Global warming: तोते से चमगादड़ तक बदलने लगे हैं रूप, जलवायु परिवर्तन का भयावह अंजाम शुरू
ग्लोबल वार्मिंग ने अपनी भयानकता के खतरनाक नतीजे दिखाने शुरू कर दिए हैं। दुनिया भर में कई प्रजानियों के अंगों में परिवर्तन आ चुका है। आर्कटिक के बर्फ को लेकर भी चौंकाने वाला शोध हुआ है।

ग्लोबल वार्मिंग को लेकर दुनिया भर के वैज्ञानिक जो भयावह आशंका जताते रहे हैं, वह अनुमान से पहले ही दस्तक देने लगे हैं। ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन को लेकर कुछ नए शोध हुए हैं, जिसके नतीजे आशंका से भी ज्यादा खतरनाक नजर आ रहे हैं। यह हर मोर्चे पर है और धरती के हर क्षेत्र में हो रहा रहा है।

ग्लोबल वार्मिंग से कुछ पशु-पक्षियों में हुआ बदलाव
ज्यादा गर्मी की वजह से ग्लेशियर पिघलने का सारा पूर्वानुमान पहले से ही धाराशायी हो रहा है। अब पता चला है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते पशु-पक्षियों का आकार-प्रकार भी बदलना लगा है और कुछ के तो बदल भी चुके हैं। यह स्थिति दुनिया के सबसे ठंडे जलवायु में भी देखी गई है और गर्म स्थानों पर भी देखी जा रही है।
कुछ पशु-पक्षियों के अंगों में दिख रहा है परिवर्तन
द टाइम्स हब वेबसाइट ने एक रिपोर्ट दी है, जिसमें एक नए शोध के हवाले से बताया गया है कि दुनिया भर के कुछ प्रजाजियों का रूप-रंग ग्लोबल वार्मिंग की वजह से पहले ही बदल चुका है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि इसके असर से कुछ जानवरों और पक्षियों के शरीर के अंगों में बदलाव आ चुके हैं।

धरती के भविष्य के लिए बहुत बड़े खतरे की घंटी!
इस शोध के अनुसार प्रजातियों में इस प्रकार का बदलाव धरती के किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। यह आर्कटिक के ध्रुवीय क्षेत्र में भी हो रहा है तो आस्ट्रेलिया के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में भी नजर आ रहा है। हालांकि, पशु-पक्षियों की जिन प्रजातियों में ग्लोबल वार्मिंग की वजह से बदलाव हुआ है, वह तात्कालिक तौर पर बहुत प्रभाव डालने वाला नहीं है, लेकिन खतरे की बहुत बड़ी घंटी जरूर है।

इन जीवों के शरीर में हुआ बदलाव
इस शोध के अनुसार ऑस्ट्रेलियाई प्रजाति के दो तोतों- बैंडिट कॉकाटू और रेड पैरट की चोंच करीब 10% बड़ी हो गई है। इसी तरह अलास्का में पाए जाने वाले छोटे छछूंदर की पूंछ लंबी हो गई है और उसपर कुछ खास चिन्ह उभर आए हैं। इसी तरह राउंड-लीफ बैट्स (चमगादड़ की एक प्रजाति) के पंख भी 1.64% तक बढ़ चुके हैं।

आर्कटिक का सारा बहत हुआ बर्फ इसी दशक में पिघल जाएगा-शोध
उधर एक और वैज्ञानिक शोध के नतीजे हालात की भयानकता की पुष्टि करने के लिए काफी है। न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी खबर के मुताबिक चालू दशक में ही ऐसा पहली बार होगा कि आर्कटिक सागर में तैरने वाला सारा का सारा बर्फ पिघल जाएगा। यह पहले हुई रिसर्च में जाहिर किए गए अनुमानों से एक दशक पहले होने जा रहा है। इस शोध की पुष्टि के बाद इसे मंगलवार को प्रकाशित किया गया है।

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ग्रीनहाउस उत्सर्जन में कमी से भी नहीं होगा असर-शोध
इस शोध के नतीजो की भयानकता का अंदाजा इसी बात से लगता है कि इसमें कहा गया है कि आर्कटिक में चालू दशक में जलवायु परिवर्तन की वजह से जो कुछ होने वाला है, वह तब भी होकर रहेगा, चाहे अभी जितना ग्रीनहाउस उत्सर्जन हो रहा है, उससे कम करने में भी दुनिया सफल हो जाए।

आर्कटिक पिघलने का दिखेगा चेन रिएक्शन
समंदर में जो बर्फ तैरती रहती है, वह सोलर रेडिएशन को वापस अंतरिक्ष में भेजने का बहुत ही बड़ा प्राकृतिक उपाय है। अगर वहां बर्फ कम होगी तो इसका परिणाम ये होगा कि आर्कटिक सागर और तेजी से गर्म होना शुरू हो जाएगा। इसका चेन रिएक्शन निश्चित है। इसके परिणामस्वरूप ग्रीन लैंड में मौजूद बर्फ की चादरें और तेरी से पिघलनी शुरू हो जाएंगी और दुनिया भर में समुद्र का स्तर भी उतनी ही तेजी से बढ़ने लगेगा।

दुनिया भर के मौसम पर दिखेगा असर-शोध
अभी उत्तरी ध्रुव और भूमध्य रेखा के पास तापमान में जो अंतर है, उसके चलते मध्य अक्षांश में तूफान और हवा की गति प्रभावित होती है। मतलब आर्कटिक के गर्म होने से मौसम की चरम परिस्थियां, जैसे कि बहुत ज्यादा बारिश या हीट वेव्स की घटनाएं उत्तर अमेरिका और यूरोप से लेकर एशिया तक में बढ़ सकती हैं। वैज्ञानिक इसे आने वाले वर्षों के लिए बहुत ही संकटपूर्ण स्थिति का संकेत मान रहे हैं। (तस्वीरें- सांकेतिक)












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