किस मुस्लिम दोस्त के कहने पर ट्रंप ने ईरान पर किया हमला? आते थे प्राइवेट कॉल, नेता का नाम चौंका देगा
Donald Trump Iran Attack Inside Story: पश्चिम एशिया की राजनीति में भूचाल तब आया जब अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई (Ayatollah Ali Khamenei) की मौत की खबर सामने आई। तेहरान की सरकारी मीडिया ने इसकी पुष्टि की और टीवी एंकर तक भावुक हो उठे।
86 वर्षीय खामेनेई लगभग चार दशकों तक ईरान की सत्ता के केंद्र में रहे। अब सवाल यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐसा बड़ा और जोखिम भरा फैसला क्यों लिया, जबकि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने कथित तौर पर कहा था कि अमेरिका को तत्काल ईरान से कोई खतरा नहीं था।

ट्रंप को इस मुस्लिम नेता के आए प्राइवेट फोन कॉल
रिपोर्ट बताती है कि ट्रंप पर हमले का बटन दबाने के लिए क्षेत्रीय सहयोगियों ने लगातार दबाव बनाया। एक अहम मुस्लिम देश ने यह दलील दी कि ईरान पर कार्रवाई के लिए इससे बेहतर मौका नहीं मिलेगा। पिछले एक महीने में अमेरिकी राष्ट्रपति के पास कई बार सीधे और निजी फोन कॉल पहुंचे।
The Washington Post की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस हमले के पीछे क्षेत्रीय सहयोगियों का हफ्तों तक चला दबाव था। रिपोर्ट में दावा किया गया कि एक सुन्नी बहुल मुस्लिम देश के टॉप नेता ने ट्रंप से प्राइवेट फोन कॉल पर हुई बातचीत में सैन्य कार्रवाई करने का आग्रह किया। यह देश था सउदी अरब (Saudi Arabia) और कॉल करने वाले थे क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (Mohammed bin Salman)। जी हां, यही वो ट्रंप के सीक्रेट मुस्लिम दोस्त बताए जा रहे हैं, जिनके कहने पर ट्रंप ने ईरान पर हमले का आदेश दिया।
बताया गया है कि पिछले एक महीने में कई बार ट्रंप और सऊदी नेतृत्व और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के बीच निजी फोन कॉल हुए। सार्वजनिक मंचों पर सऊदी अरब कूटनीति की बात करता रहा, लेकिन निजी तौर पर ईरान के खिलाफ सख्त कदम उठाने की वकालत की गई। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इस सीक्रेट लॉबिंग में इजरायल की भूमिका भी अहम थी।
ट्रंप और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की प्राइवेट बातचीत काफी सीक्रेट रखी गई थी। ये बातचीत आधिकारिक ब्रीफिंग से अलग और बेहद गोपनीय रखी गई। न तो मीडिया को भनक लगी और न ही अमेरिकी प्रशासन के ज्यादातर अधिकारियों को इसकी पूरी जानकारी थी।
सार्वजनिक मंचों पर जहां कूटनीति की भाषा बोली जा रही थी, वहीं बंद कमरों में सख्त सैन्य कदम की पैरवी हो रही थी। सूत्रों का कहना है कि यही गुप्त बातचीत आखिरकार उस फैसले की जमीन बनी, जिसने पूरे क्षेत्र को जंग की दहलीज पर ला खड़ा किया।

इजरायल का दबाव और साझा सैन्य अभियान (Joint Operation)
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Benjamin Netanyahu) लंबे समय से ईरान के परमाणु ठिकानों और नेतृत्व के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे थे। आखिरकर अमेरिका और इजरायल ने मिलकर 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' नाम से बड़े सैन्य हमले को अंजाम दिया। यह हमला ईरान की राजधानी तेहरान में हुआ, जहां खामेनेई के आवास और कार्यालय को निशाना बनाया गया।
ईरानी समाचार एजेंसियों तसनीम और फार्स ने पुष्टि की कि हमले में खामेनेई के साथ उनकी बेटी, दामाद, पोती और बहू की भी मौत हुई। ईरान में 40 दिन का राजकीय शोक और सात दिन की सार्वजनिक छुट्टी घोषित की गई है। इस्लामी क्रांतिकारी गार्ड कोर (Islamic Revolutionary Guard Corps) ने बयान जारी कर कहा कि देश ने एक महान नेता खो दिया है।
ट्रंप का दावा और 'आजादी' की अपील
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि खामेनेई जैसे क्रूर नेता का अंत न्याय है। उन्होंने ईरानी जनता से अपने शासन को उखाड़ फेंकने और इसे पीढ़ियों में एक बार मिलने वाला मौका बताया। उनका कहना था कि यह कदम ईरानी लोगों की आजादी के लिए उठाया गया है।
हालांकि आलोचकों का सवाल है कि जब अमेरिकी इंटेलिजेंस ने तत्काल खतरे से इनकार किया था, तो फिर इतनी बड़ी सैन्य कार्रवाई क्यों। रिपोर्ट के मुताबिक सहयोगियों ने ट्रंप को यह समझाया कि तेहरान के प्रभाव को कमजोर करने का यही सही समय है।

ईरान की जवाबी कार्रवाई और बढ़ता तनाव (Regional Escalation)
हमले के बाद ईरान ने इजरायल और खाड़ी के चार देशों, जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने हैं, की ओर मिसाइलें और ड्रोन दागे। इनमें बहरीन, कुवैत, कतर (Bahrain, Kuwait, Qatar) और संयुक्त अरब अमीरात (United Arab Emirates) शामिल हैं। ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने कहा कि खामेनेई की मौत उनके दफ्तर में हुई, जब वे काम में व्यस्त थे।
तसनीम एजेंसी ने यह भी कहा कि उनके छिपने की खबरें दुश्मनों का मनोवैज्ञानिक युद्ध थीं। अब क्षेत्र में तनाव चरम पर है और व्यापक संघर्ष की आशंका जताई जा रही है।
क्या बदलेगी मध्य पूर्व की सियासत (West Asia Impact)
खामेनेई के निधन के साथ ईरान में 47 साल के एक दौर का अंत माना जा रहा है। अमेरिका की विदेश नीति में यह फैसला बेहद चौंकाने वाला और जोखिम भरा कदम माना जा रहा है। मुस्लिम देशों में सऊदी अरब की भूमिका को लेकर नाराजगी बढ़ सकती है, क्योंकि सार्वजनिक और निजी रुख में अंतर की चर्चा तेज है।
स्पष्ट है कि यह हमला सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया की ताकत संतुलन की नई कहानी की शुरुआत है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि ईरान की सत्ता संरचना कैसे बदलती है और क्षेत्रीय समीकरण किस दिशा में जाते हैं।
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