Liz Truss resigns: पांच गलतियां जिसने लिज ट्रस को 45 दिन में इस्तीफा देने के लिए कर दिया मजबूर
ब्रिटेन की प्रधानमंत्री लिज ट्रस को पद संभालने के महज 45 दिनों के बाद इस्तीफा देना पड़ा। संसद में लगातार आलोचना के बाद अचानक ट्रस ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
Liz Truss Resigns: ब्रिटेन में लिज ट्रस ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। टैक्स कटौती में मचे घमासान और एक ही हफ्ते में दो कैबिनेट मंत्रियों के इस्तीफे के बाद से उन पर पद छोडने का भारी दबाव था। बोरिस जॉनसन के पद से हटने के बाद लिज ट्रस और ऋषि सुनक के बीच पीएम पद के लिए चुनाव हुआ था जिसमें कंजरवेटिव पार्टी के सदस्यों ने लिज ट्रस का समर्थन किया था। 7 सितंबर को पीएम पद की शपथ लेने के बाद लिज ट्रस बस 45 दिन के लिए इस पद पर रह पाईं और आखिरकार भारी दबाव के बाद खुद ही कुर्सी त्याग दीं। ब्रिटेन में सबसे कम समय की पीएम बनने का रिकॉर्ड बना चुकीं लिज ट्रस की वे 5 गलतियां क्या थीं जिसकी वजह से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा?
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1. ट्रस सरकार का मिनी बजट
लिज ट्रस सरकार ने सितंबर के आखिरी सप्ताह में संसद में मिनी-बजट पेश किया था। इस बजट में उन्होंने टैक्स बढ़ोतरी और महंगाई पर रोक लगाने वाले कदम उठाए थे। इस मिनी बजट का मकसद ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को 2.5 प्रतिशत के विकास स्तर पर ले जाना था, हालांकि ऐसा नहीं हुआ। इसके बजाय, इसने पहले से ही संकटग्रस्त बाजार को और हिलाकर रख दिया। टैक्स कटौती के फैसले से पौंड की विनिमय दर में भारी गिरावट आई। इसके कारण बैंक ऑफ इंगलैंड को आर्थिक संकट को रोकने के लिये कदम उठाना पड़ा। भारी आलोचनाओं के बाद 10 दिन में ही सरकार को अपने कदम वापस खींचने पड़े और माफी भी मांगनी पड़ी। लिज ट्रस का ये मिनी बजट उनका करियर 'मिनी' कर गया।

2. महंगाई पर कंट्रोल
लिज ट्रस ने जब प्रधानमंत्री का पद संभाला था, तब कमरतोड़ महंगाई का सामना कर रही ब्रिटेन की जनता को उनसे बहुत उम्मीदें थीं। जुलाई में महंगाई 40 साल के रिकॉर्ड स्तर को पार कर 10.1 पर पहुंच गई थी। हालांकि अगस्त में इसमें कुछ सुधार हुआ और यह घटकर 9.9 पहुंच गई। सितंबर में जब लिज ट्रस पीएम बनी तो जनता को उम्मीद थी कि वह लगातार बढ़ती महंगाई पर अंकुश लगा पाएंगी और ब्रिटेन को 'अच्छे दिन' दिखा पाएंगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बुधवार को एक बार फिर से मुद्रास्फीति के आंकड़ें आए जिसमें महंगाई फिर से 40 साल पार के स्तर को छू गई थी। अब जनता सबकुछ बर्दाश्त कर सकती है मगर महंगाई? बिल्कुल नहीं।

3. लोक-लुभावन वादे
यह तो सभी जानते हैं कि जब ऋषि सुनक और लिज ट्रस के बीच चुनावी संघर्ष चल रहा था, ट्रस एक के बाद एक लोक लुभावन वादे करते जा रही थी। उन्हें पीएम की कुर्सी तक पहुंचाने वाला एक प्रमुख चुनावी वादा, टैक्स दरों में कटौती करना था। हालांकि ऋषि सुनक कंजरवेटिव पार्टी के सदस्यों को आगाह करते रहे कि टैक्स घटाना ब्रिटेन के हित में नहीं होगा मगर लोगों ने सुनक पर यकीन नहीं किया। ट्रस ने लोकलुभावन वादे को पूरा करने की कोशिश में टैक्स में कटौती की लेकिन वह उल्टा पड़ गया। इसके बाद ट्रस को अपने वादे से से पीछे हटना पड़ा। लिज को पीएम पद की गद्दी तो मिल गयी मगर जिन वादों के बलबूते उन्होंने यह पद हासिल किया था, वे वादे ही ट्रस के गले की फांस बन गए।

4. वादा खिलाफी
लिज ट्रस के चुनाव के दौरान जनता से किए गए लोक लुभावन वादों को पूरा करने के चक्कर में वित्तमंत्री ने जान झोंक दी। लेकिन वह दाव उल्टा पड़ चुका था। लिज ट्रस की भारी किरकिरी हुई और वित्तमंत्री के इस्तीफे मांगे जाने लगे। हारकर आखिरकार पीएम और वित्तमंत्री को टैक्स कटौती का फैसला बदलना पड़ा। लेकिन स्थिति खराब हो चुकी थी उसे संभालने और अपनी साख बचाने के लिए ट्रस ने क्वासी क्वार्टेंग से इस्लीफा ले लिया। वित्तमंत्री की कुर्सी अलग चली गई। लेकिन ट्रस के टैक्स कटौती के वादे पर यकीन करने वाली जनता इससे भड़क गई और उन्होंने इसे वादाखिलाफी बताया।

5. ऋषि सुनक
हां... ये लिज ट्रस के सत्ता गंवाने के सबसे अहम कारणों में से एक है। लिज ने यह चुनाव झूठे लोकलुभावन वादों पर जीता था। ऋषि सुनक ने कहा भी कि लिज ट्रस सपने बेच रही हैं। मगर उनकी चेतावनी को नजरअंदाज किया गया। जैसे-जैसे चुनावी सर्वे के परिणाम आ रहे थे यह स्पष्ट दिख रहा था कि लोगों को लिज के लोकलुभावन वादे पसंद आ रहे हैं। अंततः ऋषि चुनाव हार चुके थे। लेकिन जीत के बाद लिज ट्रस को देश के पुराने वित्तमंत्री को मना लेना चाहिए था। लेकिन ट्रस, सुनक को साध नहीं पाईं। चुनाव परिणाम आने के बाद ही ऋषि सुनक गायब हो गए। ऐसा कहा जाता है कि पर्दे के पीछे से वह चालें चलते रहें और एक-एक कर लिज ट्रस का किला ध्वस्त करते रहे। परिणाम सामने है। भारतवंशी सांसद को काबू न कर पाना लिज को बेहद महंगा पड़ा।












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