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Galwan Anniversary: गलवान घाटी संघर्ष के चार साल पूरे.. जानिए अब कैसे हैं भारत-चीन सीमा के हालात?

Galwan Anniversary: 15 जून 2020 को पूर्वी लद्दाख के गलवान घाटी की बर्फीली चोटियों भारत और चीन के जवानों के बीच एक खतरनाक खूनी संघर्ष हुआ था और आज उस घटना की चौथी वर्षगांठ है। उस दिन भारतीय सैनिकों पर लोहे की छड़ों और डंडों से हमला किया गया था, जिसकी वजह से भारत ने अपने 20 वीर जवानों को खो दिया।

लेकिन चीन ने कितने सैनिकों को खोया, उसने सार्वजनिक तौर पर सिर्फ 4 सैनिकों की मौत की बात कबूली, लेकिन रूसी एजेंसियों का दावा है, कि चीन के कम से कम 45 से ज्यादा सैनिकों की मौत हुई थी। भारतीय सैनिकों की कमान संभालने वाले कर्नल बी संतोष और उनके 20 बहादुर सैनिकों की शहादत को आज भी लोग नहीं भूले हैं।

Galwan Anniversary

कैसे छिड़ गया था संघर्ष?

हालांकि, उस खूनी संघर्ष में एक भी गोली नहीं चली थी, लेकिन उस झड़प की पटकथा पिछले कई दिनों से लिखी जा रही थी, जब एलएसी पर लगातार दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ रहे थे। चीनी सैनिक लगातार भारतीय सीमा का उल्लंघन कर रहे थे और भारतीय सैनिक कड़ा प्रतिरोध कर रहे थे।

5 और 6 मई 2020 की दरम्यानी रात को लद्दाख के पैंगोंग त्सो में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच पहली झड़प हुई थी और उसके चार दिनों के बाद सिक्किम के नाकू ला में एक और झड़प हुई।

चीन अपनी आक्रामकता को लगातार बढ़ा रहाी था और LAC की यथास्थिति को बदलने की कोशिश कर रहा था, जिसने संघर्ष को बढ़ा दिया। अप्रैल 2020 की शुरुआत में, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने लद्दाख में LAC पर हजारों सैनिकों और हथियारों को जमा करना शुरू कर दिया था। कई समझौतों का उल्लंघन करते हुए सैनिकों की यह भीड़ उस समय जमा हुई, जब भारत कोविड-19 लॉकडाउन से जूझ रहा था।

और फिर जून की शुरुआत में ये तनाव काफी बढ़ गया, जिसके बाद दोनों पक्षों के सैन्य कमांडरों ने गलवान घाटी में एक बफर जोन बनाने के लिए पीछे हटने पर सहमति जताई।

लेकिन, चीन ने भारतीय सैनिकों को धोखा दिया था।

14 जून को जब भारतीय सैनिक यह देखने गए, कि क्या चीनी सेना (पीएलए) वाकई पीछे हट गई है, तो पता चलता है, कि चीनी सैनिकों ने धोखेबाजी की है और उस वक्त चीनी सैनिकों ने भारतीय जवानों पर हमला कर दिया। उस हमले में चीनी सैनिकों के पास लोहे के रॉड थे और उनसे भारतीय सैनिकों पर हमला किया गया।

उस रात हुई हिंसा ने द्विपक्षीय संबंधों पर गहरा असर डाला है, और दोनों देशों के बीच के संबंध काफी खराब हो गये।

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भारत-चीन सीमा विवाद की शुरूआत कैसे हुई?

भारत और चीन के बीच का सीमा विवाद लंबे समय से चला आ रहा है और अभी तक सीमा समस्या का समाधान नहीं हुआ है। चीन, भारत और चीन के बीच सीमा के उस लाइन को स्वीकार नहीं करता है, जो संधियों और समझौतों के जरिए भौगोलिक सिद्धांतों के साथ-साथ दोनों पक्षों के बीच सदियों से ज्ञात ऐतिहासिक मान्यताओं के आधार पर बनाए गये हैं।

चीन ने तिब्बत पर आक्रमण किया और मार्च 1959 में उसे अपने कब्जे में ले लिया, जिसकी वजह से भारत की सीमा चीन के साथ जुड़ गई। तिब्बत पर चीनी कब्जे से पहले भारत और चीन की सीमा नहीं मिलती थी। चीनी आक्रमण पर बढ़ती चिंता ने भारत को अपनी सीमा नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया, क्योंकि चीन भारत का पड़ोसी बन गया। भारत ने 1960 में 'फॉरवर्ड पॉलिसी' लागू की, जिसका मकसद भारतीय क्षेत्र में चीनी घुसपैठ को रोकना था।

भारत के 'फॉरवर्ड पॉलिसी' को काउंटर करने के लिए चीन ने उस क्षेत्र में तेजी के साथ इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास किया और अपनी सैन्य स्थिति को मजबूत किया। जब भारत ने गलवान घाटी में अपने पोस्ट बनाए, तो चीन का रवैया काफी खतरनाक हो गया और उसने भारत के सप्लाई चेन को काटने के लिए जमीनी रास्ते को काटना शुरू कर दिया। और चीनी सेना ने जुलाई 1962 में गलवान घाटी में एक भारतीय ठिकाने को घेर लिया था और दोनों पक्षों के बीच पैंगोंग झील पर पहली बार झड़प हुई थी।

और फिर 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया, जिसके बाद इंटरनेशनल मानदंडों के मुताबिक सीमा विवाद के हल को लेकर किसी भी संभावना को हमेशा के लिए खत्म कर दिया, क्योंकि चीन ने भारत के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया। वहीं, इस मामले को और भी जटिल बनाने के लिए, 1963 में पाकिस्तान ने शक्सगाम घाटी को चीन को सौंप दिया, जो पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में गिलगित बाल्टिस्तान का हिस्सा था।

LAC पर मौजूदा हालात क्या हैं?

अप्रैल 2020 से भारत ने पूर्वी लद्दाख से सटे सीमावर्ती क्षेत्रों में चीन की तरफ से लगातार निर्माण को देखा है और गलवान झड़प के बाद भी चीन ने कई बार मौजूदा स्थिति का उल्लंघन करने की कोशिश की है, जिसका भारत ने करारा जवाब भी दिया है। मई 2020 के मध्य में, चीनी पक्ष ने पश्चिमी क्षेत्र के अन्य हिस्सों में LAC का उल्लंघन करने की कई कोशिशें की थी। इसमें कोंगका ला, गोगरा और पैंगोंग झील का उत्तरी तट शामिल था। लेकिन, चीनी सैनिकों की इन हरकतों का पहले ही पता लगा लिया गया और उन्हें इन क्षेत्रों में आने से रोक दिया गया।

भारत ने कूटनीतिक और मिलिट्री, दोनों माध्यमों से चीनी पक्ष को साफ कर दिया है, कि चीन ऐसी कार्रवाइयों के जरिए यथास्थिति को एकतरफा बदलने की कोशिश कर रहा है और यह भारत को अस्वीकार्य है।

बर्बरता की रात के चार साल बाद भी दोनों देशों के बीच के संबंध तनावपूर्ण बने हुए हैं और तनावपूर्ण गतिरोध के बीच एलएसी पर भारी संख्या में सेनाएं तैनात हैं। भारत LAC से अपने सैनिकों को कम करे, इसीलिए चीन, पाकिस्तान के जरिए LOC पर हमले करवा कर रहा है।

पिछले चार सालों से कोर कमांडर स्तर पर सैन्य और कूटनीतिक वार्ता चल रही है। वार्ता के परिणामस्वरूप कुछ 'टकराव वाले प्वाइंट्स' से सैनिकों की वापसी हुई है, लेकिन आपसी संदेह अभी भी गहरा है।

इन वार्ताओं से कुछ नतीजे मिले हैं, जैसे कि पांच टकराव प्वाइंट्स पर सैनिकों की वापसी हुई है। ये क्षेत्र हैं, पैंगोंग त्सो के उत्तरी और दक्षिणी किनारे, गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स क्षेत्र में गश्त बिंदु 15 और 17ए, और गलवान। हालांकि, पूर्वी लद्दाख में देपसांग मैदान और डेमचोक सहित महत्वपूर्ण क्षेत्रों में गतिरोध अभी भी अनसुलझा है। चीन इन दो क्षेत्रों पर चर्चा करने के लिए तैयार नहीं है, उसका दावा है कि ये "पुराने मुद्दे" हैं, क्योंकि ये अप्रैल 2020 से पहले के हैं और इसलिए मौजूदा वार्ता के दायरे में नहीं आते हैं।

वहीं, दोनों सेनाओं ने एलएसी पर अपनी सैन्य उपस्थिति कम नहीं की है, जो कि ठंड के महीनों में भी बनी हुई है। इस क्षेत्र में भारी हथियारों और उपकरणों की तैनाती में भी महत्वपूर्ण वृद्धि देखी गई है। इसके अलावा, पूरे एलएसी पर जमीनी और हवाई संपर्क बुनियादी ढांचे में सुधार किया जा रहा है। लिहाजा, इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है, कि भविष्य में संघर्ष नहीं हो सकते हैं।

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