मस्जिद बनवाने पर अरबों खर्च, अब दाने-दाने को मोहताज.. एक और इस्लामिक देश होगा कंगाल!

मिस्र एक अफ्रीकी देश है, जिसका एशिया से भी गहरा रिश्ता रहा है, लेकिन ये देश गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। मिस्र की जनसंख्या करीब 10.3 करोड़ है, जबकि देश में एक लाख मस्जिदे हैं।

egypt crisis

Egypt Economic Crisis: पाकिस्तान के बाद एक और इस्लामिक देश इजिप्ट कंगाली के दहलीज पर पहुंच गया है और देश की आर्थिक स्थिति विकराल हो गई है। मिस्र के हालात ये हो गये हैं, कि अब वहां पर दाने दाने के लिए लोग मोहताज हो गये हैं। मिस्र की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो चुकी है, कि सरकार लोगों से चिकन फीट खाने को कह रही है। सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, अरब दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश, रिकॉर्ड मुद्रा संकट से बुरी तरह जूझ रहा है और यहां पर खाना इतना महंगा हो गया है, कि लोगों के लिए पेट भरना किसी जंग लड़ने से कम नहीं रह गया है।

मिस्र में विकराल हुआ आर्थिक संकट

मिस्र में विकराल हुआ आर्थिक संकट

सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, मिस्र में साल 2021 में पोल्ट्री की कीमतें 30 मिस्र पाउंड (1.9 डालर) थी, जबकि सोमवार को पोल्ट्री की कीमत 70 मिस्र पाउंड (2.36 डॉलर) हो गई है। वहीं, मिस्र में नौकरीपेशा वर्ग का वेतन आधा हो गया है, और स्थिति ये है, कि लोग बैंकों में जमा अपने ही पैसे नहीं निकल पा रहे हैं। वहीं, बढ़ती लागत ने देश के राष्ट्रीय पोषण संस्थान को लोगों को चिकन के पैर खाने का आह्वान किया है। मिस्र के राष्ट्रीय पोषण संस्थान ने एक अपील जारी करते हुए कहा है, कि "क्या आप प्रोटीन युक्त खाद्य विकल्पों की तलाश कर रहे हैं जो आपके बजट को बचाएंगे?" विभाग ने पिछले महीने एक फेसबुक पोस्ट में मुर्गे के पैरों और मवेशियों के खुरों को खाने के लिए प्रोत्साहित करने की कोशिश की है।

लोगों के लिए पेट पालना मुश्किल

लोगों के लिए पेट पालना मुश्किल

कई मिस्रवासी इस बात से नाराज़ हैं कि सरकार नागरिकों को ऐसे खाद्य पदार्थों का सहारा लेने के लिए कह रही है, जो देश में अत्यधिक गरीबी का प्रतीक माना जाता है। मिस्र में, मुर्गे के पैरों को मांस की सबसे सस्ती वस्तु के रूप में देखा जाता है, जिसे लोग खाते नहीं, बल्कि खाना बनाते समय फेंक देते हैं, लेकिन अब सरकार उन्हीं पदार्थों को खाने के लिए कह रही है। मिस्र के एक पत्रकार मोहम्मद अल-हाशिमी ने अपने ट्वीट करते हुए कहा, कि "अब हम मुर्गों के पै खाने के युग में प्रवेश कर रहे हैं। ये मिस्र के पाउंड के पतन की वजह से है... हम कर्ज में और डूब रहे हैं।" हालांकि, लोग सरकार की इस अपील का विरोध जरूर कर रहे हैं, लेकिन हकीकत ये है, कि चिकन के पैर की कीमत 20 पाउंड (मिस्र की करेंसी) हो गई है।

बर्बादी के दरवाजे तक कैसे पहुंचा मिस्र?

बर्बादी के दरवाजे तक कैसे पहुंचा मिस्र?

अधिकारियों का कहना है, कि मिस्र की करीब 30% आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। हालांकि, साल 2019 में विश्व बैंक ने अनुमान लगाया है, कि "मिस्र की लगभग 60% आबादी या तो गरीब है या कमजोर है।" मिस्र पिछले एक दशक में कई वित्तीय संकटों से गुजरा है, जिसने इसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और खाड़ी अरब सहयोगियों जैसे लेनदारों से खैरात मांगने के लिए मजबूर कर रखा है, लेकिन मिस्र कर्ज लेने के एक ऐसे चक्र में फंस गया है, जो विश्लेषकों के मुताबिक, अर्थव्यवस्था के अस्थिर होने का उदाहरण है। आईएमएफ के अनुसार, इस वर्ष इसका कर्ज इसकी अर्थव्यवस्था के आकार का 85.6% हो चुका है। मिस्र की अर्थव्यवस्था के कमजोर होने में सेना की भूमिका काफी हद तक जिम्मेदगार है, जिसने निजी क्षेत्र को खोखला कर दिया है। इसके साथ ही, अफ्रीका के सबसे ऊंचे टावर और रेगिस्तान में एक नई राजधानी बनाने की बड़ी परियोजनाओं के लिए भारी-भरकम रकम का आवंटन भी शामिल है। अधिकारियों का दावा है, कि मिस्र की नई राजधानी बिल्डिंग पेंटागन से भी बड़ा है।

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    कोविड ने मिस्र को दिया बड़ा झटका

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    मिस्र की अर्थव्यवस्था को पिछले दो वर्षों में एक के बाद एक बड़े झटके लगे हैं। कोविड महामारी ने पहले ही देश को भारी नुकसान पहुंचाया था, वहीं यूक्रेन युद्ध ने मिस्र के विदेशी मुद्रा भंडार को निचोड़ लिया और ईंधन की बढ़ती कीमतों ने मुद्रास्फीति को आसमान में पहुंचा दिया है। महामारी के दौरान निवेशकों ने मिस्र के बाजार से 20 अरब डॉलर निकाल लिए और यूक्रेन युद्ध से आर्थिक गिरावट के कारण पिछले साल भी निवेशकों ने करीब 20 अरब डॉलर देश से बाहर निकाल लिए, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को गहरा धक्का लगा है।

    मस्जिद बनाने पर अरबों खर्च

    मस्जिद बनाने पर अरबों खर्च

    मिस्र की स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी, तो देश की सरकार मस्जिदों के निर्माण में पैसे बहा रही थी। पिछले महने ही मिस्र के धार्मिक बंदोबस्ती मंत्रालय ने बताया है, कि साल 2012 में अब्देल फतह अल-सिसी ने मिस्र की सत्ता संभाली थी, लेकिन उनके राष्ट्रपति बनने के बाद मस्जिदों के निर्माण पर 10.2 अरब डॉलर खर्च किए गये हैं, यानि 3287 करोड़ रुपये में पिछले 9 सालों में करीब 9600 मस्जिद या तो बनाए गये, या उनके नवीनीकरण पर खर्च कर दिए गये। वहीं, मिस्र के लोगों का कहना है, कि सरकार ने लोगों से रोटी छिनकर मस्जिदों के निर्माण पर खजाना खाली कर दिया और अब दो वक्त की रोटी भी मिलना मुश्किल है।

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