पश्चिमी देश पाकिस्तान के साथ. इसलिए रूस बना था हमारा सहयोगी: एस जयशंकर
भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सोमवार को कहा कि भारत के पास पर्याप्त मात्रा में सोवियत और रूसी मूल का सैन्य साज़ो-सामान है.
उन्होंने इसके लिए भारत के प्रति पश्चिमी देशों की नीति को ज़िम्मेदार ठहराया है.
उनका कहना है कि पश्चिमी देशों ने दक्षिण एशिया में एक मिलिट्री तानाशाही को पार्टनर बनाया था और कई दशकों तक भारत को कोई भी पश्चिमी देश हथियार नहीं देता था.
ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री पेनी वॉन्ग के साथ एक प्रेसवार्ता में जयशंकर ने कहा है कि भारत और रूस के बीच रिश्ते भारत के हितों को बेहतर ढंग से साधते हैं.
उन्होंने कहा, "हमारी सेना के पास सोवियत और रूसी मूल के हथियारों की ख़ासी संख्या है, और दशकों से इस सैन्य साज़ो-सामान की संख्या बढ़ती रही है. इसके कई कारण रहे हैं. कई दशकों तक पश्चिम के देशों ने भारत को कोई हथियार सप्लाई नहीं किए. इतना ही नहीं, उन्होंने हमारे बजाय, हमारे पड़ोस में मौजूद सैन्य तानाशाही का समर्थन किया."
हालांकि, जयशंकर ने पाकिस्तान का नाम नहीं लिया. लेकिन साफ़ है कि उनका संकेत पाकिस्तान की ओर था. पाकिस्तान कोल्ड वॉर के दौर में अमेरिका का एक मज़बूत सहयोगी था.
{image-S-400 मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम. मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम [ 5-10 मिनट में सड़क मार्ग से तैनात किया जा सकता है. ] , Source: स्रोत: बीबीसी, Image: एस-400 मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम hindi.oneindia.com}
लेकिन हाल के वर्षों में पाकिस्तान और अमेरिका के बीच संबंधों में बड़ी तेज़ी से बदलाव देखे जा सकते हैं.
अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के बाद से दोनों देशों के बीच संबंधों के समीकरण तेज़ी से बदले हैं. पिछले साल अफ़ग़ानिस्तान में अचानक अमेरिकी सेना ने पीछे हटने का एलान किया. उसके बाद 15 अगस्त को तालिबान लड़ाके अफ़ग़ानिस्तान में दाख़िल हुए और जल्द ही देश की सत्ता अपने हाथों में ले ली.
इस घटनाक्रम के बाद पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच संबंधों में दूरियां लगातार बढ़ती रही हैं. यहां तक कि पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने खुलेआम आरोप लगाया था कि उनकी सरकार गिराने के पीछे अमेरिका का हाथ है.
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रूसी हथियार और पश्चिम का रवैया
ऑस्ट्रेलिया में बात करते हुए विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा, "हम सभी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अपने-अपने हालात से निपटते हैं. हम वही फ़ैसले करते हैं जो हमारे देश के वर्तमान और भविष्य के हितों की रक्षा करते हों, और मेरे विचार से मौजूदा (रूस-यूक्रेन) संघर्ष अन्य सैन्य संघर्षों की तरह हमें अहम सबक़ सिखाएगा. मुझे यक़ीन है कि सेना में हमारे पेशेवर साथी इसका ध्यानपूर्वक अध्ययन करेंगे."
जयशंकर से एक ऑस्ट्रेलियाई रिपोर्टर ने पूछा था कि यूक्रेन में चल रही लड़ाई के कारण क्या भारत को रूसी तेल पर अपनी निर्भरता कम कर देनी चाहिए और रूस के साथ अपने संबंधों पर पुनर्विचार करना चाहिए.
पिछले महीने जयशंकर ने अमेरिका में वहां के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन के साथ एक प्रेसवार्ता में कहा था कि हथियार ख़रीदने के मामले में भारत वही करेगा जो उसके राष्ट्रीय हित में होगा. हथियारों के मामले में रूस भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिदाता है. यूक्रेन में छिड़ी जंग के बाद रूस पर पश्चिमी देशों ने कई प्रतिबंध लगाए हैं. इनमें से बहुत से प्रतिबंध वित्तीय लेन-देन से भी जुड़े हैं.
इसलिए भारत और रूस को हथियारों के व्यापार में दिक्कत आ रही है. दोनों देश इस प्रयास में हैं कि वो भुगतान करने के लिए कोई नया तरीका अपनाएं.
पिछले महीने भारत में रूस के राजदूत डेनिस अलीपोव ने कहा था कि रूस ने भारत को लंबी दूरी का ज़मीन से हवा में मार करने वाला मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम S-400 अमेरिका और पश्चिमी देशों के दवाब के बावजूद समय पर दे दिया है.
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क्या है एस-400
- दुनिया का बेहद प्रभावी एयर डिफ़ेंस सिस्टम
- दुश्मनों के मिसाइल हमले रोकने में कारगर
- सड़क मार्ग से आवागमन और तैनाती संभव
- विमान, क्रूज़, बैलिस्टिक और हाइपरसोनिक मिसाइलें नष्ट करने में सक्षम
- ज़मीन पर स्थित सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने में सक्षम
ऐसी ख़बरें हैं कि भारत ने इस मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम को चीन और पाकिस्तान की सीमाओं के कुछ इलाक़ों में तैनात भी कर दिया है. एस-400 मिसाइल सिस्टम ख़रीदने के लिए अक्तूबर 2018 में भारत ने रूस के साथ पांच बिलियन अमेरिकी डॉलर की डील की थी.
तब ट्रंप प्रशासन ने इसमें रोड़े अटकाने की कोशिश करते हुए कहा था कि अगर भारत इस दिशा में बढ़ा तो उस पर CAATSA के तहत प्रतिबंध भी लग सकता है.
अमेरिका के CAATSA यानि 'काउंटरिंग अमेरिकाज़ एडवर्सरीज़ थ्रू सैंक्शन्स ऐक्ट' नामक इस क़ानून के सख़्त प्रावधानों के तहत रूस, ईरान और उत्तर कोरिया से रक्षा उपकरण ख़रीदने पर प्रतिबंध है.
इसी क़ानून के तहत, अमेरिका ने अपने नेटो सहयोगी तुर्की पर भी एस-400 मिसाइल सिस्टम ख़रीदने पर प्रतिबंध लगा दिया था. लेकिन बाद में अमेरिका ने भारत को इस क़ानून से रियायत दे दी थी.
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जयशंकर का आक्रामक रुख़

बीते एक साल में भारतीय विदेश मंत्री ने ऐसे कई बयान दिए हैं जो भारतीय विदेश नीति के बदले अंदाज़ की ओर इशारा करते हैं.
वॉशिंगटन में अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन की मौजूदगी में रूस के बारे में बेबाक राय से लेकर, यूरोप में रूस से तेल ख़रीदने पर दो-टूक जवाब तक, जयशंकर ने अपने बयानों से इस बदलाव के संकेत दिए हैं.
यूरोप और अमेरिका के लगातार दवाब के बावजूद भारत ने बार-बार संयुक्त राष्ट्र में यूक्रेन-रूस युद्ध पर अपना अलग पक्ष रखा है. साथ ही भारत, यूक्रेन के युद्ध के लिए रूस की सीधी आलोचना करने से भी बचता रहा है.
संयुक्त राष्ट्र महासभा में हाल में दिए अपने भाषण में एस. जयशंकर ने रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत को संयुक्त राष्ट्र में बड़ी ज़िम्मेदारी दिए जाने पर अपनी बात रखी थी.
जयशंकर ने रूस-यूक्रेन संघर्ष पर कहा, 'यूक्रेन संघर्ष जारी है और हमसे अक्सर पूछा जाता है कि हम किस ओर हैं? तो हर बार हमारा सीधा और ईमानदार जवाब होता है कि भारत शांति के साथ है और वो हमेशा इसी रुख़ पर रहेगा. हम उस पक्ष के साथ हैं जो यूएन चार्टर और इसके संस्थापक सिद्धांतों का पालन करता है. हम उस पक्ष के साथ हैं जो बातचीत और कूटनीति के ज़रिए ही इस हल को निकालने की बात करता है.'
जयशंकर ने इसके बाद भी रूस-यूक्रेन संघर्ष पर बोलना जारी रखा. उन्होंने कहा कि 'हम उन लोगों के पक्ष में हैं जो अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, भले ही वे बढ़ते खाने, तेल और उर्वरक के दामों को ताक पर रख रहे हैं.'
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(कॉपी - पवन सिंह अतुल)
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