दुबई: मिलिए श्रीदेवी के शव को रिसीव करने वाले अशरफ़ से
श्रीदेवी की मौत के बाद दुबई प्रशासन ने जो 'एम्बामिंग सर्टिफ़िकेट' जारी किया था, उसमें एक ऐसे शख़्स का भी नाम लिखा था जो अब तक ख़बरों से दूर रहा है.
ये नाम है अशरफ़ का जिन्हें दुबई प्रशासन ने श्रीदेवी का पार्थिव शरीर सौंपा था.
सर्टिफ़िकेट पर अशरफ़ का मोबाइल नंबर भी लिखा था, जिसकी मदद से बीबीसी ने अशरफ़ तक पहुंचने की कोशिश की.
अशरफ़ संयुक्त अरब अमीरात के शारजाह शहर से सटे अजमान शहर में रहते हैं. ये जानकारी भी सर्टिफ़िकेट पर लिखी है.
लेकिन जब अशरफ़ को पहली बार कॉल की गई तो उनका नंबर बिज़ी था.
'मैं पंद्रह मिनट बाद बात करूंगा'
कुछ वक़्त बाद उसी नंबर से एक मिस कॉल आई. और दोबारा कॉल करने पर जिस शख़्स से बात हुई उन्होंने अपना परिचय दिया, "मैं अशरफ़ थमारसेरी बोल रहा हूं."
अशरफ़ ने बताया कि वो किसी पुलिस ऑफ़िस में हैं. किसी की मौत हो गई है और वो पंद्रह से बीस मिनट बाद ही बात कर पाएंगे.
इस बीच अशरफ़ के बारे में जो जानकारियां हमने जुटाईं, उससे पता चला कि अशरफ़ मूल रूप से केरल के हैं.
संयुक्त अरब अमीरात के अजमान शहर में वो एक गैराज के मालिक हैं. लेकिन दूर देश में काम कर रहे कुछ लोगों के लिए अशरफ़, कई बड़ी समस्याओं का आख़िरी हल भी हैं.
अशरफ़ बताते हैं, "जैसे ही मुझे श्रीदेवी की मौत की ख़बर मिली तो मैं अस्पताल पहुंचा. वहीं मेरे पूरे तीन गुज़रे हैं. जिस दिन श्रीदेवी की मौत हुई, उसी दिन चार और लोगों की मौत हुई थी जिनमें एक चेन्नई से था, एक अहमदाबाद से था और दो केरल से थे. मुझे उनके लिए भी सारी व्यवस्था करनी थी."
श्रीदेवी के बारे में बात करते हुए अशरफ़ कहते हैं, "जब मैंने श्रीदेवी जी के शव को देखा, तो वो उतनी ही ख़ूबसूरत लग रहीं थी जितनी वो फ़िल्मी पर्दे पर हमेशा लगीं."
बीते 17 सालों से अशरफ़ एक स्वैच्छिक कार्यकर्ता के रूप में काम कर रहे हैं.
शवों को घर पहुंचाने में मदद
अपने देश से दूर जब कोई संयुक्त अरब अमीरात में गुज़र जाता है, तो अशरफ़ मृतक को उसके घर और परिवार वालों तक पहुंचाने के लिए सभी ज़रूरी प्रबंध करते हैं. इनमें लोगों को कई तरह के कानूनी क्लियरेंस दिलवाना भी शामिल है.
बीबीसी के बात करते हुए अशरफ़ ने कहा, "साल 2000 की बात है. मैं शारजाह में अपने एक दोस्त को मिलने गया था जो अस्पताल में भर्ती था. जब मैं वहां से बाहर निकला तो मैंने देखा कि दो लोग बुरी तरह से रो रहे हैं. वो दोनों केरल से थे."
उनमें से एक शख़्स ने अशरफ़ को अपनी तक़लीफ़ बताई कि उनके पिता की मौत हो गई है और वो नहीं जानते कि उनके शव को केरल वापस कैसे ले जाया जाए.
अब तक 4700 शव
अशरफ़ दावा करते हैं, "मुझे भी उस वक़्त नियम क़ानूनों की समझ नहीं थी. लेकिन मैं 4-5 दिन तक लगातार उनके साथ हर सरकारी कार्यालय में गया. ताकि उनके पिता का शव उन्हें मिल सके. ये एक तरह से शुरुआत थी. कुछ दिन बाद ऐसा ही मामला आया और नागरिक बांग्लादेश का था. उनकी मदद के लिए भी मैंने पूरा ज़ोर लगाया था."
इन बीते 17 सालों में कुल 4700 शव, जिनका वास्ता भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल समेत अलग-अलग 88 देशों से था. अशरफ़ ने इन सभी को उनके घरों तक पहुंचाने में मदद की है.
अशरफ़ कहते हैं, "कई बार तो ऐसा भी हुआ कि शव को ले जाने के लिए कोई नहीं था. तो मैं शव को लेकर उसके घर गया. इसी सिलसिले में मैं पिछले हफ़्ते चेन्नई में था. मैं चार बार कोलकाता जा चुका हूं. और असम-ओडिशा भी."
'कभी नहीं लिया पैसा'
अशरफ़ का दावा है कि इस मदद के एवज़ में उन्होंने आज तक किसी से एक पैसा भी नहीं लिया.
अशरफ़ ने बताया, "मैं अब अपने गैराज का ख़्याल नहीं रख पाता हूं. इसी काम में काफ़ी वक़्त गुज़र जाता है. इसलिए मेरे बहनोई अब गैराज संभालते हैं. और गैराज से जो आमदनी होती है उसी से घर का गुज़ारा होता है."
हालांकि अशरफ़ को लगता है कि लोगों की दुआओं से उनका बहुत भला हुआ है.
'श्रीदेवी तब भी उतनी ही ख़ूबसूरत दिख रही थीं'
जब श्रीदेवी की मौत हुई तो भारतीय दूतावास से किसी ने अशरफ़ से संपर्क किया.
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