Explained: स्कूल-कॉलेज बंद, छात्रों की मौत, बांग्लादेश में आरक्षण हटाने के लिए क्यों हो रहे भीषण प्रदर्शन?
Bangladesh student protests: बांग्लादेश में हजारों की संख्या में छात्र आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं और हिंसक प्रदर्शनों में पांच लोगों की मौत के बाद शेख हसीना की सरकार ने देश के तमाम यूनिवर्सिटीज को अनिश्तितकाल के लिए बंद कर दिया है।
बांग्लादेशी मीडिया bdnews24 के मुताबिक, हसीना सरकार ने देश भर में सार्वजनिक और निजी परिसरों में क्लासेस रद्द कर दी हैं। साथ ही, विश्वविद्यालयों से संबद्ध मेडिकल, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग और अन्य कॉलेजों को भी अगले आदेश तक बंद करने का फैसला किया है।

लेकिन, बांग्लादेश में हजारों-हजार छात्र प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं? वहां किसे आरक्षण दिया जाता है? आरक्षण के खिलाफ ये गुस्सा क्यों फूटा है? आरक्षण का ये मॉडल क्या है? आइये हम जानने की कोशिश करते हैं।
आरक्षण के खिलाफ क्यों फूटा लोगों का गुस्सा?
बांग्लादेश में विरोध प्रदर्शन 1 जुलाई को शुरू हुआ है और ये प्रदर्शन उस वक्त शुरू हुआ, जब बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट ने देश के 1971 के स्वतंत्रता संग्राम में लड़ने वाले लोगों के वंशजों के लिए 30 प्रतिशत सरकारी नौकरी कोटा फिर से बहाल करने का फैसला सुनाया।
बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट का आरक्षण के समर्थन में फैसला आने के बाद देश के युवा भड़क गये और सड़कों पर उतर आए।
देश के सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों के हजारों-हजार छात्र, आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। छात्रों को डर है, कि अगर युद्ध लड़ने वाले परिवारों के सदस्यों के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण दिया गया, तो फिर सरकारी नौकरियों में आने का मौका ही उन्हें नहीं मिलेगा।
हालांकि, ये प्रदर्शनकारी महिलाओं, जातीय अल्पसंख्यकों और विकलांगों समेत अन्य हाशिए पर मौजूद दूसरे समूहों को मिलने वाले आरक्षण का समर्थन करते हैं। प्रदर्शनकारियों की मांग सिर्फ यह है, कि स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों का कोटा खत्म किया जाए।
कोटा विरोधी प्रदर्शनों को कॉर्डिनेट करने वाले नाहिद इस्लाम ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा, कि "हम सामान्य रूप से कोटा प्रणाली के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन हम चाहते हैं, कि 1971 के स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों के लिए 30 प्रतिशत कोटा खत्म कर दिया जाए।"
उन्होंने कहा, कि "बांग्लादेश में कई युवाओं के लिए सरकारी नौकरियां ही एकमात्र उम्मीद हैं, और यह कोटा प्रणाली उन्हें अवसरों से वंचित कर रही है।"
प्रदर्शनकारियों का मानना है, कि ये रिजर्वेशन प्रधानमंत्री शेख हसीना की राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए दिया जाता है और आरक्षण से उनकी सरकार को भारी फायदा मिलता है, क्योंकि आरक्षण लेने वाले उनके ही समर्थक हैं। आंदोलनकारियों का मानना है, कि कोटा का गलत फायदा उठाया जा रहा है। उनका तर्क है, कि कोटा भेदभावपूर्ण है और इसे योग्यता आधारित प्रणाली से बदला जाना चाहिए।
प्रदर्शन का समर्थन कौन कर रहा है?
बांग्लादेश में व्यापक विरोध के बाद 2018 में प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इस कोटा प्रणाली को खत्म कर दिया था। लेकिन 5 जून के सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कहा गया, कि सरकार का फैसला गलत था, और कोर्ट के आदेश ने युवाओं को नाराज कर दिया।
भारत की तरह बांग्लादेश में भी सरकारी नौकरियों का क्रेज है, क्योंकि इसमें काफी अच्छा वेतन दिया जाता है। लेकिन, आधे से ज्यादा सरकारी नौकरियों में अलग अलग आरक्षण व्यवस्था है।
प्रदर्शनकारियों का दावा है, कि वे किसी भी राजनीतिक समूह से जुड़े नहीं हैं। अल-जजीरा की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस आंदोलन को छात्र विरोधी भेदभाव आंदोलन के रूप में जाना जाता है। राजधानी में ढाका विश्वविद्यालय और चटगांव विश्वविद्यालय के हजारों छात्र आरक्षण विरोधी आंदोलन में शामिल हो गए हैं। और फिर यह देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी फैल गया है।
प्रदर्शनकारी और ढाका विश्वविद्यालय में तीसरे वर्ष के अंतर्राष्ट्रीय संबंध के छात्र फहीम फारुकी ने अलजजीरा की कहा, कि छात्रों ने फेसबुक ग्रुप के माध्यम से विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था और उन्हें किसी भी राजनीतिक संगठन का समर्थन प्राप्त नहीं है।

आंदोलन हिंसक कैसे हो गया?
छात्रों का ये प्रदर्शन उस वक्त हिंसक हो गया, जब प्रधानमंत्री शेख हसीना से एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसपर सवाल पूछा गया और उन्होंने कहा, कि "अगर स्वतंत्रता सेनानियों के पोते-पोतियों को लाभ नहीं मिलता है, तो किसे मिलेगा? रजाकारों के पोते-पोतियों को?"
रजाकार शब्द का मतलब उन लोगों से है, जिन्होंने 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सेना के साथ सहयोग किया था। उनकी टिप्पणियों को छात्र प्रदर्शनकारियों ने अपमानजनक और भड़काने वाला माना गया और ये विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों और सत्तारूढ़ अवामी लीग पार्टी और बांग्लादेश छत लीग के छात्र विंग के सदस्यों के बीच हिंसक झड़पें हुईं हैं, जिनमें 100 से ज्यादा छात्र घायल हो गए हैं। हिंसा देश के दूसरे विश्वविद्यालयों में भी फैल गई है, जिसके परिणामस्वरूप काफी नुकसान पहुंचा है। सरकार ने विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए पुलिस और अर्धसैनिक बलों को तैनात किया है।
सरकार के उदासीन रवैये और प्रदर्शनकारियों की शिकायतों को दूर करने में नाकामी ने देश में अशांति और अस्थिरता को और बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों ने सरकार से छात्रों की चिंताओं पर ध्यान देने और कोटा मुद्दे का उचित समाधान खोजने का आह्वान किया है। उन्होंने चेतावनी दी है, कि हिंसा का सहारा लेना और प्रदर्शनकारियों को राष्ट्र-विरोधी ताकतों के रूप में लेबल करना केवल स्थिति को और खराब करेगा और बांग्लादेशी समाज में विभाजन को और गहरा करेगा।
शेख हसीना सरकार की प्रतिक्रिया क्या है?
रविवार के विरोध प्रदर्शन के बाद शेख हसीना ने पूछा, कि क्या आंदोलनकारी, जो खुद को "रजाकार" कहते हैं, बांग्लादेश के इतिहास को अच्छी तरह समझते हैं? प्रधानमंत्री ने कहा, कि "उन्होंने सड़कों पर पड़ी लाशें नहीं देखीं, फिर भी उन्हें खुद को रजाकार कहने में कोई शर्म नहीं है।" उन्होंने यह भी पूछा, कि क्या छात्र 1971 के नरसंहार में पाकिस्तान और पाकिस्तान की सहयोगियों की भूमिका और मुक्ति संग्राम के दौरान महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार के बारे में जानते हैं?
शेख हसीना सरकार में शामिल कई मंत्रियों ने भी इसी तरह के बयान दिए हैं। बांग्लादेश के शिक्षा मंत्री मोहिबुल हसन चौधरी ने रविवार को फेसबुक पर लिखा, "जो लोग 'मैं रजाकार हूं' का दावा करते हैं, उन्होंने खुद को इस युग के 'सच्चे' रजाकार साबित कर दिया है।"
उन्होंने लिखा, कि "वे अदालत और सरकार दोनों की अवहेलना करते हैं।"
पिछले हफ़्ते बांग्लादेश के गृह मंत्री असदुज्जमां खान ने छात्रों से अनुरोध किया था, कि वे अनावश्यक रूप से सड़कों को ब्लॉक न करें और अपने-अपने संस्थानों में वापस चले जाएं। उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, "छात्र अपनी हदें पार कर रहे हैं।"
विपक्षी पार्टियां क्या कह रही हैं?
छात्रों के विरोध प्रदर्शनों ने राजनीतिक रूप ले लिया है। देश की मुख्य विपक्षी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और उसकी छात्र शाखा ने आरक्षण विरोधी प्रदर्शनकारियों पर हमलों के विरोध में बुधवार को मार्च निकाल रही है।
सरकार विरोध प्रदर्शनों को दबाने में नाकाम रही है।
अल-जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, ढाका विश्वविद्यालय में कानून के प्रोफेसर आसिफ नजरुल ने सरकार की प्रतिक्रिया की आलोचना की और कहा, कि सरकार विरोध प्रदर्शनों को दबाने में काफी जोश दिखा रही है और उसे एक सुविधाजनक बहाना मिल गया था।
रिसर्च एंड पॉलिसी इंटीग्रेशन फॉर डेवलपमेंट के अध्यक्ष मोहम्मद अब्दुर रज्जाक ने रॉयटर्स से कहा, कि "सरकार को छात्रों की चिंताओं को सुनने और इस कोटा मुद्दे का उचित समाधान खोजने का तरीका खोजने की जरूरत है।"












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