार के लिए भारत का प्रोजेक्ट क्या है, इसका एक प्लान भारत के जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय ने अपने ट्विटर हैंडल पर शेयर किया है।

मार्च 2021 में, नीति आयोग ने 'अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में ग्रेट निकोबार द्वीप का समग्र विकास' नामक 72,000 करोड़ रुपये की योजना का अनावरण किया था। इसमें एक इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, एक इंटरनेशनल एयरपोर्ट, एक बिजली संयंत्र और एक टाउनशिप का निर्माण शामिल है। इस परियोजना को अंडमान और निकोबार द्वीप समूह एकीकृत विकास निगम (ANIIDCO), जो एक सरकारी उपक्रम है, वो अंजाम देगा।

हालांकि, परियोजना की मंजूरी ने पर्यावरणविदों के बीच चिंता पैदा कर दी है, कि परियोजना क्षेत्र के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगी।

यहां के वर्षावन और समुद्र तट, कई लुप्तप्राय और स्थानिक प्रजातियों के घर हैं, जिनमें विशाल चमड़े का कछुआ, निकोबार मेगापोड, ग्रेट निकोबार क्रेक, निकोबार केकड़ा खाने वाला मैकाक और निकोबार ट्री शू शामिल हैं। इसका क्षेत्रफल 910 वर्ग किलोमीटर है और इसके तट पर मैंग्रोव और पांडन वन हैं। यह दो जनजातियों का घर है- शोम्पेन और निकोबारी। ये द्वीप के एकमात्र निवासी थे, जब तक कि सरकार ने 1969 से 1980 तक द्वीपों पर 330 पूर्व-सैनिक परिवारों को बसाकर सात राजस्व गांव स्थापित नहीं किए।

वर्तमान में, ग्रेट निकोबार द्वीप, लिटिल निकोबार और अन्य छोटे द्वीपों सहित दक्षिणी निकोबार की आबादी 8,000 से कुछ ज्यादा है। इस मेगा परियोजना से 30 वर्षों में लगभग 400,000 लोग और द्वीप पर आएंगे। अनुमान है, कि इस परियोजना के लिए जीएनआई के प्रागैतिहासिक वर्षावनों में 8.5 लाख पेड़ काटे जाएंगे।

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अंडमान-निकोबार का सैन्यीकरण

भारत में पहले से ही पोर्ट ब्लेयर और कार निकोबार में दो हवाई अड्डे हैं, और भारतीय नौसेना उत्तर में शिबपुर (आईएनएस कोहासा के रूप में कमीशन) में एक लंबा रनवे बना रही है।

भारत सरकार 10 साल के बुनियादी ढांचे के विकास के हिस्से के रूप में द्वीपों की सैन्य संपत्तियों का विकास कर रही है। बड़े विमानों के ऑपरेशन के लिए दक्षिण में कैंपबेल बे (आईएनएस बाज़) रनवे को 10,000 फीट तक बढ़ाया जाएगा। कामोर्टा में एक और 10,000 फीट का रनवे बनाने की भी योजना है।

भारत इन द्वीपों पर अपने सुखोई Su-30MKI और जगुआर मैरीटाइम फाइटर जेट तैनात कर रहा है। भारतीय नौसेना के पोसिडॉन सबमरीन हंटर्स P-8I भी यहीं से ऑपरेट होते हैं। सैन्य बुनियादी ढांचे का विकास इन परिसंपत्तियों की स्थायी तैनाती को सक्षम करने के लिए किया जा रहा है।

पूर्व भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल डीके जोशी को 2017 में द्वीपों के लेफ्टिनेंट गवर्नर के रूप में नियुक्त किया गया था, ताकि द्वीपों के विकास की सुरक्षा, आर्थिक और वाणिज्यिक क्षमता और सीमाओं को बढ़ावा दिया जा सके।

चीन की गर्दन को कैसे कुचला जा सकता है?

पूर्व भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश ने यूरेशियन टाइम्स में लिखा है, कि यहां तैनात सैन्य प्रॉपर्टी को मजबूत करने की आवश्यकता है, क्योंकि "इन जल क्षेत्रों में चीनी नौसेना (PMLN) के युद्धपोतों, पनडुब्बियों और रिसर्च/खुफिया जानकारी जुटाने वाले जहाजों के लगातार आने से परमाणु हमला करने वाली पनडुब्बियों सहित चीनी नौसेना की निरंतर उपस्थिति का संकेत मिलता है।"

पूर्व भारतीय नौसेना प्रमुख ने तर्क दिया है, कि "लिहाजा भारतीय नौसेना को अंडमान और निकोबार में पर्याप्त पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता बनाए रखने की आवश्यकता होगी।"

उन्होंने आगे कहा, "दुश्मनों की घुसपैठ की संभावना को कम करने के लिए, एएनसी (अंडमान और निकोबार कमांड) को रडार, विमान, सैटेलाइट और मानव रहित वाहनों सहित नेटवर्क परिसंपत्तियों के माध्यम से तीन आयामी समुद्री डोमेन जागरूकता बनाए रखने की आवश्यकता होगी। कमांड को पर्याप्त रक्षात्मक और आक्रामक गोलाबारी के साथ-साथ उभयचर और एयरलिफ्ट क्षमताओं के साथ तत्काल प्रतिक्रिया बलों के साथ निवेश किया जाना चाहिए।"

अंडमान और निकोबार कमान समय-समय पर संयुक्त समुद्री अभ्यास जैसे कि सिम्बेक्स, सिंगापुर-भारत समुद्री द्विपक्षीय अभ्यास आयोजित करती है। भारतीय सेनाएं इस क्षेत्र में सबसे बड़ा नौसैनिक अभ्यास मिलन भी आयोजित करती हैं। हाल ही में, भारत ने सात दूरदराज के द्वीप श्रृंखलाओं को हाई-स्पीड इंटरनेट कनेक्शन प्रदान करने के लिए चेन्नई-अंडमान और निकोबार अंडरसी इंटरनेट केबल का उद्घाटन किया है। साझेदार देशों के नौसैनिक जहाज अक्सर दक्षिण चीन सागर में प्रवेश करने या बाहर निकलने से पहले अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में रुकते हैं।

जापान, जिसने द्वितीय विश्व युद्ध तक इन द्वीपों पर नियंत्रण रखा था, इन द्वीपों के सामरिक महत्व को समझता है। 2022 में, जापान अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (JICA) ने भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में बिजली आपूर्ति परियोजना के लिए 4,016,000,000 जापानी येन (लगभग 133 मिलियन अमेरिकी डॉलर) तक की सहायता प्रदान करने का निर्णय लिया। फरवरी 2024 तक पूरा होने के बाद, यह परियोजना द्वीपों को स्वच्छ, नवीकरणीय ऊर्जा प्रदान करेगी। लिहाजा, भारत ने चीन के गर्दन को उसी तरह से फांसने की योजना बनाई है, जैसे चूहे को मारने वाली मशीन, उनके गर्दन को एक ही झटके में तोड़ देती है।

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