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चीन को भारत पर हमले का भेजा था संदेश... कुख्यात अमेरिकी डिप्लोमेट हेनरी किसिंजर का 100 साल की उम्र में निधन

Henry Kissinger Dies: विवादास्पद नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और शीर्ष अमेरिकी राजनयिक हेनरी किसिंजर, जिन्होंने राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और गेराल्ड फोर्ड के कार्यकाल में अमेरिकी विदेश नीति को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उनका बुधवार को कनेक्टिकट में उनके घर में निधन हो गया। वह 100 वर्ष के थे। उनकी कंसल्टिंग कंपनी, किसिंजर एसोसिएट्स इंक ने उनकी मृत्यु की घोषणा की, लेकिन कोई कारण नहीं बताया।

हेनरी किसिंजर वो डिप्लोमेट थे, जो एक ही समय में व्हाइट हाउस के राज्य सचिव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार दोनों के रूप में काम करते थे और ऐसा करने वाले वो एकमात्र अमेरिकी डिप्लोमेट रहे हैं। उन्होंने उत्तरी वियतनाम के साथ पेरिस शांति समझौते, अपने अरब पड़ोसियों के साथ इज़राइल के संबंधों का विस्तार, अमेरिकी-सोवियत हथियार नियंत्रण वार्ता और 1970 के दशक की शुरुआत में चीन के साथ अमेरिका के राजनयिक संबंधों को खोलने सहित कई प्रमुख विश्व घटनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

Henry Kissinger death

शुरुआती जीवन

जर्मनी के फर्थ में एक यहूदी परिवार में साल 1938 में जन्मे हेंज अल्फ्रेड किसिंजर अपने परिवार के साथ अमेरिका चले गए, क्योंकि नाजी शासन यूरोप में सत्ता हासिल कर रहा था। वह 1943 में अमेरिका के स्वाभाविक नागरिक बन गए और उन्होंने अपने पहले नाम का अंग्रेजी संस्करण अपनाया।

किसिंजर ने द्वितीय विश्व युद्ध में यूरोप में सेना में सेवा की, जिसके बाद उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से मास्टर डिग्री और डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की, और 17 वर्षों तक फैकल्टी मेंबर बने रहे।

विवादास्पद रहा कार्यकाल

वह 1968 में व्हाइट हाउस के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन के अभियान में शामिल हुए और खूनी वियतनाम युद्ध में अमेरिकी लाइन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वियतनाम और बाद में कंबोडिया में उनकी नीतियों की मानवाधिकारों पर अमेरिकी रणनीतिक हितों को प्राथमिकता देने के लिए आलोचना की गई है।

वॉशिंगटन पोस्ट ने लिखा है, कि "आलोचकों ने डॉ. किसिंजर को 1969 में तटस्थ कंबोडिया पर 'गुप्त बमबारी' और अगले वर्ष उस देश पर अमेरिकी जमीनी हमले के लिए जिम्मेदार ठहराया, जिसने दक्षिण पूर्व एशिया में संघर्ष का विस्तार किया और जानलेवा खमेर रूज द्वारा देश पर कब्ज़ा कर लिया।"

अपने कार्यकाल के दौरान, उन पर साइप्रस और चिली सहित दुनिया भर में कई तख्तापलटों करवाने और 1971 से पहले तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तान के युद्ध अपराधों और सैन्य कार्रवाई का समर्थन करने का आरोप लगा। इसके अलावा, उनके आलोचकों ने उन्हें युद्ध अपराधी तक करार दिया है।

'एंडिंग द वियतनाम वॉर' नामक अपनी किताब में, किसिंजर ने लिखा है, कि "इतिहास केवल दुर्लभतम परिस्थितियों में ही स्पष्ट विकल्प प्रस्तुत करता है। अधिकांश समय, राजनेताओं को अपने मूल्यों और अपनी आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाना चाहिए, या इसे दूसरे तरीके से कहें तो, वे अपने लक्ष्यों को एक छलांग में नहीं, बल्कि चरणों में प्राप्त करने के लिए बाध्य होते हैं, प्रत्येक परिभाषा पूर्ण मानकों द्वारा अपूर्ण होती है। जिम्मेदारियों से पीछे हटने के बहाने के रूप में, या अपने ही समाज पर दोषारोपण करने के बहाने के रूप में उस अपूर्णता का आह्वान करना हमेशा संभव है।"

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चीन को भारत के खिलाफ उकसाया

हेनरी किसिंजर ही हो डिप्लोमेट थे, जिन्होंने अमेरिका और चीन की दोस्ती करवाई और उन्हीं की मध्यस्थता के बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने चीन का ऐतिहासिक दौरा किया था। इसके बाद ही, अमेरिका, जो उस वक्त तक ताइवान को एक देश के तौर पर मान्यता देता था, उसने ताइवान से देश का दर्जा छीन लिया और वन चायना पॉलिसी को अपना लिया।

जब 1971 में बांग्लादेश युद्ध में पाकिस्तान के खिलाफ भारत खड़ा हो गया था, उस वक्त अमेरिका खुलकर पाकिस्तान का समर्थन कर रहा था और उसने पाकिस्तान की मदद के लिए अपने सातवें बेड़े को भेज दिया। अमेरिका उस वक्त भारत पर हमला करने वाला था, लेकिन भारत की मदद के लिए तत्कालीन सोवियत संघ ने अपने 21वें बेड़े को भेज दिया और फिर अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर को समुद्र में घेर लिया गया।

लेकिन, उस वक्त की एक घटना और घटी थी। चीन उस युद्ध से दूर रहा था, लेकिन अमेरिका ने उस युद्ध में चीन को लाने की कोशिश की थी। अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्शन ने हेनरी किसिंजर से कहा था, कि वो चीन से कहे, कि वो भारत के खिलाफ अपनी कुछ सेना को भेजे।

अमेरिकी विदेश विभाग में इस घटना का जिक्र किया गया है, कि किसिंजर ने राष्ट्रपति निक्सन के संदेश को चीन तक पहुंचाया था, और चीन को आश्वासन दिया गया था, कि अगर भारत की मदद करने वाला रूस, अगर चीन पर हमला करता है, तो अमेरिका चीन का साथ देगा।

संदेश मिलने के बाद चीन भारत पर हमला करने के लिए तैयार भी हो गया है और चीनी अधिकारियों ने इस बाबत न्यूयॉर्क में बैठक करने के लिए अमेरिकी अधिकारियों को संदेश भी भेजा।

लेकिन, राष्ट्रपति निक्सन और उनके विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर को उस वक्त अहसास हुआ, कि ऐसा करने में सोवियत संघ परमाणु बम का इस्तेमाल कर सकता है और इससे अमेरिका खत्म तक हो सकता है। लिहाजा, वो अपने इस प्लान से पीछे हट गये, क्योंकि उस वक्त माना जाता था, कि चीन को खत्म करने का सोवियत संघ कोई बहाना खोज रहा है और अगर, चीन भारत पर हमला करता, तो फिर सोवियत संघ को चीन पर हमला करने का मौका मिल जाता।

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