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Finland NATO: शीतयुद्ध के समय भी तटस्थ रहा देश ‘फिनलैंडाइजेशन’ छोड़कर क्यों नाटो मेंबर बना?

Finlandization Ends Today: फिनलैंडाइजेशन मास्को और पश्चिम के बीच सख्त तटस्थता की नीति को संदर्भित करता है जिसका फिनलैंड ने शीत युद्ध के दशकों के दौरान पालन किया था।

Finlandization Ends Today

Image: Oneindia

फिनलैंड नाटो का 31वां मेंबर बन चुका है। बीते साल मई महीने में इस नॉर्डिक देश ने फिनलैंड में शामिल होने की इच्छा जताई थी। फिनलैंड के नाटो ग्रुप में शामिल होने की प्रक्रिया एक साल के अंदर पूरी हो गई। इसे हाल के इतिहास में सबसे कम समय में सबसे तेज सदस्यता प्रक्रिया माना जा रहा है। इससे पहले 30 देश नाटो के मेंबर रह चुके हैं मगर फिनलैंड का नाटो सदस्य बनना सबसे हैरत भरी बात मानी जा रही है। दरअसल इसकी वजह ये है कि फिनलैंड भी उन कारणों में से एक है जिसकी वजह से नाटो की स्थापना हुई थी।

विचारधारा की लड़ाई में उलझे देश

दूसरे महायुद्ध के अंत के बाद तत्कालीन सोवियत संघ और अमेरिका के बीच तनाव बहुत बढ़ गया था। अमेरिका अपनी पूंजीवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने में जुटा हुआ था, जबकि सोवियत संघ साम्यवादी विचारधारा को। दोनों का ही मानना था कि उनकी वाली विचारधारा ज्यादा बेहतर है। ये वो दौर था जब यूरोप का पुननिर्माण हो रहा था। यूरोप को लेकर दोनों महाशक्तियों के बीच इसके विभाजन को लेकर भारी मतभेद था। कैपटलिज्म और कम्युनिज्म की इस लड़ाई में अमेरिका ने मार्शल प्लान लाकर ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम, नीदरलैंड और नार्वे सहित 16 यूरोपीय देशों को अपने पाले में कर लिया। वहीं रूस को पूर्वी यूरोपीय देशों का साथ मिला।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बची आखिरी दो शक्तियों के बीच तनाव चल ही रहा था कि 1948 में चेकोस्लावोकिया में कम्युनिस्ट पार्टी ने सत्ता अपने हाथ में ले ली। इससे पहले सोवियत संघ ने अपने पड़ोसी देश फिनलैंड संग भी एक संधि कर ली थी। संधि के मुताबिक सोवियत संघ ने फिनलैंड की सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने हाथ में ली और घरेलू मामले की जिम्मेदारी रखने की स्वतंत्रता दी। इसे ही 'फ़िनलैंडाइजेशन' कहा गया। यही वजह थी कि फिनलैंड ने अमेरिका के मार्शल प्लान के तहत मिलने वाली सहायता को भी ठुकरा दिया। लेकिन चेकोस्लावोकिया में सत्ता पलटने के बाद पश्चिमी देश सतर्क हो गए।

नाटो की स्थापना

अमेरिका को लगा कि रूस की इस चाल से एक-एक कर यूरोपीय देशों में लोकतांत्रिक सरकारें गिरा दी जाएंगी और दुनिया में कम्युनिज्म फैलता जाएगा। अमेरिका की आशंका बढ़ती जा रही थी कि इसी बीच सोवियत संघ ने पूर्वी यूरोप के इलाकों से सेनाएं हटाने से इनकार कर दिया और 1948 में बर्लिन को भी घेर लिया। इसके बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों ने 1949 में नाटो की स्थापना की ताकि सोवियत संघ की विस्तारवादी नीति को रोका जा सके। फिनलैंड ने न तो खुलकर सोवियत संघ के साथ जाना चुना और न ही उसने अमेरिका को नाराज किया। उसने शीत युद्ध के दौरान अपनी 'फिनलैंडाइजेशन' नीति का सख्ती से पालन किया।

नाटो ने तटस्थ रहना चुना

फिनलैंड अपने ऐतिहासिक और भू-राजनीतिक कारणों से अमेरिका संग जुड़ने से घबराता रहा। प्रथम विश्वयुद्ध के खत्म होते ही 9 देश बने थे। फिनलैंड भी उसमें से एक था। फिनलैंड ने 1917 में बोल्शेविक क्रांति के बाद रूस से स्वतंत्रता की घोषणा की थी। उस पर सैकड़ों सालों तक रूसी साम्राज्य का शासन था। आजादी के 22 साल बाद ही 1939 में सोवियत ने फिनलैंड पर हमला कर दिया। इसके बाद वह जर्मनी संग मिलकर सोवियत संघ से लड़ने लगा। लेकिन युद्ध के दौरान ही स्थिति बदल गई और फिर वहीं फिनलैंड, सोवियत संघ के साथ मिलकर नाजी जर्मनी से लड़ रहा था। हालांकि इस युद्ध में फिनलैंड ने अपने कई सैनिक गंवाए थे। ये भी एक वजह है कि फिनलैंड कभी भी रूस पर भरोसा नहीं करता है।

यूक्रेन युद्ध के बाद बदले हालात

यूक्रेन पर आक्रमण ने न सिर्फ फिनलैंड बल्कि स्वीडन को भी चौकन्ना कर दिया। नाटो में शामिल होने के बाद फिनलैंड की सुरक्षा की जिम्मेदारी इसमें शामिल देश उठाएंगे। NATO के आर्टिकल 5 के अनुसार इसके किसी भी सदस्य देश पर हमले करना, नाटो के सभी देशों पर हमला माना जाएगा। उदाहरण के लिए आइसलैंड के पास अपनी सेना नहीं है। लेकिन फिर भी उसे किसी देश से खतरा नहीं है।

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