प्रचंड गर्मी से टूट गया पीओके का ऐतिहासिक हुंजा वैली पुल, पाकिस्तान से चीन जाने का रास्ता बंद
कोलंबिया यूनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया था कि, साल 1975 से साल 200 तक हिमायल से जितनी बर्फ पिघली है, उतनी बर्फ सिर्फ पिछले दो सालों में पिघल चुकी है..
इस्लामाबाद, मई 11: भीषण गर्मी की वजह से कोई पुल कैसे टूट सकता है, ये सोचना आश्चर्यजनक जरूर हो सकता है, लेकिन पीओके से चीन को जोड़ने वाले एतिहासिक हुंजा वैली पुल टूटने के लिए भीषण गर्मी ही जिम्मेदार है। इस वक्त भारत और पाकिस्तान समेत पूरा दक्षिण एशिया प्रचंड गर्मी और हीटवेभ से परेशान है और इसी वजह से हसनाबाद ब्रिज शनिवार को टूट गया।

प्रचंड गर्मी से टूटा पुल
पीओके के गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र में ऐतिहासिक हसनाबाद ब्रिज शनिवार को एक हिमनद झील से बाढ़ के पानी के कारण टूट गया है। दरअसल, भीषण गर्मी की वजह से हिमनद में भरा बर्फ पिघलने लगा, जिसकी वजह से भीषण बाढ़ आ गई, जिसकी चपेट में आने से काराकोरम राजमार्ग पर बना पुल पाकिस्तान के उत्तरी भाग में शिस्पर पर्वत के पास स्थित है, वो शिस्पर ग्लेशियर के बाढ़ के पानी में बह गया। पुल टूटने का एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें साफ तौर पर देखा जा सकता है, कि ये पुल किस तरह से भरभराकर टूट गया।

गर्मी से पिघला ग्लेशियर
बताया जा रहा है कि गर्मी के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं जिससे जल स्तर बढ़ रहा है, जिससे बाढ़ आ रही है। पाकिस्तान के संघीय मंत्री जलवायु परिवर्तन और सीनेटर शेरी रहमान द्वारा साझा किए गए एक वीडियो में जल स्तर बढ़ने पर पुल के ढहते और गिरते हुए नाटकीय दृश्य दिखाई दे रहे हैं। पुल के बह जाने पर पुल के पास खड़े लोगों को दूर जाने के लिए कहा जा रहा है। उन्होंने लिखा है कि, 'कुछ दिनों पहले जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने चेतावनी दी थी, कि उच्च तापमान के कारण पाकिस्तान पर गहरा असर पड़ेगा। केकेएच पर हसनाबाद ब्रिज, हिमनद झील के पिघलने से शिस्पर ग्लेशियर के पिघलने से बाढ़ (जीएलओएफ) के कारण ढह गया, जिसके कारण पुल टूट गया है'। हालांकि, उन्होंने कहा है कि, फिलहाल एक अस्थाई पुल का निर्माण 48 घंटों के अंदर कर दिया जाएगा।
पीओक-चीन का संपर्क टूटा
चीन से टूटा सड़क संपर्क
ऐतिहासिक हुंजा वैली पुल टूटने की वजह से पीओके से काराकोराम वैली होकर चीन जाने वाली सड़क का संपर्क टूट गया है और चूंकी ये दुनिया की सबसे ऊंची सड़कों में से एक माना जाता है, लिहाजा ये हमेशा से आकर्षण का केन्द्र रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस पुल का निर्माण चीन की तरफ से तिया गया था और चूंकी उस क्षेत्र में कई हिम ग्लेशियर हैं और इस बार पिछले एक महीने से प्रचंड गर्मी पड़ रही है, लिहाजा ग्लेशियर काफी तेजी के साथ पिघलते जा रहे हैं और निचले इलाके में रहने वाले लोगों की जान लगातार सांसत में पड़ रही है। वहीं, पाकिस्तान की सीनेटर शेरी रहमान ने कहा कि, जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए वैश्विक नेताओं की मजबूत पहल जरूरी है, क्योंकि अब इसका असर दिखने लगा है।

हिमालय को लेकर भी चेतावनी
आपको बता दें कि, पिछले साल मई महीने में ही कोलंबिया यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च में हिमालय को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की गई थी और कोलंबिया यूनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया था कि, साल 1975 से साल 200 तक हिमायल से जितनी बर्फ पिघली है, उतनी बर्फ सिर्फ पिछले दो सालों में पिघल चुकी है। कोलंबिया यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 40 सालों में हिमालय पर मौजूद 650 ग्लेशियर का अध्ययन किया गया है। ये ग्लेशियर हिमालय पर 2 हजार किलोमीटर के दायरे में पश्चिम से पूर्व दिशा की तरफ फैले हुए हैं। इस रिसर्च के बारे में बताते हुए कोलंबिया यूनिवर्सिटी के रिसर्चर जोशुआ मॉरेर ने कहा था कि 'यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि हिमालय ग्लेशियर इतनी तेजी से क्यों पिघल रही है और इसकी रफ्तार के बारे में भी पता नहीं चल पा रहा है, लेकिन इसकी रफ्तार बहुत बड़े खतरे की तरफ इशारे कर रही है। साल 2000 से पहले ग्लेशियर के पिघलने की रफ्तार हर साल 0.25 मीटर था, जो साल 2000 के बाद बढ़कर आधा मीटर हर साल हो गई। और ये काफी बड़ा खतरा है।'

पिघल रहे हैं दुनियाभर के ग्लेशियर
दुनियाभर में करीब 2 लाख से ज्यादा बड़े ग्लेशियर हैं और ग्लोबल वार्मिंग की वजह से करीब करीब हर ग्लेशियर में मौजूद बर्फ ने पिघलना शुरू कर दिया है। ग्लेशियर को ही धरती के लिए मीठे पानी का भंडार कहा जाता है और ग्लेशियर से पिघलने वाली बर्फ से जो पानी मिलता है, उसपर करोड़ों लोगों की जिंदगी निर्भर करती है। लेकिन, पिछले कुछ सालों में धरती पर कार्बन उत्सर्जन, जीवाश्म ईंधनों का बेतहाशा इस्तेमाल हुआ है, जिसकी वजह से ओजोन परत में छेद भी हुआ है और इसका असर सीधे ग्लेशियर पर पड़ता है। जिसको लेकर इंटरगवर्मेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज ने दो महीने पहले रिपोर्ट दी थी कि इस सदी के अंत कर हिमालय के ग्लेशियर अपनी एक तिहाई बर्फ को खो देंगे और अगर दुनिया में प्रदूषण इसी रफ्तार से बढ़ती रही तो साल 2100 तक यूरोप के 80 प्रतिशत ग्लेशियर पूरी तरह से पिघल जाएंगे और लोगों के प्यासे मरने की नौबत आ जाएगी।












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