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2021 की छह अच्छी ख़बरें

कोरोना
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करोड़ों लोगों के लिए साल 2021 बेहद मुश्किल साल रहा. पूरे साल दुनिया के तमाम देशों से बेहद डरावनी और तकलीफ़देह ख़बरें मिलीं.

लेकिन ऐसा नहीं है कि साल 2021 को केवल बुरी ख़बरों के लिए याद किया जाएगा. बीते साल को कुछ ऐसी ख़बरों के लिए भी जाना जाएगा जिसने हमारे चेहरों पर मुस्कान बिखेरी और दिलों को सुकून पहुंचाया.

बीता साल कुछ अच्छी ख़बरें भी लेकर आया था और उन्हीं ढेरों अच्छी ख़बरों में से कुछ ख़बरें हमने आपके लिए चुनी हैं.

इस कोशिश में हमने तीन अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों और जानकारों से एक सकारात्मक ख़बर चुनने को कहा और साथ ही ये भी कहा कि वो हमें यह बताएं कि आख़िर उन्होंने यह ख़बर क्यों चुनी और उसका क्या महत्व है.

हम आपके सामने ऐसी छह अच्छी ख़बरों को पेश कर रहे हैं-

कोविड-19 के ख़िलाफ़ वैक्सीन कारगर साबित हुई

नेशनल ऑटोनॉमस यूनिवर्सिटी ऑफ़ मेक्सिको के बायोमेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट में बायोकेमिस्ट और इम्यूनोलॉजिस्ट एड्डा स्यूटो के हिसाब से, इस बात में रत्तीभर भी संदेह नहीं है कि साल 2021 की सबसे अच्छी और सकारात्मक ख़बरों में से एक ख़बर यह रही कि कोरोना वायरस प्रतिरक्षा के प्रति अति संवेदनशील है. उनका कहना है कि इस वजह से ये पता चला कि महामारी को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी वैक्सीन का निर्माण किया जा सकता है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "यह इस साल हुई सबसे महत्वपूर्ण बात है क्योंकि ऐसे विषाणु भी होते हैं जो वैक्सीन के प्रति अतिसंवेदनशील नहीं होते और अगर ऐसा कोरोना के मामले में होता तो स्थिति ख़तरनाक हो सकती थी. हमारे लिए मुश्किलें बढ़ सकती थी."

वो मानते हैं कि यही वजह रही कि SARS CoV-2 के ख़िलाफ़ लड़ाई में रिकॉर्ड समय में टीके विकसित करने में कामयाबी हासिल की जा सकी.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 11 मार्च साल 2020 में कोरोना संक्रमण को महामारी घोषित कर दिया था और एक सप्ताह से भी कम समय में पहली एमआरएनए वैक्सीन अपने पहले क्लीनिकल ट्रायल के लिए तैयार थी.

यूएस फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने 11 दिसंबर 2020 को फ़ाइज़र बायोएनटेक की वैक्सीन को मंज़ूरी दे दी थी. और इसके कुछ दिनों बाद ही इसने मॉडर्ना के एक वैक्सीन को भी हरी झंडी दे दी थी.

30 दिसंबर को ब्रिटेन ने ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी और फ़ार्मास्युटिकल कंपनी एस्ट्राज़ेनेका की तैयार वैक्सीन को मंज़ूरी दे दी थी.

इसके साथ-साथ दूसरे देशों में भी वैक्सीन का निर्माण किया जा रहा था. जैसे कि चीन और रूस में. इन वैक्सीन ने लाखों लोगों को कोरोना वायरस के प्रति इम्यून होने में मदद की. अब तक दुनिया के क़रीब 197 देशों में 8 बिलियन से अधिक वैक्सी की डोज़ दी जा चुकी हैं.

https://www.youtube.com/watch?v=jbfhLLdBQfo

ओमिक्रॉन के ख़िलाफ़ लड़ाई

नवंबर महीने में साउथ अफ्रीका में कोरोना का एक नया वेरिएंट ओमिक्रॉन मिला जो अभी भी दुनिया के लिए एक चुनौती है.

पुरानी वैक्सीन इस नए वेरिएंट पर कितनी कारगर साबित होगी यह भी देखा जा रहा है.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ नवारा में माइक्रोबायोलॉजी के प्रोफ़ेसर इग्नासियो लोपेज़ गोनी के अनुसार, "जिन लोगों ने कोरोना वैक्सीन की दोनों डोज़ ले रखी है उनके अस्पताल में भर्ती होने की आशंका कम हैं. भले ही उन्होंने संक्रमण के ख़िलाफ़ अपनी सुरक्षा का कुछ हिस्सा गंवा दिया हो."

उन्होंने अपने एक लेख में इसका उल्लेख भी किया है. उन्होंने लिखा है, "ऐसा इसलिए क्योंकि कोरोना के ख़िलाफ़ तैयार किये गए ज़्यादातर टीके एक सेल्युलर रेस्पॉन्स देते हैं जो इस वेरिएंट से प्रभावित नहीं होते."

हालांकि पब्लिक हेल्थ की प्रोफ़ेसर मेलिसा हॉकिंस के मुताबिक़, कई अध्ययनों में वैक्सीन की तीसरी डोज़ को लेकर उम्मीद जतायी जा रही है कि यह व्यक्ति के प्रतिरक्षा तंत्र को और बढ़ा सकता है, साथ ही ओमिक्रॉन के ख़िलाफ़ सुरक्षा को ये और प्रभावी बनाएगा.

हालांकि ये बात जानना भी ज़रूरी है कि यह बेहद शुरुआती अध्ययनों के आधार पर कहा जा रहा है.

इंपीरियल कॉलेज लंदन के एक विश्लेषण में कहा गया है कि अगर किसी आबादी में सभी को वैक्सीन लग चुकी है तो इससे ओमिक्रॉन से संक्रमित शख़्स के इमरजेंसी वॉर्ड में जाने की आशंका 25 से 30 फ़ीसदी तक कम हो जाती है.

लेकिन एक ओर जहां टीकों की खोज और उनके निर्माण ने दुनिया को राहत की सांस दी है वहीं ग़रीब देशों में टीकों की आपूर्ति की समस्या को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.

पूरे साल साल, विभिन्न मंचों के नेताओं ने दुनिया में समान टीकाकरण के लिए अमीर देशों से अपील की.

https://www.youtube.com/watch?v=5KoHd2d7WYg

मार्च महीने में विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक ने टेड्रोस एडहॉनम गीब्रिएसुस ने अमीर देशों और ग़रीब देशों के बीच टीकाकरण की असमानता को लेकर बयान भी दिया था. उन्होंने कहा था कि यह एक ऐसा अंतर है जो हर रोज़ बढ़ता ही जा रहा है.

सितंबर महीने में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटरेश ने इस असमानता को दुनिया की नैतिक विफ़लता करार दिया था.

बावजूद इसके दक्षिण अमेरिका उपमहाद्वीप 2021 को एक बेहतर डेटा के साथ विदा कर रहा है. यहां कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ सबसे अधिक वैक्सीनेशन हुआ है. जहां की क़रीब 63.4 फ़ीसद आबादी को कोरोना की दोनों डोज़ और 74.3 फ़ीसद आबादी को कम से कम एक डोज़ वैक्सीन मिल चुकी है.

प्रोटीन का थ्री-डायमेंशनल रीप्रेज़ेंटेशन
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प्रोटीन का थ्री-डायमेंशनल रीप्रेज़ेंटेशन

प्रोटीन का थ्री-डायमेंशनल रीप्रेज़ेंटेशन

इसी साल प्रोटीन के थ्री-डायमेंशनल रीप्रेज़ेंटेशन के क्षेत्र में भी सफलता मिली. इस सफलता की कई वैज्ञानिकों ने तारीफ़ की है.

शिकागो यूनिवर्सिटी के बायोफ़िज़िसिस्ट टोबिन सोसनिक ने साइंस जर्नल नेचर में एक लेख में लिखा है कि इससे मॉडर्न बायोलॉजी का रूप बदलने वाला है.

इस रिपोर्ट को मैगज़ीन ने साल 2021 में विज्ञान को एक नया रूप देने के लिए मददगार लोगों को समर्पित किया है. इसमें जॉन जम्पर के काम की काफी सराहना की गई है जिन्होंने डीपमाइंड के अपने साथियों के साथ मिलकर एक ऐसा टूल विकसित किया है जो जीव विज्ञान के मौजूदा स्वरूप को नई ऊंचाइयों पर ले जाने में सहायक है.

https://www.youtube.com/watch?v=P6PGyjATbO0

एक अन्य साइंस जर्नल 'साइंस' ने और इसी के साथ न्यूसाइंटिस्ट ने भी इस साल के महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोजों और प्रगति की समीक्षा की है.

प्रोफ़ेसर और माइक्रोबायोलॉजिस्ट डिएगो कॉमर्सी ने बीबीसी को बताया, "मुझे इसमें कोई शक नहीं है कि आने वाले समय में यह स्वास्थ्य, डायग्नोस्टिक्स, फसल और फ़ूड प्रोडक्सन और पर्यावरण की देखभाल जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण रूप से सामाजिक बदलाव लाने में सहायक होगा."

यह एक ऐसा सपना था जिसे सभी जैव रसायन विज्ञानी, आणविक जीव विज्ञानी सच होते देखना चाहते थे.

दवा
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दवा

प्रभाव

जानकारों का मानना है कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस प्रोग्राम अल्फ़ा फ़ोल्ड और रोसटीटीए फ़ोल्ड प्रोटीन के थ्री डायमेंशनल के बारे में सही गणना के साथ जानकारी देने में सक्षम है.

जानकारों के मुताबिक़, यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सभी जीवधारियों की कोशिकाओं में अधिकांश बायोकेमिकल फंक्शन प्रोटीन द्वारा ही किये जाते हैं. ऐसे में प्रोटीन की थ्री-डायमेंशनल संरचना की जानकारी से हम नई दवाएं विकसित कर पाएंगे.

मलेरिया के ख़िलाफ़ पहला टीका

मलेरिया सालों से मानव जाति का एक सबसे बड़ा और सबसे ख़तरनाक दुश्मन रहा है. ख़ासतौर पर बच्चों के लिए. इस बीमारी से सबसे ज़्यादा प्रभावित अफ़्रीका है और इससे मरनेवाले ज़्यादातर बच्चे हैं.

एक सदी से भी ज़्यादा वक़्त की कोशिश के बाद मलेरिया के लिए एक वैक्सीन का बनना, मेडिकल साइंस की बड़ी कामयाबी मानी जा रही है. वैक्सीन का नाम RTS,S है. यह छह साल पहले प्रभावी पाई गई थी.

घाना, कीनिया और मलावी में शुरुआती जाँच में सफल पाए जाने के बाद अब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि सब-सहारन अफ़्रीका और मलेरिया ग्रस्त अन्य इलाक़ों में मलेरिया टीकाकरण शुरू किया जा सकता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख टेड्रोस एडहॉनम गीब्रियेसुस ने इसे ऐतिहासिक क्षण बताते हुए कहा था, "बच्चों के लिए बहुप्रतीक्षित मलेरिया वैक्सीन विज्ञान की अहम खोज है. यह बच्चों की सेहत और मलेरिया नियंत्रण के लिए काफ़ी महत्वपूर्ण है. इससे हर साल लाखों बच्चों की जान बचाई जा सकती है."

मलेरिया एक परजीवी है जो ब्लड सेल्स पर हमला करता है, उसे नष्ट करता है और अपनी संख्या बढ़ाता है. इसके बाद मलेरिया पीड़ितों को काटने वाले मच्छर दूसरों में मलेरिया फैलाते हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन में वैश्विक मलेरिया कार्यक्रम के निदेशक डॉक्टर पेड्रो अलोंसो ने कहा था, "विज्ञान के लिए यह एक अहम खोज. सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से यह खोज ऐतिहासिक है. हम लोग सौ से ज़्यादा सालों से मलेरिया की वैक्सीन का इंतज़ार कर रहे थे. अब वैक्सीन अफ़्रीकी बच्चों की जान बचाएगी और गंभीर रूप से पीड़ित होने के ख़तरों को कम करेगी."

नगोज़ी ओकोंज़ो इवेला
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नगोज़ी ओकोंज़ो इवेला

औरतों ने अपने लिए वहां जगह बना जहां पहले उनका कोई प्रतिनिधित्व नहीं था

इस साल एक महिला का नाम हमेशा हमेशा के लिए स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया. एक मार्च को इस महिला ने वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइज़ेशन में इतिहास रचा.

विश्व बैंक में नंबर दो होने के बाद नाइजीरिया की नगोज़ी ओकोंज़ो इवेला ने वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइज़ेशन के महानिदेशक का पद संभाला. इस पद को संभालने वाली वह पहली महिला तो बनीं ही, साथ ही पहली अफ़्रीकी भी बनीं.

हॉर्वर्ड में पढ़े और विभिन्न महाद्वीपों में विकास के क्षेत्र में 30 सालों से भी अधिक का अनुभव रखने वाले एक अर्थशास्त्री ने जुलाई 2020 में बीबीसी को कहा था कि वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइज़ेशन को पुनर्गठन की ज़रूरत थी. इसे किसी ऐसे नेतृत्व की ज़रूरत थी जो नेतृत्व के साथ ही सुधार में भरोसा रखने वाला हो.

शियोमारा कास्त्रो
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शियोमारा कास्त्रो

लैटिन अमेरिकी देश होंडुरास की सत्ताधारी पार्टी के उम्मीदवार नासरी असफुरा को राष्ट्रपति पद के चुनाव में पराजित करने वाली शियोमारा कास्त्रो साल 2022 में राष्ट्रपति पद संभालेंगी.

वह होंडुरास की पहली महिला राष्ट्रपति बनेंगी.

सामिया सुलुहू हसन
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सामिया सुलुहू हसन

महीनों पहले जनवरी में एस्टोनिया ने इतिहास में पहली बार एक महिला को सरकार का नेतृत्व करने के लिए चुना था. और मार्च में तंजानिया के राष्ट्रपति जॉन मागुफुली की मृत्यु के बाद सामिया सुलुहू हसन को देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनाया गया.

अगस्त महीने में सामिया सुलूह हसन ने बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि वह एक महिला हैं इसलिए कई ऐसे लोग थे जिन्हें संदेह था कि वह नेतृत्व कर पाएंगी भी या नहीं.

उन्होंने कहा था, "बहुत से लोग ऐसे थे जो यह मानते थे कि महिला बेहतर राष्ट्रपति नहीं हो सकती और हम यहां उन्हें यह बताने के लिए हैं कि हम कर सकते हैं."

कमला हैरिस
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कमला हैरिस

इन अभूतपूर्व महिलाओं के साथ ही एक और महिला ने इस साल को अपने नाम से ख़ास बना दिया. और वो नाम है- कमला हैरिस.

उनकी मां भारत की हैं और पिता जमैका के. कमला हैरिस एशियाई मूल की भी पहली महिला हैं जो अमेरिका की उपराष्ट्रपति बनी हैं. वो अमेरिका की पहली महिला उपराष्ट्रपति हैं.

वेलेंसिया के यूरोपीयन यूनिवर्सटी में इंटरनेशनल रिलेशन्स में को-ऑर्डिनेटर फ्रेडरिक मर्टेंस डी विल्मर के मुताबिक़, "यह नियुक्ति इस साल की सबसे अच्छी ख़बरों में से एक थी.""

वेलेंसिया ने बीबीसी को बताया कि उनकी इस नियुक्ति ने कई दृष्टिकोण बदलने का काम किया है.

उनके मुताबिक़, "उनकी नियुक्ति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और ख़ासतौर पर महिलाओं के लिए और उन सभी के लिए एक उम्मीद की तरह है जिनके साथ उनकी संस्कृति, धर्म, नस्ल और विविधता के कारण भेदभाव हुआ है."

सिमोन बाइल्स
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सिमोन बाइल्स

दो एथलीट्स ने मेंटल हेल्थ को अंतरराष्ट्रीय मंच पर रखने का काम किया

एक ओर जहां साल 2021 में टोक्यो ओलंपिक के दौरान बहुत से खिलाड़ियों ने हमे खुशी के लम्हे दिए वहीं कुछ खिलाड़ियों ने एक ऐसे मुद्दे को मंच दिया जिस पर कम ही चर्चा होती है.

अमेरिकी जिमनास्ट सिमोन बाइल्स 'अपनी मानसिक सेहत को हर चीज़ पर प्राथमिकता' देते हुए खेल से पीछे हट गयीं.

बाइल्स ने अपने करियर में पांच बार वल्र्ड फ्लोर एक्सरसाइज़ का ख़िताब जीता है. चार बार की ओलंपिक चैंपियन ने अपने करियर में इस इवेंट में कोई ग्लोबल मीट नहीं हारी है. वह 2013, 2014, 2015, 2018 और 2019 में फ्लोर एक्सरसाइज चैंपियन रही हैं.

24 वर्षीय बाइल्स ये कहते हुए ओलंपिक से अलग हो गईं कि उन्हें अब अपनी मानसिक सेहत पर ध्यान देना है.

बीबीसी स्पोर्ट्स पर्सनेलिटी ऑफ़ द ईयर कार्यक्रम में लाइफ़ टाइम अचीवमेंट सम्मान पाने के बाद उन्होंने कहा, "2021 वैसा साल नहीं था जिसकी मैंने उम्मीद की थी. इन गर्मियों में मुझे प्रतियोगिता से पीछे हटना पड़ा ताकि मैं अपनी ना दिखने वाली चोट से रिकवर कर सकूं."

उन्होंने कहा कि यह उनकी ज़िंदगी का सबसे मुश्किल फ़ैसला था लेकिन मैंने फ़ैसला किया कि मैं आगे आकर बोलूं. मैं ये बताने के लिए बोलूं कि मेंटल हेल्थ से जुड़ी चुनौतियों के लिए शर्मिंदा होने जैसा कुछ भी नहीं.

लेकिन मेंटल हेल्थ के बारे में खुलकर बोलने वाली वह अकेली एथलीट नहीं रहीं.

उनके अलावा दुनिया की नंबर दो महिला टेनिस खिलाड़ी जापान की नाओमी ओसाका के उस फ़ैसले ने तब हलचल मचा दी जब ओसाका ने फ़्रेंच ओपन टेनिस प्रतियोगिता से हटने का फ़ैसला किया.

नाओमी ओसाका
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नाओमी ओसाका

दरअसल अपने मानसिक स्वास्थ्य का हवाला देकर ओसाका ने एक मैच के बाद मीडिया से बात करने से इनकार कर दिया था. लेकिन प्रतियोगिता के आयोजक ओसाका के फ़ैसले से ख़ुश नहीं थे.

उन्होंने ओसाका पर जुर्माना लगाया और कहा कि अगर वो मीडिया से बात नहीं करेंगी, तो उन्हें प्रतियोगिता से बाहर भी किया जा सकता है. लेकिन अगले ही दिन ओसाका ने ख़ुद ही प्रतियोगिता से हटने की घोषणा कर दी.

अपने फ़ैसले का ऐलान करते हुए उन्होंने ट्वीट किया था कि वर्ष 2018 में अपना पहला ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीतने के बाद से ही वो अवसाद का सामना कर रही हैं.

पांडा
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पांडा

जीव जगत से आयी खुशख़बरी

साल 2021 वन्य जीव संरक्षण और जीव-जन्तुओं के लिए काम करने वालों और उनसे प्यार करने वालों के लिए एक बहुत बड़ी खुशी लेकर आया.

जुलाई महीने में चीन के अधिकारियों ने बताया कि अब पांडा लुप्तप्राय जीवों की श्रेणी से बाहर आ गया है. उन्होंने कहा था कि अब वे पांडा को लुप्तप्राय जीवों के रूप में नहीं देखते हैं लेकिन जोखिम बना हुआ है.

इससे पहले तक पांडा लुप्तप्राय जीवों की श्रेणी में पहुंच गया था लेकिन अब जंगलों में उनकी संख्या 1800 तक पहुंच गई है.

हालांकि आईयूसीएन की "रेड लिस्ट" में 37,480 प्रजातियां अभी भी लुप्तप्राय के रूप में वर्गीकृत हैं.

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