हर डील का बाप! जर्मनी ने भारत को दिया HDW-Class सबमरीन का ऑफर, दोस्त रूस और फ्रांस से मिल चुका है 'धोखा'

Germany-India Submarine Deal: जर्मनी की डिफेंस कंपनी ThyssenKrupp AG ने भारत को HDW श्रेणी की पनडुब्बियों के bigger 214 version की पेशकश की है और भारत सरकार को अब फैसला करना है, कि वो जर्मन कंपनी की इस पेशकश को स्वीकार करती है या नहीं। जर्मन कंपनी का ये ऑफर, भारत के प्रोजेक्ट 75I के तहत है, जिसके तहत भारत ने 6 पारंपरिक पनडुब्बियों के निर्माण के लिए 4.8 अरब डॉलर का बजट रखा हुआ है।

इंडियन नेवी को इस वक्त 24 पारंपरिक पनडुब्बियों की जरूरत है, लेकिन इस वक्त नौसेना के बेड़े में सिर्फ 16 16 पनडुब्बियां ही हैं। इसके अलावा, इनमें से 6 पनडुब्बियों का निर्माण हाल ही में किया गया है, जबकि बाकी की पनडुब्बियां 30 साल से ज्यादा पुरानी हो चुकी हैं और अब वो रिटायर होने के करीब आ चुकी हैं, लिहाजा इंडियन नेवी को हर हाल में जल्द से जल्द पनडुब्बियों की जरूरत है।

Germany-India Submarine Deal

स्कॉर्पीन क्लास की पनडुब्बी के लिए डील साइन करने के बाद उसे प्रोजेक्ट के तहत पनडुब्बियों के इंडियन नेवी के बेड़े में शामिल होने में करीब 11 सालों का वक्त लग गया, लिहाजा अगर प्रोजेक्ट 75I के तहत आज की तारीख में अगल डील साइन भी की जाती है, तो भी उन पनडुब्बियों को इंडियन नेवी के बेड़े में शामिल होने में कम से कम एक दशक का वक्त लग जाएगा।

पनडुब्बी के लिए प्रोजेक्ट 75I क्या है?

वहीं, भारत सरकार के प्रोजेक्ट 75I की सबसे बड़ी शर्त ये है, कि भारत इन पनडुब्बियों को मेक इन इंडिया प्रोजेक्ट के तहत निर्माण चाहती है, यानि जो भी विदेशी कंपनी इस डील को साइन करे, वो भारत में पनडुब्बियों का ना सिर्फ निर्माण करे, बल्कि उसकी टेक्नोलॉजी भी भारत के साथ शेयर करे, लिहाजा इस प्रोजेक्ट के लिए अभी तक कोई कंपनी नहीं मिली है।

भारत सरकार ने इस प्रोजेक्ट के लिए 4.8 अरब डॉलर का बजट रखा है, जिसमें 6 पनडुब्बियों का निर्माण होना है। पहले फ्रांस की एक कंपनी ने इस प्रोजेक्ट को लेकर दिलचस्पी दिखाई थी, लेकिन बाद में फ्रांसीसी कंपनी कम बजट का हवाला देकर डील पर साइन करने से पीछे हट गई थी।

भारतीय रक्ष मंत्रालय ने इस साल जुलाई में एक बार फिर से प्रोजेक्ट 75I के लिए टेंडर निकाला है और रक्षा मंत्रालय ने कहा है, कि उसे पनडुब्बियों को एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (एआईपी) प्रदान करने के अलावा भारतीय शिपयार्डों में उनके निर्माण के साथ साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की भी उम्मीद है।

आपको बता दें, कि एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (एआईपी) टेक्नोलॉजी इसलिए जरूरी है, क्योंकि इससे पनडुब्बियां लंबे समय तक पानी में रह सकती हैं।

वहीं, यूरेशियन टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जर्मन कंपनी थिसेनक्रुप ने कहा है, कि "मौजूदा वेरिएंट-214 एक मानक डिजाइन है, जिसे (भारतीय) नौसेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए कुछ संशोधन की आवश्यकता होगी। यह असामान्य नहीं है। टाइप 209 जो भारत को 80 के दशक के मध्य में जर्मनी से मिला था और उनमें से दो का निर्माण भारत में किया गया था, उन्हें भी भारतीय विशिष्टताओं के अनुसार संशोधित किया गया था।"

यानि, जर्मन कंपनी ने इशारा दिया है, कि वो उन पनडुब्बियों का निर्माण चीन और पाकिस्तान को ध्यान में रखकर करने के लिए तैयार है।

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HDW क्लास 214 पनडुब्बियों की खासियत क्या है?

HDW क्लास 214 पनडुब्बियां सिंगल-पतवार, एक-कम्पार्टमेंट वाली पनडुब्बियां हैं, जो HDW क्लास 209 परिवार के डिजाइन सिद्धांतों और HDW क्लास 212A नौकाओं की उत्कृष्ट विशेषताओं को जोड़ती हैं।

टाइप 214, डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों का एक क्लास है, जो विशेष रूप से हॉवल्ड्सवर्के-डॉयचे वेर्फ़्ट जीएमबीएच (एचडीडब्ल्यू) द्वारा निर्यात के लिए विकसित किया गया है। हालांकि, इसमें टाइप 212 की कुछ क्लासीफाइड टेक्नोलॉजी का अभाव है, जैसे कि गैर-चुंबकीय स्टील पतवार, जिससे चुंबकीय विसंगति डिटेक्टर का उपयोग करके पता लगाना मुश्किल हो जाता है।

लेकिन, इस कमी के बाद भी इस पनडुब्बी की गोताखोरी गहराई, मॉड्यूलर हथियार और सेंसर मिक्सर, और पूरी तरह से एकीकृत एआईपी सुविधाएं, एचडीडब्ल्यू क्लास 214 को भारत की नौसैनिक ताकत बढ़ाने के लिए आवश्यक बनाती हैं, क्योंकि चीनी पनडुब्बियां हिंद महासागर क्षेत्र (आईओआर) में अभूतपूर्व तरीके से प्रवेश कर रही हैं।

AIP बैटरी चार्ज के बीच पनडुब्बी की पानी के भीतर रहने की क्षमता को तीन से चार गुना तक बढ़ा देता है, जिससे दुश्मन रडार द्वारा इसे डिटेक्ट करने की संभावना काफी कम हो जाती है। इसके अलावा, AIP टेक्नोलॉजी की वजह से पनडुब्बियों से काफी कम आवाज निकलती है, लिहाजा इसके पकड़े जाने की संभावना भी काफी कम हो जाती है।

लिहाजा जैसे-जैसे हिंद महासागर में चीनी नौसैनिकों की मौजूदगी बढ़ती जा रही है, एआईपी वाली पनडुब्बियां बिना पहचाने उनकी बेहतर निगरानी कर सकती हैं।

जर्मनी ने अपनी पनडुब्बियों पर ईंधन सेल एआईपी सिस्टम को कामयाबी के साथ ऑपरेशनल बना लिया है, जिसका इस्तेमाल इजराइल, जर्मनी और तुर्की भी कर रहे हैं। दक्षिण कोरियाई एआईपी प्रणाली भी जर्मन से विकसित की गई है।

हालांकि, स्पेन की दो कंपनियों ने भी भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर पनडुब्बी बनाने का प्रस्ताव रखा है, जबकि जर्मन कंपनी ThyssenKrupp ने मुंबई स्थित मझगांव डॉकयार्ड लिमिटेड के साथ सहयोग किया है, वहीं, स्पेनिश कंपनी नवंतिया ने निजी शिपयार्ड लार्सन एंड टुब्रो के साथ साझेदारी की है।

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अंडरवॉटर गेम में गेमचेंजर बनना चाहता है भारत

चीन की पनडुब्बी सेना, विश्व शक्तियों को भी उसकी संख्या से आशंकित करती है। इसके जलमग्न बल में 76 प्लेटफार्म हैं, जिसमें 8 एसएसबीएन (बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां), 13 एसएसएन (परमाणु-संचालित अटैक पनडुब्बियां), और 55 एसएसके (डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां) शामिल हैं।

बीजिंग, इंडो-पैसिफिक और विशेष रूप से हिंद महासागर क्षेत्र पर हावी होने के अपने इरादों के साथ आगे बढ़ रहा है। लेकिन, सिर्फ 16 पारंपरिक और एक एसएसबीएन (आईएनएस अरिहंत) के साथ, भारत की पनडुब्बी क्षमता बेहद कम है। रूस से लीज पर ली गई एक एसएसएन अकुला श्रेणी की पनडुब्बी अभी आनी बाकी है।

जबकि, एक सामान्य नौसैनिक नियम यह है, कि ऑपरेशन को अंजाम देने वाले प्रत्येक जहाज के लिए, दो और पनडुब्बियों की जरूरत होती है, इसके अलावा रखरखाव और चालक दल के आराम और प्रशिक्षण कार्यक्रम को बनाए रखने के लिए और ज्यादा संख्याओं की आवश्यकता होती है।

शांतिकाल के दौरान, बेड़े का केवल एक-तिहाई हिस्सा तैनात किए जाने की उम्मीद है। युद्धकाल में ज्यादा से ज्यादा जहाजों को तैनात किया जाता है और वैसी स्थिति के लिए ज्यादा से ज्यादा पनडुब्बियों की जरूरत होती है, जिसकी तैयारी काफी आक्रामक अंदाज में चीन कर रहा है।

चीनी नौसेना न सिर्फ अपने बेड़े में पनडुब्बियों को शामिल करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, बल्कि भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान को भी अत्याधुनिक तकनीक से लैस कर रही है। यानि, भारत को दो तरफा खतरा है।

लेकिन, अगर भारतीय नौसेना में AIP टेक्नोलॉजी से लैस पनडुब्बीयां आ जाती हैं, तो इंडियन नेवी का बेड़ा पाकिस्तान से बेहतर स्थिति में आ जाएगा। पाकिस्तान को चीन के साथ 5 अरब अमेरिकी डॉलर के समझौते के तहत इस साल के अंत तक आठ, 39 A Yuan-class AIP--संचालित पनडुब्बियां मिलने की भी उम्मीद है। यानि, भारत के पास वक्त नहीं है।

भारत-जर्मनी पनडुब्बी समझौता

भारत ने पनडुब्बी-निर्माण तकनीक हासिल करने के लिए 1981 में पश्चिम जर्मनी के HDW से चार प्रकार की 1500 पारंपरिक पनडुब्बियां खरीदीं। लेकिन, भारतीय नौसेना का पनडुब्बी डिजाइन समूह पनडुब्बी को डिजाइन या विकसित करने की क्षमता को अवशोषित नहीं कर सका।

HDW पनडुब्बियों के साथ पांचवीं और छठी पनडुब्बियों को स्वदेशी रूप से बनाने की एक विस्तृत योजना भी शामिल थी। लेकिन, 1987 में रिश्वतखोरी के आरोप में कंपनी को भारत में ब्लैक लिस्ट में डाल दिए जाने के कारण यह परियोजना विफल हो गई।

भारत लंबे समय से जर्मनी, फ्रांस और रूस से यह महत्वपूर्ण तकनीक हासिल करने की कोशिश कर रहा है। 2005 में, भारत ने छह स्कॉर्पीन पारंपरिक पनडुब्बियों के निर्माण के लिए फ्रेंको-स्पैनिश कंसोर्टियम अर्मारिस के साथ एक समझौता किया था।

और पांचवीं स्कॉर्पीन श्रेणी की पनडुब्बी को जनवरी 2023 में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था। लेकिन, ये पनडुब्बियां भी एआईपी टेक्नोलॉजी से लैस नहीं हैं, लिहाजा अब भारत की कोशिश, इन पनडुब्बियों में भी इस टेक्नोलॉजी को फिट करने की है। इस योजना के तहत, स्कॉर्पीन क्लास को एडवांस परीक्षण चरणों में स्वदेशी रूप से विकसित एआईपी टेक्नोलॉजी के साथ जोड़ा जाएगा। (तस्वीरें- इंडियन नेवी- फाइल)

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