Trump का नया Middle East Formula! अरब देशों से बोले- Israel को मान्यता दो, नहीं तो Iran Deal भूल जाओ!

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने एक बार फिर पश्चिम एशिया (West Asia) की राजनीति में बड़ा दांव चल दिया है। ईरान के साथ संभावित परमाणु समझौते और युद्धविराम की चर्चाओं के बीच ट्रंप ने अब एक नई शर्त जोड़ दी है। उन्होंने साफ संकेत दिया है कि अगर अरब और मुस्लिम देश इसराइल को औपचारिक मान्यता देने वाले 'अब्राहम समझौते' (Abraham Accords) में शामिल नहीं होते, तो ईरान के साथ किसी बड़े समझौते का कोई मतलब नहीं रहेगा।

यानी अब मामला सिर्फ ईरान और अमेरिका के बीच न्यूक्लियर डील का नहीं रह गया है, बल्कि पूरा फोकस इस बात पर आ गया है कि क्या मुस्लिम देश खुलकर इसराइल के साथ रिश्ते सामान्य करेंगे या नहीं। ट्रंप के इस बयान ने एक बार फिर पूरी दुनिया का ध्यान मिडिल ईस्ट की बदलती राजनीति पर ला दिया है।

donald trump Abraham Accords

अब्राहम समझौता क्या है? (What Is Abraham Accords)

साल 2020 में ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान अमेरिका की मध्यस्थता में 'अब्राहम समझौते' की शुरुआत हुई थी। इसका मकसद मुस्लिम बहुल देशों और इसराइल के बीच राजनयिक रिश्तों को सामान्य बनाना था।

इस समझौते के तहत सबसे पहले United Arab Emirates और Bahrain ने इसराइल के साथ रिश्ते स्थापित किए। बाद में Morocco, Sudan और Kazakhstan भी इससे जुड़े। ट्रंप अब चाहते हैं कि इस लिस्ट में Saudi Arabia, Qatar, Pakistan, Turkey, Egypt और Jordan जैसे देश भी शामिल हों।

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ट्रंप ने मुस्लिम देशों से क्या कहा?

ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर लंबा पोस्ट लिखकर बताया कि उन्होंने कई मुस्लिम देशों के नेताओं से बातचीत की है। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने इस पूरे संकट को संभालने में जितनी मेहनत की है, उसके बाद यह जरूरी हो जाता है कि सभी सहयोगी देश अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करें।

ट्रंप के मुताबिक, अगर कुछ देश ऐसा नहीं करते तो यह गलत इरादों का संकेत माना जाएगा। उन्होंने यहां तक कह दिया कि अगर कोई देश इस समझौते का हिस्सा नहीं बनना चाहता, तो उसे ईरान डील का हिस्सा भी नहीं होना चाहिए। ट्रंप ने खास तौर पर सऊदी अरब और कतर का नाम लेते हुए कहा कि शुरुआत इन्हीं देशों से होनी चाहिए और बाकी देश बाद में जुड़ सकते हैं।

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Iran को भी दिया ऑफर

सबसे दिलचस्प बात यह रही कि ट्रंप ने ईरान को भी इस गठबंधन में शामिल होने का न्योता दे दिया। उन्होंने कहा कि अगर ईरान अमेरिका के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करता है, तो उसे भी इस "ऐतिहासिक वैश्विक गठबंधन" का हिस्सा बनाया जा सकता है। यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि अभी तक ईरान और इसराइल कट्टर दुश्मन माने जाते रहे हैं। दोनों देशों के बीच तनाव ही पश्चिम एशिया की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक समस्या माना जाता है।

मार्को रुबियो (Marco Rubio) ने क्या संकेत दिए?

ट्रंप के इस नए बयान से कुछ दिन पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने संकेत दिए थे कि ईरान के साथ समझौता काफी करीब पहुंच चुका है। नई दिल्ली दौरे के दौरान उन्होंने कहा था कि कुछ मुद्दों पर बड़ी प्रगति हुई है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) को लेकर भी सकारात्मक प्रस्ताव सामने आया है। यानी ऐसा लग रहा था कि दोनों देशों के बीच तनाव कम हो सकता है। लेकिन ट्रंप की नई शर्तों ने इस पूरी प्रक्रिया को फिर से जटिल बना दिया है।

Saudi Arabia की सबसे बड़ी शर्त (Saudi Arabia's Condition)

सऊदी अरब पहले भी कह चुका है कि वह इसराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने पर विचार कर सकता है, लेकिन इसके लिए फिलिस्तीन मुद्दे का हल जरूरी है। साल 2025 में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (Mohammed bin Salman) ने कहा था कि अगर "टू-स्टेट सॉल्यूशन" यानी अलग फिलिस्तीनी राष्ट्र की दिशा में साफ रोडमैप मिलता है, तभी सऊदी अरब आगे बढ़ेगा। यही वजह है कि ट्रंप की योजना जितनी आसान दिख रही है, जमीन पर उतनी सरल नहीं मानी जा रही।

ईरान ने क्या जवाब दिया?

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmaeil Baqaei ने माना कि बातचीत में काफी प्रगति हुई है, लेकिन उन्होंने साफ कहा कि अभी किसी अंतिम समझौते की घोषणा करना जल्दबाजी होगी। उन्होंने कहा कि कई मुद्दों पर सहमति बन चुकी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि समझौता तुरंत होने वाला है।

पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों, समुद्री व्यापार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में कोई बड़ा सैन्य टकराव होता है, तो दुनिया भर में तेल सप्लाई प्रभावित हो सकती है। भारत जैसे देश, जो बड़ी मात्रा में तेल आयात करते हैं, उनके लिए भी यह स्थिति बेहद अहम है। यही कारण है कि ट्रंप का यह नया बयान सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की कूटनीति और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला संकेत माना जा रहा है।

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