INS Vikrant: इंडियन नेवी की ताकत बढ़ते ही दुनिया ने किया सलाम, दोस्त देश ने दिया बड़ा ऑफर
आज भारत की ताकत को पूरी दुनिया ने देखा है। दोस्त देश से लेकर दुश्मन देश तक ने। दुश्मन देश पाकिस्तान और चीन से लेकर दोस्त देश ब्रिटेन, अमेरिका और फ्रांस भी भारत की इस नई शक्ति को देख रहा है।
पेरिस/नई दिल्ली, सितंबर 02: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत में बने पहले एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत को इंडियन नेवी के हवाले कर दिया है और इस एयरक्राफ्ट कैरियर के भारतीय नौसेना में शामिल होने के बाद हमारी समुद्री शक्ति में कई गुना इजाफा हुआ है, खासकर हिन्द महासागर में घुसपैठ का इरादा रखने वाले चीन को रोकने में आईएनएस विक्रांत काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला है। लेकिन, इन सबसे बढ़कर सबसे महत्वपूर्ण ये है, कि अब पूरी दुनिया ने भारत की शक्ति को पहचानना और मानना शुरू कर दिया है। अब तक हथियारों को लेकर दूसरे देशों पर निर्भर रहने वाले भारत ने अपने घर में अपनी टेक्नोलॉजी के साथ विशालकाय एयरक्राफ्ट कैरियर का निर्माण किया है। और यही वजह है, कि दोस्त देश ने भारत को बड़ा ऑफर दे दिया है।

कितना शक्तिशाली है विक्रांत?
अमेरिका, चीन, फ्रांस, रूस और ब्रिटेन के बाद अब सिर्फ भारत ही एकमात्र देश है, जिसके पास युद्धपोत बनाने की क्षमता हासिल की है। इस एयरक्राफ्ट कैरियर को पूरी तरह से भारत में ही डिजाइन और निर्माण किया गया है और ये एक विशालकाय युद्धपोत है, जिसकी क्षमता भी काफी ज्यादा है। आईएनएस विक्रांत की लंबाई की बात करें, तो इसकी लंबाई 262 मीटर है और इसकी चौड़ाई 60 मीटर है। वहीं, आईएनएस विक्रांत का वजन 45 हजार टन के करीब है। आईएनएस विक्रांत के निर्माण में चार एफिल टावर के बराबर उन्नत किस्म के लोहे का इस्तेमाल किया गया है और इस युद्धपोत में 2400 किलो केबल का इस्तेमाल किया गया है। आईएनएस विक्रांत में 1700 क्रू मेंबर्स सवार हो सकते हैं और इसमें 2300 कंपार्टमेंट्स हैं और इसकी उच्च क्षमता 28 नॉट है, वहीं इसकी क्रूजिंग स्पीड 18 नॉट है और इसकी सबसे बड़ी खासियत ये है, कि ये एक बार में 7500 किलोमीटर की दूरी बिना रूके तय कर सकता है।
फ्रांस से मिलाा बड़ा ऑफर
आज भारत की ताकत को पूरी दुनिया ने देखा है। दोस्त देश से लेकर दुश्मन देश तक ने। दुश्मन देश पाकिस्तान और चीन से लेकर दोस्त देश ब्रिटेन, अमेरिका और फ्रांस भी भारत की इस नई शक्ति को देख रहा है। भारत में फ्रांस के राजदूत इमैनुएल लेनिन ने ना सिर्फ भारत को आईएनएस विक्रांत के लिए बधाई दी, बल्कि उन्होंने एक खास ऑफर भी दे दिया है। फ्रांस और भारत रणनीतिक पार्टनर हैं और भारत ने पिछले कुछ सालों में फ्रांस से काफी हथियार खरीदे हैं, जिनमें राफेल भी शामिल है। फ्रांस के राजदूत ने भारत को बधाई देते हुए कहा है, कि 'बधाई भारत, आईएनएस विक्रांत को कमीशन कर एयरक्राफ्ट कैरियर निर्माण करने वाले खास देशों के क्लब में शामिल होने के लिए बधाई।' फ्रांसीसी राजदूत ने आगे कहा कि, 'फ्रांस अब इस बात का इंतजार कर रहा है, कि आईएनएस विक्रांत अब फ्रांसीसी एयरक्राफ्ट कैरियर एफआर चार्ल्स डी गुले के साथ इंडो-पैसिफिक में एक साथ एक्शन पर निकले।' फ्रांसीसी राजदूत का ये ट्वीट कई मायनों में खास है, क्योंकि उन्होंने इंडो-पैसिफिक शब्द का इस्तेमाल किया है, जहां पर चीन के दखलअंदाजी को रोकने के लिए भारत, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और जापान ने मिलकर क्वाड का निर्माण कर रखा है, तो फिर क्या इंडो- पैसिफिक में भारत को नया साथी मिल गया है?

इंडो-पैसिफिक में फ्रांस का साथ
भारत के लिए इंडो-पैसिफिक काफी ज्यादा महत्वपूर्ण है और इंडो-पैसिफिक में फ्रांस एक ऐसी शक्ति है, जिसके भारत और प्रशांत महासागर, दोनों तरफ के क्षेत्र मौजूद हैं और इन क्षेत्रों के नाम हैं मैयट और ला रे संघ द्वीप, स्कैटर्ड द्वीप समूह, फ्रांसीसी दक्षिण और अंटार्कटिक क्षेत्र, न्यू कैलेडोनिया, वालिस और फ्यूचूना, फ्रेंच पोलिनेशिया और क्लिपर्टन। और इन क्षेत्रों में फ्रांस एक विशेष शक्ति है, जिसके करीब 8 हजार सैनिक तैनात हैं। वहीं, इंडो-पैसिफिक में सामरिक भागीदारी को लेकर फ्रांस भारत को एक प्राकृतिक भागीदार मानता है, लिहाजा इंडो-पैसिफिक में फ्रांस और भारत मिलकर एक रणनीतिक साझेदारी के साथ साथ बहुआयामी भूमिका की तरफ आगे बढ़ सकते हैं, इसके साथ ही चीन को रोकने की भी खास योजना तैयार हो सकती है। वहीं, अमेरिका के बाद फ्रांस ही एकमात्र ऐसा देश है, जिसके साथ भारत ने लॉजिस्टिक विनिमय समझौते पर हस्ताक्षर किया हुआ है और दोनों देशों की नौसेना, वायुसेना और थल सेना नियमित युद्धाभ्यास भी करती रहती है। लिहाजा, भारत अब अपनी इस नई शक्ति का इस्तेमासल भी इंडो-पैसिफिक में कर सकता है और दुनिया की बाकी शक्तियां भी भारत की ताकत का अहसास कर पाएंगी।

भारत की नई शक्ति को समझिए
वर्तमान में केवल पांच ही ऐसे देश हैं, जिनके पास विमानवाहक पोत के निर्माण की क्षमता है और भारत भी अब इस प्रतिष्ठित क्लब में शामिल हो गया है। विशेषज्ञों और नौसेना के अधिकारियों ने कहा कि, भारत ने दुनिया के सबसे उन्नत और जटिल युद्धपोतों में से एक माने जाने वाले निर्माण टेक्नोलॉजी की क्षमता हासिल करने के साथ ही आत्मनिर्भरता का प्रदर्शन किया है। हालांकि, भारत के पास पहले भी एयरक्राफ्ट कैरियर थे, लेकिन उनका निर्माण या तो ब्रिटेन ने या फिर रूस ने किया था। भारत के पास मौजूदा एयरक्राफ्ट कैरियर 'आईएनएस विक्रमादित्य', जिसे 2013 में कमीशन किया गया था और जो वर्तमान में नौसेना का एकमात्र विमानवाहक पोत है, उसे तत्कालीन सोवियत संघ ने बनाया था,और उसका शुरूआती नाम 'एडमिरल गोर्शकोव' हुआ करता था।

इंडो-पैसिफिक और भारत
इंडो-पैसिफिक में भारत की बढ़ती ताकत को ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, जापान, फ्रांस, इंडोनेशिया जैसे देश काफी महत्वपूर्ण मानते हैं और ये सभी देश दक्षिण चीन सागर के साथ साथ पूर्वी चीन सागर में भी चीन का मुकाबला करने के लिए भारत को काफी अहम मानते हैं, लिहाजा, भारत भी लगातार इस क्षेत्र में शांति और सुरक्षा स्थापित करने और विकास के कार्यों को बढ़ावा देने के लिए तत्पर है और इंडो-पैसिफिक का खुला, मुक्त और समावेशी रहना भारत के लिए काफी ज्यादा जरूरी है, जिसपर चीन अपना अधिपत्य जमाना चाहता है, लिहाजा भारत को फ्रांस जैसा पार्टनर मिलना इस क्षेत्र में चीन की आवाजाही को नियंत्रित कर सकता है और इसके लिए जरूरी है, कि भारत अपनी नौसेना की शक्ति में विस्तार लाए और आईएनएस इस भूमिका के लिए सटीक साबित होगा।

इंडियन नेवी की समुद्री कूटनीति
हिंदुस्तान टाइम्स के एक लेख के मुताबिक, भारतीय नौसेना को समुद्री कूटनीति की मानसिकता से आगे बढ़ना चाहिए और ऊंचे समुद्रों पर विरोधी का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। इंडियन नेवी को अब सिर्फ फोर्स प्रोजेक्शन और फोर्स एप्लिकेशन की तरफ बढ़ना चाहिए और इसे अगर सामान्य शब्दों में कहें, को भारतीय नौसेना को अब अपने दांत की तेज धार को दिखाने की जरूरत है, क्योंकि थिएटर कराची बंदरगाह की केवल नाकाबंदी से इंडो-पैसिफिक में ट्रांसफर हो गया है और अब ये लड़ाई उस विरोधी के खिलाफ हो गया है, जो दुनिया में नंबर-वन की शक्ति बनना चाहता है और जिसके लिए वो सभी नियम-कायदों की किताब को फाड़कर फेंकने के लिए तैयार है। वो शक्ति अब हिंद महासागर में घुस आया है और श्रीलंका में चीनी राजदूत का बेशर्म और मुंहफट बयान इस बात की गवाही देता है, कि भारत को अब अपनी नीति बदलनी ही होगी। लिहाजा, भारत अगर अपने एयरक्राफ्ट कैरियर के साथ अपनी शक्ति को संतुलित करता है, तो आने वाले वक्त में चीन को भी पीछे धकेलने में काफी मदद मिलेगी।












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